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Thalapathy Vijay TVK Government Tamil Nadu: तमिलनाडु की राजनीति में पिछले एक हफ्ते से चल रहा हाई-वोल्टेज ड्रामा और संवैधानिक गतिरोध आखिरकार खत्म हो गया है. अभिनेता से राजनेता बने थलापति विजय ने राज्य में अगली सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत का जादुई आंकड़ा हासिल कर लिया है. शनिवार दोपहर को विदुथलाई चिरुथैगल काची (वीसीके) द्वारा औपचारिक रूप से अपना समर्थन पत्र राजभवन को सौंपने के बाद यह बड़ी सफलता मिली, जिससे तमिझगा वेत्री कड़गम (टीवीके) के नेतृत्व वाला गठबंधन बहुमत के पार पहुंच गया. इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) द्वारा भी थलापति खेमे को समर्थन देने की खबरों के साथ ही चुनाव परिणामों के बाद से चेन्नई में छाई राजनीतिक अनिश्चितता अब पूरी तरह से समाप्त हो गई है. संभावना जताई जा रही है कि विजय राज्यपाल से मिलने के बाद आज ही शपथ लेने की मांग कर सकते हैं.

विजय के लिए 118 के जादुई आंकड़े तक पहुंचने का यह सफर गठबंधन के गणित का एक बेहद चुनौतीपूर्ण खेल था. विजय की पार्टी टीवीके 107 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर तो उभरी थी, लेकिन वह अपने दम पर बहुमत से कुछ कदम दूर रह गई थी. इस गतिरोध को पूर्व सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस के घटकों के साथ तेजी से की गई बातचीत के जरिए तोड़ा गया. अपने पांच विधायकों वाली कांग्रेस और चार सीटों वाली वामपंथी पार्टियां सबसे पहले डीएमके खेमे को छोड़कर विजय के साथ आईं. हालांकि, असली किंगमेकर की भूमिका थोल. तिरुमावलवन की वीसीके ने निभाई. पुरानी सहयोगी डीएमके के भारी दबाव के बावजूद, वीसीके नेतृत्व ने सामाजिक न्याय के प्रति साझा प्रतिबद्धता और कैबिनेट में ‘सत्ता-साझेदारी’ की व्यवस्था की मांग करते हुए विजय का समर्थन करने का फैसला किया. आईयूएमएल के शामिल होने से इस नए मोर्चे को और मजबूती मिली है, जिससे 234 सदस्यों वाले सदन में विजय के पास 119 से 120 विधायकों का आरामदायक आंकड़ा हो गया है.

राष्ट्रपति शासन लगते-लगते रह गया

इन तमाम राजनीतिक गठजोड़ और बातचीत के पीछे की असली वजह केवल राजनीतिक नहीं थी, बल्कि यह पूरी तरह से एक संवैधानिक मजबूरी थी. दरअसल, तमिलनाडु की 16वीं विधानसभा का कार्यकाल 10 मई की मध्यरात्रि को समाप्त होने वाला था. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 172(1) के तहत, किसी भी विधानसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तारीख से ठीक पांच साल के लिए होता है, जब तक कि उसे पहले ही भंग न कर दिया जाए. यदि रविवार रात बारह बजे से पहले नई सरकार शपथ नहीं लेती या स्पष्ट बहुमत साबित नहीं होता, तो राज्य एक गहरे संवैधानिक संकट में फंस जाता. ऐसी स्थिति में राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर को अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश करनी पड़ सकती थी. इसका सीधा मतलब यह होता कि केंद्र सरकार राज्यपाल के माध्यम से सीधे राज्य का प्रशासन अपने हाथ में ले लेती. यह कदम टीवीके के जनादेश के लिए एक बहुत बड़ा झटका साबित होता और शपथ ग्रहण में हफ्तों या महीनों की देरी हो सकती थी.

राज्यपाल ने सरकार बनाने का निमंत्रण भेजा

राज्यपाल आर्लेकर शनिवार की शाम विजय को सरकार बनाने का औपचारिक निमंत्रण भेजा. पनायूर स्थित टीवीके मुख्यालय में अभी से जश्न का माहौल है. पार्टी कार्यकर्ता इसे ‘जनता का राज्याभिषेक’ बता रहे हैं. लगभग पांच दशकों में यह पहली बार है जब तमिलनाडु में एक ऐसी गठबंधन सरकार बनने जा रही है जहां मुख्य पार्टी के पास अपने दम पर स्पष्ट बहुमत नहीं है. हालांकि, इसका यह भी मतलब है कि मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पहली और सबसे बड़ी चुनौती अपने पांच गठबंधन सहयोगियों की विविध और अक्सर मांग करने वाली आकांक्षाओं को संतुलित करना होगा.

विजय की पार्टी टीवीके को बहुमत साबित करने के लिए किन पार्टियों का समर्थन मिला?
विजय की पार्टी टीवीके को 118 का बहुमत का आंकड़ा पार करने के लिए वीसीके (VCK), कांग्रेस, लेफ्ट पार्टियों और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) का समर्थन मिला है.

तमिलनाडु में 10 मई की समय सीमा इतनी महत्वपूर्ण क्यों थी?
संविधान के अनुच्छेद 172(1) के तहत तमिलनाडु की 16वीं विधानसभा का पांच साल का कार्यकाल 10 मई की आधी रात को समाप्त हो रहा था, इसलिए उससे पहले नई सरकार का गठन जरूरी था.

यदि विजय 10 मई तक बहुमत साबित नहीं कर पाते तो क्या होता?
यदि 10 मई की मध्यरात्रि तक नई सरकार नहीं बनती, तो राज्य में संवैधानिक शून्य की स्थिति पैदा हो जाती और राज्यपाल अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन (President’s Rule) लगाने की सिफारिश कर सकते थे.

चुनाव में ‘किंगमेकर’ की भूमिका किस पार्टी ने निभाई?
थोल. तिरुमावलवन के नेतृत्व वाली विदुथलाई चिरुथैगल काची (VCK) ने डीएमके का साथ छोड़कर विजय को समर्थन दिया और सरकार गठन में ‘किंगमेकर’ की मुख्य भूमिका निभाई.

तमिलनाडु की राजनीति में यह सरकार गठन ऐतिहासिक क्यों माना जा रहा है?
लगभग पांच दशकों (50 वर्षों) में यह पहली बार है जब तमिलनाडु में एक ऐसी गठबंधन सरकार बनने जा रही है, जिसमें नेतृत्व करने वाली सबसे बड़ी पार्टी के पास अपने दम पर स्पष्ट बहुमत नहीं है.



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