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अमेरिका ने पैसिफिक से इंडो क्यों हटाया? चीन प्रेम में ट्रंप ने...


India-Japan Relations:  अमेरिका की विदेश और रक्षा रणनीति दस्तावेज से एक छोटा-सा शब्द हटाना भी बड़े भू-राजनीतिक संकेत देता है. इसी कारण हाल के दिनों में अमेरिकी प्रशासन के कुछ आधिकारिक दस्तावेजों में इंडो-पैसिफिक की जगह केवल पैसिफिक शब्द का इस्तेमाल चर्चा का विषय बना हुआ है. पहली नजर में यह महज एक शब्द का हटाया जाना भर है लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसके गहरे मायने हैं. यही वजह है कि इस बदलाव को चीन, भारत, जापान और पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति-संतुलन की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है.

इंडो-पैसिफिक शब्द इतना महत्वपूर्ण क्यों?

करीब एक दशक पहले तक दुनिया इस क्षेत्र को मुख्य रूप से एशिया-पैसिफिक कहती थी. लेकिन भारत के बढ़ते आर्थिक, सामरिक और समुद्री प्रभाव को देखते हुए जापान ने सबसे पहले इंडो-पैसिफिक की अवधारणा को प्रमुखता से आगे बढ़ाया. बाद में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों ने भी इसी शब्द को अपनी आधिकारिक रणनीति का हिस्सा बना लिया. इसका सीधा संदेश था कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर अब अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साझा सामरिक क्षेत्र हैं और भारत इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा, व्यापार और समुद्री संतुलन का प्रमुख स्तंभ है.

अमेरिका ने इंडो हटाकर क्या संकेत दिया?

यदि अमेरिकी प्रशासन आधिकारिक भाषा में लगातार इंडो-पैसिफिक की जगह केवल पैसिफिक का इस्तेमाल करता है, तो इसे केवल भाषाई बदलाव नहीं माना जाएगा. इसका राजनीतिक संदेश यह हो सकता है कि वॉशिंगटन फिलहाल चीन के साथ टकराव कम करने की नीति अपना रहा है. डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि अमेरिका को चीन के साथ प्रतिस्पर्धा तो करनी चाहिए, लेकिन अनावश्यक टकराव से बचना भी जरूरी है. ऐसे में कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इंडो शब्द हटाना चीन को यह संदेश देने की कोशिश हो सकती है कि अमेरिका उस रणनीतिक ढांचे को कुछ हद तक नरम करना चाहता है, जिसे बीजिंग लंबे समय से चीन को घेरने की कोशिश बताता रहा है. हालांकि, केवल शब्द बदलने से अमेरिका की पूरी सामरिक नीति बदल गई है, ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी. वास्तविक आकलन अमेरिका की सैन्य तैनाती, साझेदारियों और नीतिगत फैसलों से ही होगा.

जापान की पीएम तीन दिवसीय दौरे पर बुधवार को दिल्ली पहुंच गईं. फोटो- पीटीआई

चीन को इससे क्या फायदा दिखता है?

चीन लंबे समय से इंडो-पैसिफिक रणनीति का विरोध करता रहा है. उसका आरोप है कि यह अवधारणा अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के जरिए चीन को संतुलित या सीमित करने का प्रयास है. यदि अमेरिका इंडो शब्द का इस्तेमाल कम करता है, तो चीन इसे अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकता है. इससे बीजिंग यह संदेश देना चाहेगा कि अमेरिकी रणनीति पहले जैसी आक्रामक नहीं रही और क्षेत्रीय विमर्श में उसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है.

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

भारत के लिए हिंद महासागर केवल समुद्री क्षेत्र नहीं, बल्कि उसकी सामरिक पहचान का केंद्र है. दुनिया का बड़ा हिस्सा ऊर्जा और व्यापारिक आपूर्ति हिंद महासागर के समुद्री मार्गों से गुजरता है. ऐसे में भारत लंबे समय से खुद को इस क्षेत्र में ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. इसी कारण ‘इंडो-पैसिफिक’ शब्द भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का प्रतीक माना जाता है. यदि इस शब्द का महत्व कम होता है, तो यह भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं के लिहाज से सकारात्मक संकेत नहीं माना जाएगा.

जापान का भारत दौरा क्यों अहम है?

जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची का भारत दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन नए मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है. भारत और जापान पिछले कई वर्षों से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त, खुला और नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था के सबसे मजबूत समर्थकों में रहे हैं. दोनों देशों की चिंता समान है. चीन की बढ़ती समुद्री गतिविधियां, दक्षिण चीन सागर में तनाव और हिंद महासागर में बढ़ता प्रभाव. ऐसे में माना जा रहा है कि नई दिल्ली और टोक्यो इस दौरे के दौरान रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, सप्लाई चेन, सेमीकंडक्टर, उन्नत प्रौद्योगिकी और क्वाड जैसे मंचों पर सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं.

क्या भारत और जापान बनेंगे असली काउंटर?

अगर अमेरिका अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव भी करता है, तब भी भारत और जापान के रणनीतिक हितों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है. दोनों देशों की साझा सोच यह है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में किसी एक देश का प्रभुत्व नहीं होना चाहिए और समुद्री मार्ग अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार खुले रहने चाहिए. यही वजह है कि भारत और जापान आने वाले समय में द्विपक्षीय रक्षा अभ्यास, समुद्री निगरानी, तकनीकी साझेदारी और आर्थिक सहयोग को और तेज कर सकते हैं. इससे यह संदेश जाएगा कि हिंद-प्रशांत की अवधारणा केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय शक्तियां भी इसे आगे बढ़ाने की क्षमता रखती हैं.



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