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चतरा जिले के प्रतापपुर प्रखंड के हिन्दिया कला और हिन्दिया खुर्द गांवों में छठ से करीब एक महीना पहले बांस के सूप, दउरा, ओड़िया और हाथ के पंखे बनाने का काम तेज हो जाता है। इस काम से दोनों गांवों के परिवारों को सीजन में लाखों रुपए की कमाई होती है। बिहार से भी व्यापारी यहां सामान खरीदने आते हैं। ये गांव सिद्दीकी पंचायत में आते हैं। यहां बैगा, बिरहोर और गंजू आदिवासी समुदायों के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। छठ नजदीक आते ही गांव के लोग रोजमर्रा के काम छोड़कर बांस के सामान बनाने में जुट जाते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, वे साल भर भी यह काम करते हैं, लेकिन छठ से एक महीना पहले उत्पादन बढ़ा देते हैं। इन गांवों के जंगलों का बांस अपनी मजबूती और बेजोड़ लचीलेपन के लिए जाना जाता है। इसी लचीले बांस से यहां के लोग बेहद खूबसूरत और कलात्मक सूप व दउरा तैयार करते हैं। इन गांवों के बने सूप और दउरा की मांग सिर्फ चतरा या झारखंड तक ही सीमित नहीं है, बल्कि औरंगाबाद स्थित ऐतिहासिक देव सूर्य मंदिर, गया जिले के इमामगंज, रानीगंज, शेरघाटी, डोभी, बोधगया और राजधानी रांची तक फैली हुई है। हर साल बेसब्री से करते हैं छठ का इंतजार
बिहार के सलैया थाना क्षेत्र के पकरी से सूप खरीदने पहुंचे व्यापारी बिलास साव ने बताया कि वे हर साल बेसब्री से छठ का इंतजार करते हैं और विशेष रूप से हिन्दिया कला व खुर्द गांव से ही सामान खरीदकर ले जाते हैं, जिसकी भारी मांग ऊपर के बाजारों में रहती है। इस गांव के लोगों का जज्बा किसी प्रेरणा से कम नहीं है। हिन्दिया खुर्द के एक दिव्यांग कारीगर ने अपने पैरों की असमर्थता को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। वह अपने हाथों के हुनर से बांस का सूप और दौरा बनाकर छठ बाजार में बेचते हैं और इसी से अपने पूरे साल का खर्च उठाते हैं। सामान्य दिनों में जो सूप 30 से 50 रुपए में बिकता है, वह छठ के सीजन में दोगुना यानी 100 से 150 रुपए तक बिकता है। हिन्दिया खुर्द में लगभग 30 और हिन्दिया कला में करीब 40 परिवार रहते हैं। रोज एक हजार से 15 सौ रुपए की होती है कमाई
एक परिवार दिनभर में 10 से 15 सूप-दौरे आसानी से तैयार कर लेता है। इस तरह एक परिवार की रोजाना की कमाई 1,000 से 1,500 रुपए तक हो जाती है। पूरे गांवों की संयुक्त दैनिक कमाई हजारों में और महीने के इस सीजन में लाखों रुपए तक पहुंच जाती है। मौके पर पहुंचे समाजसेवी पिंटू चौधरी ने भी इस बात की पुष्टि की है कि छठ के दौरान इन गांवों में व्यापारियों का तांता लगा रहता है। हालांकि, ग्रामीणों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि यदि वन विभाग और सरकार इन आदिवासी कलाकारों की कला को बढ़ावा देने के लिए थोड़ी पहल और सहायता करे, तो इनकी मेहनत को और भी उचित मूल्य मिल सकता है।
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