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Sitsar Balaji Dham History: झुंझुनूं के सीतसर बालाजी धाम की स्थापना की कहानी करीब 101 साल पुरानी है. 41 दिन की कठिन साधना के बाद गांव में आग लगने और अकाल का संकट थमा था, जो आज लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है.
झुंझुनूं: आस्था की ऐसी कहानी, जिसकी शुरुआत गांव की परेशानी और संकट से हुई. कभी भीषण अकाल और घरों में रोज लगने वाली आग से परेशान सीतसर गांव के लोगों ने संकट से मुक्ति के लिए हनुमानजी से मन्नत मांगी थी. ग्रामीणों की मान्यता है कि 41 दिन की कठिन साधना के बाद गांव में आग लगने का सिलसिला थम गया और बारिश भी हुई. इसके बाद यहां बालाजी मंदिर की स्थापना हुई. आज यही स्थान सीतसर बालाजी धाम के नाम से हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन चुका है.
झुंझुनूं शहर से करीब 5 किलोमीटर दूर सीतसर गांव में स्थित इस धाम की स्थापना की कहानी करीब 101 साल पुरानी बताई जाती है. शुरुआत में यहां छोटा-सा मंदिर बनाया गया था, लेकिन समय के साथ श्रद्धालुओं की आस्था बढ़ती गई. लोगों के सहयोग से आज यहां विशाल मंदिर बन चुका है. हर साल 5 लाख से अधिक श्रद्धालु बालाजी के दर्शन करने पहुंचते हैं. श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी होने पर यहां सालभर में एक लाख से अधिक सवामणियां होती हैं और अखंड भंडारा चलता रहता है.
सूर्य की पहली किरण सीधे बालाजी के मुख पर पड़ती है
सीतसर बालाजी धाम की एक खास विशेषता यहां स्थापित हनुमान प्रतिमा पर सूर्य की पहली किरण का सीधे पड़ना है. मंदिर में सुबह सूर्य की पहली किरण बालाजी के मुख पर आती है. इसे श्रद्धालु अद्भुत संयोग और धाम की विशेषता मानते हैं. महंत पुष्करलाल पारीक बताते हैं कि सूर्य की किरणों का सीधे बालाजी की प्रतिमा पर पड़ना यहां का विशेष आकर्षण है. इसी तरह श्रद्धालुओं की अटूट आस्था के चलते धाम में बड़ी संख्या में सवामणियां होती हैं.
41 दिन की साधना के बाद थमा था आग लगने का सिलसिला
ग्रामीणों के अनुसार, विक्रम संवत 1970 के दौरान क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा हुआ था. हालात इतने खराब थे कि गांव के लोगों को खाने-पीने के संकट से जूझना पड़ रहा था. दूसरी ओर, फूस से बने घरों में आए दिन अचानक आग लग जाती थी. आग की घटनाओं में ग्रामीणों का सबकुछ जलकर नष्ट हो जाता था. लगातार दोहरी परेशानी झेल रहे ग्रामीणों ने इसका समाधान तलाशना शुरू किया.
अकाल और आग की घटनाओं से मुक्ति
इसी दौरान गांव के लोग चूरू जिले के जोगलिया से आकर बसे राजपुरोहित परिवार के हनुमान भक्त सावंलराम महाराज के पास पहुंचे. सावंलराम महाराज अपने माता-पिता के साथ रहते थे और खेती का काम करते थे. ग्रामीणों की परेशानी सुनकर उन्होंने गांव को अकाल और आग की घटनाओं से मुक्ति दिलाने की मन्नत मांगी.
बालाजी की कृपा और सावंलराम महाराज की तपस्या
इसके बाद सावंलराम महाराज ने गांव के जोहड़ में खुले आसमान के नीचे बैठकर 41 दिन तक निराहार रहकर साधना शुरू की. इस दौरान ग्रामीण भी सामूहिक रूप से रामायण पाठ करते थे. ग्रामीणों के अनुसार, साधना के दौरान रोजाना काले बादलों का समूह आता और बारिश होती थी. 41 दिन की साधना पूरी होने के बाद गांव में आग लगने की घटनाएं बंद हो गईं. ग्रामीण इसे बालाजी की कृपा और सावंलराम महाराज की तपस्या का फल मानते हैं.
छोटे मंदिर से विशाल धाम तक का सफर
गांव में संकट दूर होने के बाद सावंलराम महाराज ने यहां हनुमान मंदिर का निर्माण शुरू करवाया. उनकी भक्ति और साधना की चर्चा आसपास के गांवों तक पहुंची तो दूर-दराज से भी श्रद्धालु आने लगे. धीरे-धीरे लोगों का सहयोग मिलता गया और छोटा-सा मंदिर एक विशाल धाम के रूप में विकसित हो गया.
मंदिर की जिम्मेदारी महंत पुष्करलाल पारीक संभाल रहे
आज सीतसर बालाजी धाम में सालभर श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है. यहां होने वाली सवामणियों और अखंड भंडारे में बड़ी संख्या में भक्त शामिल होते हैं. करीब एक सदी पहले गांव की परेशानियों के बीच शुरू हुई यह आस्था आज पूरे क्षेत्र की पहचान बन चुकी है. वर्तमान में मंदिर की जिम्मेदारी महंत पुष्करलाल पारीक संभाल रहे हैं.