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रांची के मोराबादी मैदान में आयोजित कृषि व्यापार मेले में बुढ़मू प्रखंड के किसानों ने सात वैरायटी की ऑर्गेनिक शहद प्रदर्शित की है. जामुन, सहजन, लीची, करंज, पंच तुलसी, रॉक और देशी शहद 400 से 600 रुपये प्रति किलो मिल रही है. वहीं, देसी मधुमक्खी की शहद 1600 रुपये प्रति किलो उपलब्ध है. सहजन शहद की मांग भी तेजी से बढ़ रही है.
रांची: झारखंड की राजधानी रांची के मोराबादी मैदान में झारखंड सरकार द्वारा आयोजित तीन दिवसीय कृषि व्यापार मेले में राज्य के विभिन्न जिलों से आए किसान अपने अनोखे कृषि उत्पादों का प्रदर्शन कर रहे हैं. इसी मेले में रांची के बुढ़मू प्रखंड का एक शहद स्टॉल लोगों के बीच खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. यहां एक-दो नहीं, बल्कि सात अलग-अलग किस्म की ऑर्गेनिक शहद उपलब्ध है, जो अपने स्वाद, पौष्टिकता और औषधीय गुणों के कारण लोगों का ध्यान खींच रही है.
कई विशेष किस्मों की शहद उपलब्ध
स्टॉल संचालक राधाकांत गिरी ने बताया कि आमतौर पर बाजार में एक या दो प्रकार की शहद ही आसानी से मिलती है, लेकिन उनके स्टॉल पर जामुन शहद, सहजन (मोरिंगा) शहद, लीची शहद, करंज शहद, पंच तुलसी शहद, रॉक शहद और देशी शहद जैसी कई विशेष वैरायटी उपलब्ध हैं. इनकी कीमत 400 रुपये से 600 रुपये प्रति किलो तक है. वहीं, देसी मधुमक्खियों द्वारा तैयार की गई विशेष शहद 1600 रुपये प्रति किलो की दर से बेची जा रही है.
प्राकृतिक तरीके से तैयार होती है शहद
राधाकांत गिरी ने बताया कि मधुमक्खी पालन के माध्यम से पूरे वर्ष शहद का उत्पादन नहीं होता, बल्कि लगभग छह महीने तक ही शहद का संग्रह किया जाता है. जिस पौधे या पेड़ के फूलों से विशेष प्रकार की शहद तैयार करनी होती है, उसके फूल आने के समय उसी क्षेत्र के आसपास मधुमक्खी के बॉक्स लगाए जाते हैं. मधुमक्खियां फूलों का रस एकत्र कर प्राकृतिक रूप से शहद तैयार करती हैं.
विशेष प्रकार की शहद तैयारjex;r vd/tp
राधाकांत गिरी के मुताबिक, सहजन (मोरिंगा) को सुपरफूड माना जाता है, क्योंकि इसमें कैल्शियम, आयरन, एंटीऑक्सीडेंट और कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं. सहजन के फूलों के मौसम में उसके आसपास मधुमक्खी बॉक्स लगाए जाते हैं. इससे मधुमक्खियां फूलों का रस एकत्र कर विशेष प्रकार की शहद तैयार करती हैं. इसी प्रकार जामुन और लीची के फूलों के मौसम में उनके बागानों के पास भी मधुमक्खी बॉक्स लगाए जाते हैं, जिससे उन फूलों के गुणों वाली शहद तैयार होती है.
बढ़ रही है मांग
राधाकांत गिरी ने बताया कि शहद तैयार होने के बाद इसे बिना किसी रासायनिक प्रक्रिया के प्राकृतिक तरीके से साफ किया जाता है और स्वच्छ पैकेजिंग के साथ उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाता है. यही वजह है कि इन विशेष वैरायटी की शहद की मांग लगातार बढ़ रही है. उन्होंने यह भी बताया कि शुद्ध शहद की कोई निश्चित एक्सपायरी डेट नहीं होती. हालांकि इसके उपयोग और भंडारण के दौरान साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए. शहद में पानी या नमी नहीं जाने देना चाहिए. सही तरीके से संग्रहित करने पर शहद लंबे समय तक सुरक्षित रहती है और अपनी गुणवत्ता बरकरार रखती है.
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न्यूज़18इंडिया में कार्यरत हैं. आजतक से रिपोर्टर के तौर पर करियर की शुरुआत फिर सहारा समय, ज़ी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़ी. टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने क…और पढ़ें