रांची: झारखंड की राजधानी रांची के सूरज डोकरा आर्ट और लकड़ी की कलाकृतियों के माध्यम से अपनी पहचान बना रहे हैं. यह प्राचीन आदिवासी कला पीतल, कांसे और मोम का उपयोग करके मूर्तियां बनाने पर केंद्रित है, साथ ही लकड़ी से भी कलाकृतियां बनाई जाती हैं. इस कलाकृति से वह तगड़ी कमाई भी क रहे हैं. आइये जानते हैं उनकी सफलता के बारे में.
कला का प्रदर्शन
सूरज ने दिल्ली सहित कई स्थानों पर प्रदर्शनियों में स्टॉल लगाए हैं, जहां विदेशी मेहमानों ने भी उनकी कला की सराहना की है और खरीदारी भी की है. वे अपनी कलाकृतियों के लिए लकड़ी जंगल और अपने घर के पेड़ों से प्राप्त करते हैं. उन्होंने लकड़ी से भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां बनाई हैं, जो वास्तविक दिखती हैं. इसे देखकर हर कोई तारीफ ही करता है.
ऑर्गेनिक पेंट का उपयोग
इन मूर्तियों में ऑर्गेनिक पेंट का इस्तेमाल किया जाता है, जो फलों और सब्जियों के रंगों से बनता है. लकड़ी से बनी भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों की कीमत लगभग 500 रुपये होती है और इनकी काफी मांग रहती है. लोग विशेष रूप से इन्हें बनवाने की मांग करते हैं. इसके अतिरिक्त, पीतल से कछुआ, खरगोश और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी बनाई जाती हैं, जिसकी खूबसूरती देखकर आप तारीफ जरूर करेंगे.
प्राचीन पद्धति से निर्माण
सूरज द्वारा इन कलाकृतियों को बनाने का तरीका प्राचीन है, जिसमें मोम के स्टैच्यू का उपयोग होता है. पिघला हुआ तांबा मोम के अंदर डाला जाता है, फिर मोम को सुखाया जाता है और बाद में हटा दिया जाता है, जिससे मूर्ति तैयार होती है. हड़प्पा सभ्यता के दौरान भी इसी तरीके से मूर्तियां बनाई जाती थीं, जिससे इनकी कलाकारी और बनावट अद्वितीय दिखती है. इसे देखने के लिए भी लोग पहुंचते हैं.
अद्वितीय शैली और पहचान
सूरज के अनुसार, उनकी कलाकृतियां बाजार में अद्वितीय हैं, क्योंकि इस शैली में बहुत कम लोग काम करते हैं. उन्होंने पूरे भारत में अपने स्टॉल लगाए हैं और अब विदेशी ग्राहक और बड़े व्यापारिक उद्यमी भी उनके ग्राहक हैं, जो अपने घरों को सजाने के लिए इन कलाकृतियों को खरीदते हैं.
कला और संस्कृति का संरक्षण
इस कला के माध्यम से सूरज महीने में 50 हजार रुपये से अधिक की कमाई करते हैं. इसके साथ ही, यह आदिवासी कला को बढ़ावा देने और संस्कृति को संरक्षित करने में भी मदद कर रहा है, जिसे लोग पसंद कर रहे हैं.