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बेल्जियम का साधु जो भारत में बना संस्कृत का दीवाना, पद्म भूषण...


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Ranchi News: रांची के फादर कामिल बुल्के बेल्जियम से आकर हिंदी, संस्कृत और रामकथा के बड़े विद्वान बने. वह पद्म भूषण से सम्मानि किए गए. संत जेवियर कॉलेज में उनकी जयंती और विरासत आज भी याद की जाती है.

 रांची के साहित्यकार मनोज करपरदार फादर कामिल बुल्के की भाषा से आपको रूबरू कराएंगे. वह एक से बढ़कर एक साहित्य की किताबें लिख चुके हैं. उनको पद्म भूषण से भी नावजा गया है. संस्कृत के लिए उनका प्रेम गजब का था. खासतौर पर उन्होंने रामायण पर पूरी की पूरी कथा लिख डाली है. वह तुलसीदास और वाल्मीकि जी के भक्त हो गए और उनकी रचनाओं को पढ़ते थे.

रांची के फिरायालाल चौक समीप 1-2 किलोमीटर लंबा सड़क है, जिसे कहा जाता है फादर कामिल बुल्के पथ. यहां हर दिन हजारों लोग इस सड़क से पार होते हैं, लेकिन उन्हें पता नहीं कि आखिर यह फादर कामिल बुल्के है कौन. दरअसल, यह बेल्जियम से भारत आए थे और रांची आकर उन्होंने देखा कि लोग अपने ही भाषा से अंजान है और इंग्लिश में बात करना बहुत प्राउड समझते है.

दरअसल, वह यहां पर मिशनरी के तौर पर आए थे. यहां के लोगों को ईसाई धर्म के प्रति जागरूक करना था और अंग्रेजी सीखाना, लेकिन हो गया सीधा उल्टा. भारत के कई सारे प्राचीन ग्रंथो को पढ़ा तो उन्हें लगा यह तो असली खजाना है और ये खजाना यहां के लोग नहीं जानते. अब इसी पर काम होगा. उन्होंने गुमला में 5 साल तक गणित पढ़ाया और हिंदी, ब्रजभाषा व अवधी सीखी. संस्कृत के प्रति उनका प्रेम ऐसा था कि वह संस्कृत को महारानी और अंग्रेजी को नौकरानी कहते थे.

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उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय (1942-44) से संस्कृत में मास्टर डिग्री और आखिर में इलाहाबाद विश्वविद्यालय (1945-49) में हिंदी साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की. इस शोध का शीर्षक था राम कथा की उत्पत्ति और विकास. साथ ही रांची में साहित्यकारों के बीच उनकी लोकप्रियता ऐसी है कि उनकी जयंती मनाई जाती है. वह संत ज़ेवियर कॉलेज में हर साल सम्मेलन भी होता है. जहां पर इनकी साहित्य, किताबें हर चीज पर चर्चा होती है.

उन्होंने एक से बढ़कर एक किताब लिखी हैं, जिनमें मुख्य रूप से रामकथा : उत्पत्ति और विकास, हिंदी-अंग्रेजी लघुकोश, अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश, मुक्तिदाता, (हिंदी) नया विधान, 1977, (हिंदी) नीलपक्षी. मनोज बताते हैं कि ये सारे उनके मास्टर पीस हैं. अगर यह सब आप पढ़ लें तो हिंदी साहित्य में आपकी अच्छी पकड़ बन जाएगी. आज उनकी कब्र भी रांची के संत ज़ेवियर कॉलेज में बनी हुई है. जहां पर लोग हर साल कैंडल जलाते और फूल चढ़ाते हैं. यहां पर उनके नाम से लाइब्रेरी भी है.



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