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Bokaro ka purana ropeway : स्थानीय ग्रामीण गोपाल महतो उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि इस रोपवे की नींव 1968-69 में रखी गई थी और 1971 में काम पूरा हुआ था. उस समय जमीन अधिग्रहण के दौरान कई स्थानीय लोगों को नौकरी भी मिली थी, जिससे यह परियोजना उनकी यादों में आज भी जिंदा है और इस रोपवे परियोजना का निर्माण जोसेफ कंपनी द्वारा करीबन 14 करोड़ रुपये की लागत से किया गया था.
कैलाश कुमार : बोकारो जिले के चंद्रपुरा प्रखंड में दामोदर नदी के किनारे बस्तेजी और बुडीडीह के बीच स्थित ऐतिहासिक रोपवे महज लोहे का ढेर नहीं, बल्कि जिले की औद्योगिक विरासत का जीवंत प्रतीक है भले ही समय के साथ काम खत्म हो चुका हो, लेकिन आज भी इस रोपवे कि हवा में झूलती जर्जर ट्रॉलियां पुराने दौर की याद दिलाती हैं
बुडीडीह के स्थानीय ग्रामीण गोपाल महतो उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि इस रोपवे की नींव 1968-69 में रखी गई थी और 1971 में काम पूरा हुआ था और उस समय जमीन अधिग्रहण के दौरान कई स्थानीय लोगों को नौकरी भी मिली थी, जिससे यह परियोजना उनकी यादों में आज भी जिंदा है. इस रोपवे परियोजना का निर्माण जोसेफ कंपनी द्वारा करीबन 14 करोड़ रुपये की लागत से किया गया था और इसे बनाने के लिए खासतौर पर विदेशी इंजीनियर आए थे.
यहां से कोयला स्टील प्लांट और ब्लास्ट फर्नेस तक भेजा जाता
वहीं, गांव के दुसरे ग्रामीण शब्बीर अंसारी के अनुसार, इस रोपवे का मुख्य उद्देश्य दुग्धा वाशरी प्लांट में धुले कोयले को बड़े आकार की ट्रोलियों के जरिए निर्धारित डंपिंग यार्ड तक पहुंचाना था यहां से कोयला स्टील प्लांट और ब्लास्ट फर्नेस तक भेजा जाता था, जो उस समय औद्योगिक उत्पादन की रीढ़ माना जाता था ,लेकिन महज कुछ ही साल के संचालन के बाद यह परियोजना सफल नहीं हो पाई और फिर आधुनिक तकनीक के विकास और रेलवे लाइन के विस्तार के साथ इस रोपवे की उपयोगिता घटती चली गई और आखिर में इसे बंद करना पड़ा
वहीं भले ही आज यह रोपवे बेकार पड़ा हो, लेकिन दामोदर नदी के किनारे खड़ी इसकी ऊंची संरचनाएं और लटकी हुई ट्रॉलियां आज भी बोकारो के औद्योगिक इतिहास का हिस्सा है ऐसे में इससे इंडस्ट्रियल हेरिटेज साइट के रूप में विकसित किया जा सकता है
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7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें