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ISRO Talent Drain | ISRO Resignation Rule | इसरो छोड़ रहे वैज्ञानिकों...


नई दिल्ली: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में इस वक्त काफी उथल-पुथल मची है. देश के सबसे अहम गगनयान मिशन के बीच एक बड़ी परेशानी खड़ी हो गई है. इसरो के कई सीनियर साइंटिस्ट और टेक्निकल एक्सपर्ट लगातार नौकरी छोड़ रहे हैं. प्राइवेट स्पेस कंपनियों की तरफ उनका रुझान तेजी से बढ़ रहा है. इस टैलेंट ड्रेन को रोकने के लिए अब भारत सरकार ने बेहद सख्त कदम उठाया है. अंतरिक्ष विभाग ने एक नया मेमोरेंडम जारी किया है. इसके तहत अब गगनयान और दूसरे क्रिटिकल मिशन से जुड़े ग्रुप ए लेवल के अधिकारियों का इस्तीफा रूटीन के तौर पर आसानी से मंजूर नहीं होगा. उनके वॉलंटरी रिटायरमेंट यानी वीआरएस लेने पर भी काफी सख्ती कर दी गई है. सरकार का मानना है कि इस तरह अचानक काम छोड़ने से राष्ट्रीय स्तर के प्रोजेक्ट्स पर बुरा असर पड़ रहा है.

किस वजह से ISRO को बाय-बाय बोल रहे साइंटिस्ट?

भारत का प्राइवेट स्पेस सेक्टर इस समय बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है. सरकार भी प्राइवेट कंसोर्टियम को बड़े सैटेलाइट प्रोजेक्ट्स सौंप रही है. इसके साथ ही लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए भी इंडस्ट्री से बोलियां मांगी जा रही हैं. ऐसे में अनुभवी स्पेस प्रोफेशनल्स की डिमांड काफी ज्यादा बढ़ गई है. यही वजह है कि इसरो के टैलेंटेड साइंटिस्ट प्राइवेट सेक्टर की तरफ बहुत आकर्षित हो रहे हैं.

अंतरिक्ष विभाग के मुताबिक हाल के दिनों में वीआरएस और इस्तीफे की मांग अचानक से काफी बढ़ गई है. इसका सीधा असर गगनयान जैसे महत्वपूर्ण और राष्ट्रीय स्तर के प्रोजेक्ट्स पर देखने को मिल रहा है. साइंटिस्ट के जाने से प्रोजेक्ट की रफ्तार धीमी पड़ सकती है.

इस्तीफे और रिटायरमेंट को लेकर सरकार ने क्या नया नियम बनाया है?

इस नए आदेश के बाद इसरो के सेंटर हेड या डिवीजन हेड सीधे तौर पर किसी का इस्तीफा मंजूर नहीं कर पाएंगे.

  • जो भी साइंटिस्ट या टेक्निकल स्टाफ गगनयान जैसे क्रिटिकल प्रोजेक्ट से जुड़ा है, वह प्रोजेक्ट पूरा होने तक नौकरी नहीं छोड़ सकता.
  • अगर कोई अधिकारी आवेदन करता भी है, तो सेंटर डायरेक्टर अपनी सिफारिश के साथ उसे अंतरिक्ष विभाग को भेजेंगे.
  • इस्तीफे पर अंतिम फैसला पूरी तरह से अंतरिक्ष विभाग के हाथ में होगा.

इससे पहले भी इसरो ने अपने स्किल्ड स्टाफ को रोकने के लिए कई बड़े कदम उठाए थे. यह कदम टैलेंट को रोके रखने की एक बड़ी कोशिश है.

इसरो के अंदर चल रहे मैनपावर संकट पर अधिकारियों का क्या कहना है?

नाम न छापने की शर्त पर इसरो के एक अधिकारी ने इस हालात पर गहरी चिंता जताई है. उन्होंने बताया कि संस्थान ने पहले ही कर्मचारियों के इंटर-सेंटर और म्यूचुअल ट्रांसफर पर रोक लगा दी थी. अधिकारी ने कहा, ‘नए टैलेंट की हायरिंग काफी कम हो गई है. मैनपावर का भारी संकट चल रहा है और स्टाफ की कमी के बावजूद किसी तरह शॉप फ्लोर पर काम चलाया जा रहा है.’

यह बयान साफ तौर पर दिखाता है कि इसरो के अंदर ग्राउंड लेवल पर स्थिति कितनी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है. स्टाफ कम होने से मौजूदा कर्मचारियों पर काम का दबाव भी बढ़ रहा है.

क्या प्रशासनिक सख्ती से रुकेगा वैज्ञानिकों का टैलेंट ड्रेन?

सरकार के इस सख्त आदेश ने इसरो के पूर्व अधिकारियों को काफी चिंता में डाल दिया है. उनका मानना है कि सिर्फ प्रशासनिक पाबंदियों से इस मूल समस्या को हल नहीं किया जा सकता.

एक रिटायर्ड सीनियर अधिकारी ने कहा, ‘इस तरह के सर्कुलर गहरे मुद्दों को दर्शाते हैं और संगठन को कमजोर करते हैं. सर्कुलर इस तरह से जारी नहीं किया जाना चाहिए था. लोगों को जाने से रोकने के लिए दूसरे तरीके भी हैं. शायद सलाहकार अच्छे नहीं हैं.’ उनका सीधा इशारा इस बात पर था कि लीडरशिप को अपने कर्मचारियों को प्रेरित करने की जरूरत है.

क्या इसरो की लीडरशिप और वर्क कल्चर में बड़े बदलाव की जरूरत है?

एक अन्य पूर्व अधिकारी ने कहा कि कि संगठन को कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने के असली कारणों का पता लगाना चाहिए. सिर्फ प्रशासनिक आदेश जारी करके लोगों की एग्जिट रोकना गलत और डिमोटिवेट करने वाला कदम है.

यह सब ऐसे अहम समय में हो रहा है जब इसरो गगनयान मिशन पर पूरी तरह से फोकस कर रहा है. साथ ही पीएसएलवी के कुछ लॉन्च फेल होने के बाद उसकी वापसी को लेकर भी काफी अनिश्चितता बनी हुई है. भारत की स्पेस इकॉनमी खुल रही है. ऐसे में अनुभवी इंजीनियरों और वैज्ञानिकों को रोककर रखना संस्थान के लिए सबसे बड़ी मैनेजमेंट चुनौती बन गया है.



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