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सफल रहा यह प्रयोग तो झारखंड के किसान उगाएंगे सेब, पलामू में...


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सफल रहा यह प्रयोग तो झारखंड के किसान उगाएंगे सेब, पलामू में शुरू है टेस्टिंग

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कृषि वैज्ञानिक डॉ० प्रमोद कुमार ने कहा कि शोध के दौरान यह भी देखा जा रहा है कि पलामू की जलवायु में बारिश का सेब की गुणवत्ता पर क्या प्रभाव पड़ता है. प्रारंभिक परीक्षण में पाया गया है कि बरसात के दौरान फलों का आकार अपेक्षाकृत छोटा रह जाता है और अधिक नमी के कारण कई बार फल सड़ने भी लगते हैं. इन समस्याओं के समाधान पर भी वैज्ञानिक काम कर रहे हैं.

झारखंड का पलामू जिला जो कि सुखाड़ प्रभावती जिला है. यहां सेब पर शोध चल रहा है. पलामू के मेदिनीनगर स्थित क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, चियांकी में पहली बार सेब की खेती को लेकर व्यापक वैज्ञानिक परीक्षण किया जा रहा है. बदलती जलवायु के बीच यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि पलामू जैसे गर्म क्षेत्र में कौन से सेब की किस्म बेहतर उत्पादन दे सकती है. परीक्षण के दौरान पौधों में फल भी आने लगे हैं, जिससे वैज्ञानिकों को सकारात्मक परिणाम मिलने की उम्मीद है.

कृषि वैज्ञानिक डॉ० प्रमोद कुमार ने बताया कि अनुसंधान केंद्र में फिलहाल हरमन-99 किस्म के सेब के पौधों पर शोध चल रहा है. यहां अलग अलग प्रभेद के पौधों का परीक्षण किया जा रहा है और इन पौधों में फल भी निकलने लगे हैं. इन फलों की गुणवत्ता, आकार, स्वाद और उत्पादन क्षमता का लगातार अध्ययन कर रहे हैं, ताकि यह तय किया जा सके कि यह किस्म पलामू की जलवायु के लिए कितनी उपयुक्त है.

उन्होंने कहा कि शोध का मुख्य उद्देश्य ड्रिप फर्टिगेशन यानी टपक सिंचाई के साथ उर्वरक प्रबंधन का प्रभाव जानना है. यह भी पता लगाया जा रहा है कि इस तकनीक से पौधों तक पोषक तत्व कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचते हैं और इसका पौधों की वृद्धि, फल की गुणवत्ता तथा उत्पादन पर कितना असर पड़ता है.

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आगे बताया कि ड्रिप फर्टिगेशन तकनीक अपनाने से पौधों को आवश्यक पोषक तत्व सीधे जड़ों तक पहुंचते हैं. इससे पानी और उर्वरक दोनों की बचत होती है. साथ ही पौधों का विकास बेहतर होता है और उत्पादन बढ़ने की संभावना रहती है.

उन्होंने कहा कि शोध के दौरान यह भी देखा जा रहा है कि पलामू की जलवायु में बारिश का सेब की गुणवत्ता पर क्या प्रभाव पड़ता है. प्रारंभिक परीक्षण में पाया गया है कि बरसात के दौरान फलों का आकार अपेक्षाकृत छोटा रह जाता है और अधिक नमी के कारण कई बार फल सड़ने भी लगते हैं. इन समस्याओं के समाधान पर भी वैज्ञानिक काम कर रहे हैं.

आगे कहा कि अनुसंधान केंद्र में अलग-अलग सेब की किस्मों का परीक्षण इसलिए किया जा रहा है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि पलामू और झारखंड की जलवायु में कौन-सी किस्म सबसे बेहतर प्रदर्शन करती है. सफल परीक्षण के बाद किसानों को उसी किस्म की खेती की सलाह दी जाएगी.

आगे कहा कि यदि यह शोध सफल रहता है तो पलामू के किसान पारंपरिक फसलों के साथ सेब की व्यावसायिक खेती भी कर सकेंगे. इससे किसानों की आय बढ़ेगी और बागवानी के क्षेत्र में नए अवसर पैदा होंगे. कम लागत में आधुनिक तकनीक अपनाकर बेहतर उत्पादन लेने का रास्ता भी खुलेगा.

क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, चियांकी का यह शोध केवल सेब की खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य आधुनिक बागवानी तकनीकों को बढ़ावा देना भी है. यदि परीक्षण सफल रहा तो ड्रिप फर्टिगेशन जैसी तकनीक के जरिए जल संरक्षण, उर्वरक की बचत और बेहतर गुणवत्ता वाले फलों का उत्पादन संभव होगा. इससे झारखंड में बागवानी के क्षेत्र को नई दिशा मिलने की उम्मीद है.



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