Jharkhand JSSC CGL Exam Cancelled: रांची में सोमवार की रात बारिश हो रही थी. सड़कें भीग रही थीं और झारखंड मंत्रालय के बाहर कुछ लोग सिर झुकाए खड़े थे. फर्क बस इतना था कि कुछ घंटे पहले तक ये लोग सरकारी दफ्तरों में अपनी ड्यूटी कर रहे थे. किसी के हाथ में ऑफिस की फाइल थी, किसी की जेब में सरकारी आईडी और किसी की शर्ट की जेब में रोज की तरह पेन. लेकिन शाम होते-होते सब कुछ बदल गया. किसी ने मां को फोन किया तो आवाज रोते-रोते टूट गई. रोशन कुमार ने फोन पर बस इतना कहा, ‘सब खत्म हो गया मां…’ जिस नौकरी के लिए सालों पढ़ाई की, कानूनी लड़ाई लड़ी और आखिरकार नियुक्ति मिली, वही नौकरी अब एक सरकारी फैसले के बाद फिर सवालों में है. झारखंड में JSSC-CGL परीक्षा रद्द होने के बाद करीब 2 हजार नियुक्त कर्मचारियों के सामने यही सबसे बड़ा सवाल है. इस परीक्षा को रद्द करने के लिए रांची में छात्र प्रदर्शन कर रहे थे. प्रदर्शन के बाद सरकार ने ये फैसला लिया है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार यह कहानी सिर्फ एक परीक्षा रद्द होने की नहीं है. इसके पीछे उन युवाओं के सालों के संघर्ष हैं, परिवारों की उम्मीदें हैं और कर्ज लेकर पढ़ाई करने की मजबूरी है. किसी ने कोचिंग के पैसे नहीं होने पर अकेले तैयारी की. किसी ने दूसरी नौकरी छोड़कर सरकारी नौकरी का सपना देखा. किसी ने घर चलाने के लिए सरकारी वेतन पर भरोसा किया. नियुक्ति मिलने के बाद इन युवाओं को लगा था कि संघर्ष का लंबा दौर खत्म हो गया. लेकिन अब वे उसी मंत्रालय के बाहर खड़े हैं, जहां वे सुबह कर्मचारी बनकर जाते थे. उनके हाथ में अब सरकारी पहचान पत्र नहीं, बल्कि अपने भविष्य को बचाने की गुहार है.
नौकरी मिली, जिंदगी पटरी पर आई और फिर सब उलट गया
सोमवार शाम झारखंड सरकार ने छात्रों के लंबे आंदोलन के बीच JSSC-CGL परीक्षा रद्द करने का फैसला लिया. परीक्षा में कथित गड़बड़ियों को लेकर अभ्यर्थी लगातार कार्रवाई की मांग कर रहे थे. आंदोलनकारियों के लिए यह फैसला बड़ी जीत जैसा था, लेकिन परीक्षा पास करके नियुक्ति पा चुके करीब 2 हजार युवाओं के लिए यही आदेश किसी सदमे से कम नहीं था.
रोशन कुमार की कहानी इस दर्द को सबसे करीब से दिखाती है. गिरिडीह के रहने वाले रोशन इतिहास से ग्रेजुएट हैं. उन्होंने 2019 से सरकारी नौकरी की तैयारी शुरू की थी. परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि महंगी कोचिंग करा सके. पिता छोटी पान की दुकान चलाते हैं और मां पैरा-टीचर हैं. JSSC-CGL उनका पहला बड़ा चयन था. जनवरी में उन्हें असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर के तौर पर नेपाल हाउस में पोस्टिंग मिली थी. लेकिन सोमवार की रात वह अपने माता-पिता को फोन करके रो रहे थे.
चंदा बोलीं- जिस गेट से रोज अंदर जाते थे, आज वहीं से धक्के मिले
- चंदा कुमारी की आंखों के सामने भी अचानक उनकी नौकरी का भविष्य धुंधला हो गया. हजारीबाग की रहने वाली चंदा कैबिनेट सचिवालय और विजिलेंस विभाग में जूनियर सेक्रेटेरिएट असिस्टेंट थीं. परिवार में पांच भाई-बहनों में वह सबसे बड़ी हैं और घर की जिम्मेदारी काफी हद तक उन्हीं पर है. उनका कहना है कि अगर नौकरी चली गई तो सिर्फ उनका नहीं, पूरे परिवार का भविष्य सड़क पर आ जाएगा.
- सबसे ज्यादा चोट उन्हें उस पल लगी, जब वह अपने ही ऑफिस में दाखिल नहीं हो सकीं. जिस गेट पर रोज आईडी कार्ड दिखाकर अंदर जाती थीं, वहां पुलिसकर्मियों ने उन्हें रोक दिया. चंदा ने कहा कि पुलिस वाले पहले उन्हें चेहरे से पहचानते थे, लेकिन अब वही उन्हें अंदर जाने से रोक रहे हैं. उनके मुताबिक, परीक्षा में शामिल नहीं होने वाले प्रदर्शनकारियों की मांग पूरी होने का असर उन लोगों पर पड़ा है जिन्होंने परीक्षा पास की थी.
बारिश में भी खड़े रहे कर्मचारी, बोले- अब जाएं तो जाएं कहां
- सुधीर कुमार मंगलवार को हजारीबाग से रांची पहुंचे. वह JSSC-CGL पास करके असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर बने थे. मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा और फिर बीटेक करने वाले सुधीर ने गुरुग्राम में एक साल नौकरी भी की थी. आर्थिक परेशानी के बावजूद उन्होंने सरकारी नौकरी की तैयारी जारी रखी. रेलवे में भी उनका चयन हुआ था और वह ट्रेनिंग तक ले चुके थे, लेकिन झारखंड सरकार की नौकरी इसलिए चुनी क्योंकि वह अपनी बुजुर्ग मां के करीब रहना चाहते थे.
- अब वही सुधीर बारिश में भीगते हुए मंत्रालय के बाहर खड़े थे. पत्नी ने उन्हें बारिश से बचने के लिए कहा तो उनका जवाब था, ‘हमने सब कुछ खो दिया है, अब बारिश मेरा क्या बिगाड़ेगी?’ सुधीर की सबसे बड़ी चिंता उम्र को लेकर है. वह करीब 31 साल के हैं और उनका कहना है कि अगर उन्हें फिर से परीक्षा की तैयारी करनी पड़ी तो उम्र सीमा निकलने का खतरा है. यानी उनके लिए यह सिर्फ नौकरी जाने का डर नहीं, बल्कि दोबारा शुरुआत करने का मौका खत्म होने का डर भी है.
पांच लाख का कर्ज, तीन बहनों की शादी और अब नौकरी का संकट
करीब 35 साल के विकास कुमार शर्मा भी इसी भीड़ में खड़े थे. जेब में पेन था और शरीर पर वही फॉर्मल कपड़े, जिन्हें पहनकर वह रोज मंत्रालय जाते थे. उन्होंने जूनियर सेक्रेटेरिएट असिस्टेंट के तौर पर काम किया. परिवार की जिम्मेदारियों के चलते उन पर करीब पांच लाख रुपए का कर्ज है. तीन बहनों की शादी के लिए उन्होंने कर्ज लिया था. नौकरी मिलने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि धीरे-धीरे यह कर्ज चुका देंगे और परिवार की जिंदगी बेहतर होगी.
विकास ने बताया कि उन्होंने 2011 से झारखंड की सरकारी नौकरियों के लिए परीक्षाएं दीं. कई बार असफल हुए. 2018 में पुलिस सब-इंस्पेक्टर की भर्ती में वह फिजिकल टेस्ट महज 44 सेकेंड से चूक गए थे. आखिरकार JSSC-CGL में सफलता मिली और उन्हें लगा कि अब वर्षों का संघर्ष खत्म हो गया. लेकिन परीक्षा रद्द होने के बाद वह उसी मंत्रालय के बाहर खड़े थे. उनकी बात में इस पूरे संकट का दर्द साफ झलकता है, ‘सुबह जिस ऑफिस में कर्मचारी बनकर आए थे, शाम को उसी के बाहर प्रदर्शनकारी बनकर खड़े थे.’
क्यों इतना लंबा चला JSSC-CGL का विवाद?
JSSC-CGL की कहानी भी छोटी नहीं है. भर्ती प्रक्रिया की शुरुआत 2015-16 के आसपास हुई थी और इसके बाद परीक्षा कई विवादों, देरी और कानूनी लड़ाइयों से गुजरी. 2024 में मामला झारखंड हाईकोर्ट पहुंचा. परीक्षा में कथित पेपर लीक की जांच और नियुक्तियों पर रोक की मांग की गई. दिसंबर 2024 में कोर्ट ने स्टेटस को बरकरार रखने का आदेश दिया. करीब एक साल बाद दिसंबर 2025 में हाईकोर्ट ने CBI जांच की मांग खारिज कर दी और अंतिम परिणाम जारी करने तथा सफल उम्मीदवारों की नियुक्ति का रास्ता साफ किया. इसके बाद उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र मिले.
यही वजह है कि नियुक्ति पा चुके युवाओं को अब परीक्षा रद्द होने का फैसला और ज्यादा बड़ा झटका लग रहा है. उन्हें लगा था कि कानूनी विवाद खत्म हो चुका है और उनकी नौकरी सुरक्षित है. अब उनका कहना है कि अगर परीक्षा में गड़बड़ी हुई थी तो इसकी कीमत उन लोगों से क्यों वसूली जा रही है, जिन्होंने पूरी प्रक्रिया से गुजरकर सफलता हासिल की और नौकरी ज्वाइन कर ली? दूसरी तरफ आंदोलनकारी अभ्यर्थियों का तर्क है कि परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल हैं और पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बहाल करना जरूरी है. इस खींचतान के बीच करीब 2 हजार नियुक्त कर्मचारियों का भविष्य सबसे ज्यादा असमंजस में है.