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Saharanpur News: पांवधोई नदी जोकि बाबा लालदास की तपस्या से प्रश्न होकर सहारनपुर में आई थी. आज भी यह जमीन से फूट रही है. इस नदी के साथ-साथ भगवान शिव से भी इसका गहराना नाता जुड़ा है. यही कारण है कि सहारनपुर में जमीन से फूटने के बाद यह भगवान शिव के चरणों को पखारते हुए आगे बढ़ती है. सबसे पहले जमीन से निकलने के स्रोत सकलापुरी में स्थित सकलेश्वर के चरणों पर पड़ा.
Saharanpur: सहारनपुर का इतिहास बेहद ही रोचक है. यहां पर एक से बढ़कर एक तपस्वी ने निवास किया है और अपनी तपस्याओं से भगवान को भी प्रसन्न किया. कुछ ऐसी ही कहानी है सहारनपुर शहर के बीच से होकर गुजर रही पांवधोई नदी की. जिसको सहारनपुर की लाइफ लाइन कहा जाता है. पांवधोई नदी जोकि बाबा लालदास की तपस्या से प्रश्न होकर सहारनपुर में आई थी. आज भी यह जमीन से फूट रही है. इस नदी के साथ-साथ भगवान शिव से भी इसका गहराना नाता जुड़ा है.
यही कारण है कि सहारनपुर में जमीन से फूटने के बाद यह भगवान शिव के चरणों को पखारते हुए आगे बढ़ती है. सबसे पहले जमीन से निकलने के बाद गंगा का स्रोत सकलापुरी में स्थित सकलेश्वर महादेव के चरणों पर पड़ता है. उसके बाद आगे बढ़ते हुए बाबा लाल दास घाट पर बने शिव मंदिर पर यह भगवान शिव के चरणों को पखारती है. आगे चलकर भूतेश्वर मंदिर और उससे आगे चलकर पुल खुमरान फिर दाल मंडी पुल पर बने भगवान शिव के मंदिरों को होते हुए आगे जाकर ढ़मोला नदी में मिलती है.
ऐतिहासिक धरोहर नाले में तब्दील
इस नदी का यह छोटा सा सफर भगवान शिव के चरणों से होकर गुजर रहा है. लेकिन आज यह नदी केवल एक गंदा नाला बनकर रह गई है कभी इस नदी में बनी सीढ़ियों पर पूजा पाठ और लोग स्नान कर भगवान शिव की मंदिरों में पूजा अर्चना किया करते थे. इस नदी को साफ करने के लिए करोड़ों रुपए खर्च भी किए गए लेकिन अब इस नदी में गंगा का स्रोत कम और घरों से निकलने वाला गंदा पानी ज्यादा दिखाई देता है. कभी शहर की लाइफ लाइन कही जाने वाली यह पांवधोई नदी आज केवल और केवल गंदा नाला बनकर रहा गई है.
पांवधोई नदी का प्राचीन और आध्यात्मिक महत्व
साहित्यकार डॉक्टर वीरेंद्र आज़म ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि सहारनपुर के बीच से होकर गुजरने वाली पांवधोई नदी सहारनपुर की लाइफ लाइन कही जाती है. इसका का प्राचीन और आध्यात्मिक महत्व है. मान्यता है कि मां भागीरथी, बाबा लालदास जिन्होंने यहां सैकड़ो वर्ष तपस्या की वह गंगा जी के परम भक्त थे और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर यहां आई थी. बाबा लाल दास रोजना प्रातः गंगा स्नान के लिए हरिद्वार जाते थे और उनके मित्र थे हाजी शाह कमाल जिनकी दरगाह बाबा लाल दास बाड़े के पास में ही मौजूद है. मान्यता यह है कि उनके तपोवन से, उनकी साधना से प्रसन्न होकर मां गंगा यहां आई और गंगा जी का जो स्रोत है वह आज भी सकलापुरी जो कि सहारनपुर से 7 किलोमीटर दूर है वहां पर देखा जा सकता है.
बैसाखी और छठ पूजा के पर्व पर लगते रहे हैं बड़े मेले
वहां जमीन से ही बहुत सारे पानी के स्रोत छूट रहे हैं. और वहीं पास में सकलेश्वर महादेव है तो गंगा जी भगवान सकलेश्वर के चरण पखारती हुई बाबा लाल दास आश्रम पर पहुंची. वहां आज भी सीढ़ियां बनी हुई है और दशहरे, बैसाखी और छठ पूजा के पर्व पर बड़े मेले लगते रहे हैं. वहां लोग गंगा स्नान करते रहे हैं. आगे दाल मंडी पुल पर भी इसी तरीके से स्नान की सीढ़ियां बनी हुई है वहां भी लोग स्नान करते थे. मंदिर में पूजा अर्चना करते थे. तो यह गंगा जी भगवान शिव के चरण को पखारते हुए वहां से निकली है और आगे जाकर के यह ढमोला नदी जो की पास के गांव से ही निकल कर आती है. दोनों नदी मिलकर के आगे चलकर हिंडन नदी का हिस्सा बन जाती है. तो पांवधोई हुई नदी का बहुत ऐतिहासिक महत्व है.