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कल्कि तीर्थ के 5 पवित्र कूप, जिनसे जुड़ी हैं मोक्ष, पाप मुक्ति...


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संभल के कल्कि तीर्थ क्षेत्र में स्थित मृत्यु कूप, चतुर्मुख कूप, ब्रह्म कूप, ऋषिकेश कूप और पराश्रेश्वर कूप धार्मिक आस्था के प्रमुख केंद्र माने जाते हैं. इन प्राचीन कूपों से मोक्ष, पाप मुक्ति, पितृ दोष शांति और मनोकामना पूर्ति जैसी कई पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं.

संभल में ऐसे पांच कूप हैं, जो बेहद खास माने जाते हैं. इन कूपों की अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं हैं. इनमें मृत्यु कूप जामा मस्जिद के पास स्थित एक अत्यंत प्राचीन कुआं है, जिसे मोक्ष प्राप्ति का केंद्र माना जाता है. चतुर्मुख कूप, ब्रह्म कूप, आलम सराय स्थित प्राचीन कूप, ऋषिकेश कूप और पराश्रेश्वर कूप भी प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हैं. ऋषिकेश कूप का कायाकल्प और विकास 15वें वित्त आयोग की सहायता से किया जा रहा है. वहीं, पराश्रेश्वर कूप को भी ऐतिहासिक धरोहर संरक्षण अभियान के तहत संवारा जा रहा है.

संभल में स्थित मृत्यु कूप एक प्राचीन धार्मिक स्थल है, जिसे कल्कि तीर्थ का प्रमुख हिस्सा माना जाता है. पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, संभल को भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि की जन्मभूमि बताया गया है. मान्यता है कि कलियुग के अंत में भगवान कल्कि इसी भूमि पर अवतरित होंगे और इसी कुएं के जल से आचमन कर धर्म की स्थापना करेंगे. इस कुएं का संबंध मृत्यु के देवता यमराज से जोड़ा जाता है, इसलिए इसे मृत्यु कूप कहा जाता है.

श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां के जल में स्नान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है. पितृ दोष, कालसर्प दोष और ग्रह बाधा की शांति के लिए भी यह स्थान अत्यंत प्रभावी माना जाता है. कार्तिक पूर्णिमा, सोमवती अमावस्या, ग्रहण काल और पितृ पक्ष में यहां विशेष भीड़ रहती है. इस दौरान श्रद्धालु सबसे पहले कुएं के पवित्र जल से आचमन करते हैं और सिर पर जल छिड़ककर या स्नान कर स्वयं को शुद्ध करते हैं. इसके बाद कुएं के किनारे बैठकर पितरों के नाम से तिल, जौ, कुश और जल से तर्पण किया जाता है.

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संभल में कल्कि तीर्थ क्षेत्र के पास स्थित चतुर्मुख कूप एक अत्यंत प्राचीन और चमत्कारी कुआं है. इसे चतुर्मुख इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके चारों ओर चार दिशाओं में चार सीढ़ीदार मुख (द्वार) बने हैं, जिनसे नीचे जल तक पहुंचा जाता है. लाल पत्थरों से बना यह कुआं स्थापत्य और वास्तुकला की दृष्टि से अद्भुत है. मान्यता है कि यह कुआं सतयुग काल का है और चारों वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का प्रतीक है. इसकी बनावट ऐसी है कि इसमें सालभर जल रहता है और यह कभी नहीं सूखता. इसके चारों मुख चार युगों और चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं.

पुराणों के अनुसार, भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि का संबंध संभल से है और यह कुआं भी उसी से जुड़ा हुआ है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस कुएं के चारों मुखों से जल लेकर आचमन करने या स्नान करने से चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है. संतान प्राप्ति, रोग नाश और पाप मुक्ति के लिए यहां विशेष पूजा की जाती है. कार्तिक पूर्णिमा, सोमवती अमावस्या और ग्रहण के अवसर पर यहां स्नान का विशेष महत्व है. लोग दूर-दूर से अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं और मानते हैं कि सच्चे मन से जल ग्रहण करने पर हर इच्छा पूरी होती है. यह कुआं संभल की धार्मिक विरासत का प्रमुख केंद्र है.

संभल का ब्रह्म कूप एक पौराणिक और पवित्र कुआं है, जो कल्कि तीर्थ क्षेत्र में स्थित है. मान्यता है कि इस कुएं की रचना स्वयं ब्रह्मा जी ने की थी, इसलिए इसे ब्रह्म कूप कहा जाता है. यह कुआं सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा से जुड़ा होने के कारण अत्यंत पूजनीय माना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, कलियुग में भगवान कल्कि के अवतार से पहले यह कुआं धर्म की रक्षा का प्रतीक बनेगा. श्रद्धालु मानते हैं कि इसके जल से स्नान करने पर ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं. ज्ञान, बुद्धि और संतान प्राप्ति के लिए यहां विशेष पूजा की जाती है. कार्तिक मास में इस कूप का विशेष महत्व माना जाता है.

संभल के कल्कि तीर्थ क्षेत्र में स्थित ऋषिकेश कूप एक प्राचीन और पवित्र कुआं है. ऋषिकेश नाम भगवान विष्णु के एक स्वरूप से जुड़ा हुआ है. मान्यता है कि प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों ने यहां तपस्या की थी और इस कुएं के जल से आचमन किया था. इसी कारण इसका नाम ऋषिकेश कूप पड़ा. इसकी खासियत यह है कि इसका जल कभी दूषित नहीं होता और सालभर निर्मल बना रहता है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां स्नान करने से मन और इंद्रियां शुद्ध होती हैं, पापों का नाश होता है और मानसिक शांति प्राप्त होती है. एकादशी और पूर्णिमा के अवसर पर यहां विशेष पूजा का विधान है.

संभल के कल्कि तीर्थ में स्थित पराश्रेश्वर कूप एक प्राचीन शिव कूप है. इसका नाम महर्षि पराशर और भगवान शिव के नाम पर पड़ा है. मान्यता है कि महर्षि पराशर ने यहां भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी और उनके वरदान से यह कूप प्रकट हुआ. यह कुआं गहरा और पत्थरों से निर्मित है. इसकी विशेषता यह है कि इसके जल से शिवलिंग का जलाभिषेक करने पर कालसर्प दोष, पितृ दोष और ग्रह बाधा शांत होती है. श्रद्धालु मानते हैं कि यहां स्नान करने से पापों का नाश होता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. सोमवार, महाशिवरात्रि और श्रावण मास में यहां जलाभिषेक का विशेष महत्व माना जाता है.

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