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Sendra festival Dalma: जमशेदपुर के दलमा में सेंदरा पर्व के दौरान इस बार पारंपरिक हथियारों से शिकार नहीं हुआ. जो परंपरा और संरक्षण की अनूठी मिसाल पेश की. दलमा के जंगलों में हजारों आदिवासियों ने पारंपरिक हथियारों के साथ सेंदरा पर्व तो मनाया, लेकिन इस बार शिकार की जगह जानवरों की रक्षा का संकल्प लिया. वन विभाग की गांधीगिरी और ग्रामीणों की जागरूकता ने सदियों पुरानी परंपरा को एक सकारात्मक मोड़ दिया है. जानें कैसे इस बार दलमा में खून नहीं बहा, बल्कि फूल-मालाओं से सेंदरा वीरों का स्वागत हुआ और महिलाओं ने क्यों किया श्रृंगार का त्याग?
जमशेदपुर: कोल्हान समेत ओडिशा और पश्चिम बंगाल के हजारों आदिवासियों के लिए आज का दिन बेहद खास था. मौका था वार्षिक सेंदरा पर्व का. 190 किलोमीटर में फैले दलमा वन्यजीव अभयारण्य के जंगलों में आज सुबह से ही गहमागहमी थी. हाथ में तीर-धनुष, भाले और पारंपरिक हथियार लिए हजारों आदिवासी युवा और बुजुर्ग दलमा राजा की पूजा कर पहाड़ों पर चढ़ने लगे. लेकिन इस बार नजारा कुछ बदला हुआ था. जंगलों से शिकार की खबरें नहीं, बल्कि पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण का संदेश आ रहा था.
परंपरा और संवेदना का संगम
सेंदरा पर्व को पारंपरिक रूप से शिकार का उत्सव माना जाता है. लेकिन इस वर्ष वन विभाग और आदिवासी समाज के बीच हुई बैठकों का व्यापक असर देखने को मिला. सेंदरा वीरों में सोनू टुडू और महेंद्र महतो ने बताया कि उनका उद्देश्य जानवरों की हत्या करना नहीं है. अपनी संस्कृति को जीवित रखना है. उन्होंने कहा कि हम जल, जंगल, जमीन और जानवरों की रक्षा करने वाले लोग हैं. हम हथियार केवल अपनी सुरक्षा और परंपरा के निर्वहन के लिए ले जाते हैं. सरकार और वन विभाग की अपील का सम्मान करते हुए हमने इस बार जानवरों को नुकसान नहीं पहुंचाया.
महिलाओं का अनूठा त्याग और श्रृंगार का त्याग
इस पर्व का एक बेहद आध्यात्मिक और भावनात्मक पहलू भी है. सबीता सोरेन ने बताया कि जब तक उनके परिवार के पुरुष जंगलों से सेंदरा मनाकर लौट नहीं आते, तब तक घर की महिलाएं श्रृंगार नहीं करतीं. यहां तक कि वे अपनी मांग का सिंदूर भी हटा देती हैं. यह त्याग उनके परिवार की सुरक्षा और परंपरा के प्रति अटूट विश्वास को दर्शाता है. महिलाओं के अनुसार सेंदरा का असली उद्देश्य प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाना है.
वन विभाग की गांधीगिरी और फूल-माला से स्वागत
वन विभाग ने इस बार दमन के बजाय जागरूकता का रास्ता चुना. दलमा के रेंजर दिनेश चंद्र ने एक अनोखी पहल करते हुए जंगलों से लौट रहे सेंदरा वीरों का फूल-माला पहनाकर स्वागत किया. विभाग की इस गांधीगिरी ने आदिवासियों का दिल जीत लिया. डीएफओ सबा आलम और आरसीएफ स्मिता पंकज ने बताया कि विभाग ने 15 चेक पोस्ट बनाए थे. 500 जवानों की तैनाती की थी. सीसीटीवी कैमरों से भी निगरानी रखी जा रही थी. वन विभाग ने ग्रामीणों को समझाया था कि अगर जंगल में जानवर नहीं रहेंगे, तो सैलानी नहीं आएंगे. जिससे उनका रोजगार छिन जाएगा. इस आर्थिक और पर्यावरणीय तर्क का गहरा असर दिखा.
मानवता और बेजुबानों की जीत
सेंदरा पर्व के समापन पर वन विभाग के अधिकारियों ने आदिवासी समाज का आभार व्यक्त किया. यह इस बात का प्रमाण है कि संवाद और विश्वास के जरिए सदियों पुरानी उन परंपराओं को बदला जा सकता है जो पर्यावरण के लिए घातक हों. आदिवासी समाज ने अपनी संस्कृति को बचाए रखते हुए बेजुबान जानवरों की रक्षा कर पूरे देश के सामने एक मिसाल कायम की है. यदि इसी तरह हर समाज प्रकृति की रक्षा के लिए आगे आए, तो जल, जंगल और जमीन सुरक्षित रहेंगे.
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