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India Earthquake Warning | हिमालय की कोख में फिट है भारत का...


दरअसल भारत के भूवैज्ञानिक हिमालयी क्षेत्र में बेहद भीषण भूकंप की चेतावनी देते रहे हैं. हिमालय पर्वत शृंखला भारत और यूरेशिया जैसी टेक्टॉनिक प्लेटों के मिलने से बना था और इसे धरती के भीतर की प्लेटों में होने वाली हलचल का खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है.

वेनेजुएला में भूकंप से अब तक 235 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है. (Reuters)

भूवैज्ञानिकों ने भूकंप संभावित क्षेत्रों को पांच सीस्मिक ज़ोन में बांटा हुआ है. जोन-1 में भूकंप आने की आशंका सबसे कम रहती है, वहीं जोन-5 में ज़्यादा प्रबल रहती है. दिल्ली-एनसीआर का इलाका सीस्मिक जोन-4 में आता है और यही वजह है कि यहां भीषण भूकंप का खतरा हमेशा बना रहता है. ऐसे में उनकी आशंका है कि यहां 9.0 तक तीव्रता वाला भूकंप आ सकता है, जिससे राजधानी दिल्ली तक तबाही मच सकती है.

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि दुनिया के किसी भी देश के पास ऐसी तकनीक नहीं है, जो वैज्ञानिक रूप से यह बता सके कि भूकंप कब, कहां और कितनी तीव्रता का आएगा. भारत भी इसका अपवाद नहीं है. यानी भूकंप की सटीक भविष्यवाणी आज भी संभव नहीं है.

हालांकि, इस बीच भूकंप शुरू होने के बाद कुछ सेकंड पहले चेतावनी देने वाली तकनीक जरूर विकसित की गई है. इसे अर्थक्वेक अर्ली वार्निंग सिस्टम (Earthquake Early Warning System) कहा जाता है.

जब भूकंप आता है तो सबसे पहले पी-वेव (Primary Wave) निकलती है. यह सबसे तेज गति से चलती है, लेकिन इसका असर अपेक्षाकृत कम होता है. इसके कुछ सेकंड बाद अधिक शक्तिशाली और नुकसान पहुंचाने वाली एस-वेव (Secondary Wave) और अन्य तरंगें पहुंचती हैं.

अर्ली वार्निंग सिस्टम जमीन में लगाए गए सेंसरों के जरिए सबसे पहले पी-वेव को पकड़ लेता है. इसके बाद यह तुरंत कंप्यूटर नेटवर्क के जरिए अलर्ट जारी करता है. अगर कोई शहर भूकंप के केंद्र से कुछ दूरी पर है तो वहां लोगों को कुछ सेकंड का समय मिल सकता है. इस दौरान ट्रेनें रोकी जा सकती हैं, गैस लाइनें बंद की जा सकती हैं, बिजली सप्लाई नियंत्रित की जा सकती है और लोग सुरक्षित स्थान पर जाने की कोशिश कर सकते हैं.

भारत में भूकंप की सटीक भविष्यवाणी तो संभव नहीं है, लेकिन अर्ली वार्निंग सिस्टम पर तेजी से काम हो रहा है. खासतौर पर हिमालयी क्षेत्र, जिसे देश का सबसे संवेदनशील भूकंपीय इलाका माना जाता है, वहां सेंसरों का नेटवर्क स्थापित किया गया है.

आईआईटी रुड़की और उत्तराखंड सरकार ने मिलकर ‘भूदेव (BhuDEV)’ नाम का एक आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम और मोबाइल ऐप विकसित किया है. यह सिस्टम भूकंप शुरू होने के बाद शुरुआती झटकों का पता लगाकर लोगों तक कुछ सेकंड पहले चेतावनी पहुंचाने का प्रयास करता है.

इसके अलावा नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी (NCS) भी पी-वेव की पहचान, भूकंप की तीव्रता का त्वरित आकलन और संभावित झटकों का पूर्वानुमान लगाने वाले आधुनिक एल्गोरिद्म पर काम कर रहा है.

फिलहाल भारत में सबसे ज्यादा सेंसर उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र में लगाए गए हैं. इन्हें सक्रिय भ्रंश रेखाओं (Fault Lines) के पास स्थापित किया गया है, ताकि भूकंप शुरू होते ही शुरुआती तरंगों का पता लगाया जा सके.

हालांकि, चेतावनी का समय इस बात पर निर्भर करता है कि संबंधित शहर भूकंप के केंद्र से कितनी दूरी पर है. अगर कोई स्थान भूकंप के केंद्र के बिल्कुल पास है तो वहां चेतावनी का समय लगभग नहीं के बराबर होगा. लेकिन दूर स्थित शहरों को कुछ सेकंड का अतिरिक्त समय मिल सकता है.

भूकंप की चेतावनी के मामले में जापान, ताइवान और अमेरिका दुनिया के सबसे उन्नत देशों में गिने जाते हैं. इन देशों में सेंसरों का घना नेटवर्क, तेज संचार व्यवस्था और ऑटोमेटिक वॉर्निंग सिस्टम लाखों लोगों तक कुछ ही सेकंड में अलर्ट पहुंचाने में सक्षम है.

वेनेजुएला की ताजा त्रासदी एक बार फिर याद दिलाती है कि भूकंप को रोका नहीं जा सकता और न ही उसकी सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है. लेकिन आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम, मजबूत इमारतें, समय पर राहत व्यवस्था और लोगों में जागरूकता ऐसी आपदाओं में होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम कर सकती है.



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