पलामू: भारत में चीते के विलुप्त होने के बाद अक्सर वन्यजीव संरक्षण की चर्चा बाघ और हाथियों तक सीमित रह जाती है, लेकिन इन्हीं चर्चाओं के बीच एक ऐसा शिकारी चुपचाप अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, जिसकी संख्या अब देशभर में 3000 से भी कम बची है. यह है भारतीय धूसर भेड़िया, जिसे वैज्ञानिक भाषा में “कैनिस ल्यूपस पैलिप्स” कहा जाता है. आइये जानते हैं इसके बारे में.
झारखंड के लातेहार जिले में स्थित महुआडांड़ भेड़िया अभ्यारण्य इस दुर्लभ प्रजाति का सबसे सुरक्षित ठिकाना माना जाता है. जो कि पलामू जिला मुख्यालय मेदिनीनगर से 117 किलोमीटर दूर स्थित है. वर्ष 1976 में स्थापित यह भारत का पहला और एशिया का इकलौता भेड़िया अभ्यारण्य है, जो करीब 63.25 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है.
जानें इस अभ्यारण्य की खासियत
दरअसल, पलामू टाइगर रिजर्व के दक्षिणी हिस्से में बसे इस अभ्यारण्य की सबसे खास बात यहां का प्राकृतिक संतुलन और आदिवासी संस्कृति है. यहां रहने वाले अधिकांश लोग सरना धर्म को मानने वाले आदिवासी हैं, जो प्रकृति को पूजते हैं. उनकी परंपराएं अनजाने में ही भेड़ियों के संरक्षण का मजबूत आधार बन गई हैं. सरना समुदाय नवंबर से फरवरी तक साल जंगलों में प्रवेश नहीं करता, क्योंकि इसे साल वृक्ष के फूलने का पवित्र समय माना जाता है. यही समय भारतीय भेड़ियों के प्रजनन और मांद बनाने का भी होता है. जंगलों में मानवीय दखल कम होने से भेड़ियों को सुरक्षित माहौल मिल जाता है.
जानें यहां कितने हैं भेड़िए
वन्यजीव शोधकर्ता शहज़ादा इकबाल ने लोकल18 को बताया कि महुआडांड़ के साल जंगल भेड़ियों के लिए 63.25 वर्ग किलोमीटर में फैला आदर्श लैंडस्केप हैं. यहां घने जंगल, शांत वातावरण और पर्याप्त घासभूमि उन्हें मांद बनाने और बच्चों को सुरक्षित रखने में मदद करती है. वर्तमान में यहां लगभग 40 से 50 भेड़िए पाए जाते हैं. भारतीय भेड़िया मूल रूप से घासभूमि पसंद करने वाला जीव है, इसलिए यहां वन विभाग के द्वारा ग्रासलैंड डेवलपमेंट और जंगली शाकाहारी जीवों की संख्या बढ़ाने पर विशेष काम किया जा रहा है, ताकि उनका प्राकृतिक भोजन और आवास सुरक्षित रह सके.
उन्होंने कहा कि भेड़ियों की छवि आज भी लोगों के बीच डर और गलतफहमियों से घिरी हुई है. कभी-कभार मवेशियों के शिकार की घटनाओं के कारण उन्हें खतरनाक मान लिया जाता है, जबकि पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. वे जंगल में शिकार प्रजातियों की संख्या नियंत्रित कर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं. यदि ऐसे अभ्यारण्यों को संरक्षण और संवेदनशील पर्यटन से जोड़ा जाए, तो यह क्षेत्र न सिर्फ वन्यजीव संरक्षण बल्कि इको-टूरिज्म का भी बड़ा केंद्र बन सकता है.
वन्यजीव प्रेमियों का है पसंदीदा ठिकाना
प्राकृतिक सौंदर्य, घने साल जंगल, घासभूमियां और प्रसिद्ध लोढ़ जलप्रपात के कारण महुआडांड़ अब धीरे-धीरे वन्यजीव प्रेमियों और प्रकृति पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन रहा है. यह अभ्यारण्य बताता है कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और जैव विविधता का ऐसा संसार हैं, जिन्हें बचाना आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहद जरूरी है. यहां भेड़ियों को सिर्फ देखा नहीं जाता, बल्कि जंगल की खामोशी में उन्हें महसूस किया जाता है.