रांची. झारखंड में राज्यसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं. कांग्रेस उम्मीदवार की हार और एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी की जीत ने महागठबंधन के भीतर भरोसे पर सवाल खड़े कर दिए हैं. एक ओर कांग्रेस ने जहां ‘कड़ा निर्णय’ लेने की बात कही है, वहीं राजद की ओर से क्रॉस वोटिंग से इनकार कर उल्टा कांग्रेस को अपनी समीक्षा करने की सलाह देकर सियासी तापमान बढ़ा दिया है. महागठबंध में दरार चौड़ी होने की खबरों के बीच जेडीयू विधायक सरयू राय ने एक नया राजनीतिक फॉर्मूला सामने रखकर नई सियासी चर्चा छेड़ दी है.
सरयू राय ने क्या कहा?
एक टेलिविजन न्यूज चैनल से बातचीत में जेडीयू विधायक सरयू राय ने हेमंत सोरेन को एक फॉर्मूला दिया है जिसमें कांग्रेस को महागठबंधन से बाहर निकालने का फॉर्मूला सुझाया गया है. सरयू राय ने अपने फॉर्मूले में बताया है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा यानी जेएमएं के 34 विधायक हैं, आरजेडी के 4 एमएलए हैं, वाम दल के 2 विधानसभा सदस्य हैं और जेडीयू से वे खुद विधायक हैं. इस तरह विधायकों की संख्या 41 होती है जो 81 सदस्यों वाले झारखंड विधानसभा में बहुमत के लिए काफी है. उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को ऑफर दिया है कि वे इस फॉर्मूले के तहत सरकार बनाएं.
दरअसल, सरयू राय का यह बयान ऐसे समय आया है, जब राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन के घोषित संख्या बल के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा हार गए और एनडीए समर्थित परिमल नाथवानी जीत गए. चर्चा यह है कि महागठबंधन में होकर भी इंडिया ब्लॉक (जेएमएम, आरजेडी, सीपीआईएमएल) के विधायकों में कुछ ने एनडीए समर्थित राज्यसभा उम्मीदवार परिमल नाथवाणी के पक्ष में मत डाले, जिससे उनकी जीत सुनिश्चित हो गई. कांग्रेस के तेवर भी कड़े दिख रहे हैं और महागठबंधन के भीतर दरार भी दिखने लगी है, और ऐसे में झारखंड की राजनीति में सरयू राय के फॉर्मूले की बात शुरू हो गई है.
कांग्रेस की हार ने बढ़ाया आपसी अविश्वास
बता दें कि राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन के पास पर्याप्त संख्या होने का दावा किया जा रहा था. लेकिन, जब वोट के आंकड़े आए तो 81 सदस्यों में से 31 विधायकों ने जेएमएम के बैद्यनाथ राम को, 28 विधायकों ने निर्दलीय परिमल नथवाणी को वोट दिए. वहीं, कांग्रेस के प्रणव झा को 19 वोट मिले और 3 वोट अमान्य घोषित किए गए. ऐसे में कांग्रेस उम्मीदवार की हार ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर क्रॉस वोटिंग किसने की? कांग्रेस के कई नेताओं ने खुलकर सहयोगी दलों पर सवाल उठाए हैं और इसे विश्वासघात तक बताया है. यही कारण है कि अब गठबंधन के भीतर तनाव साफ दिखाई दे रहा है.
कांग्रेस के तीखे तेवर और ‘गद्दार यार’ वाली रार
इस चुनावी शिकस्त के बाद कांग्रेस भी पूरी तरह आक्रामक रुख अख्तियार कर चुकी है. कांग्रेस के मीडिया प्रभारी ने सोशल मीडिया पर पहले ही ‘कड़ा निर्णय लेने’ की चेतावनी दे डाली है. वहीं कांग्रेस विधायक सुरेश बैठा ने खुलकर आरोप लगाया है कि आरजेडी और माले के विधायक फाइव स्टार होटलों में हमारे साथ शाही व्यंजनों का लुत्फ उठा रहे थे और ऐन वक्त पर उन्होंने हमारी पीठ में छुरा भोंक दिया. सुरेश बैठा ने तो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से आरजेडी को कैबिनेट से बाहर करने तक की मांग कर दी थी. लेकिन सरयू राय के इस नए बयान ने पासा पूरी तरह पलट दिया है. दरअसल, अब आरजेडी को हटाने की मांग करने वाली कांग्रेस खुद ही गठबंधन से बाहर होने के कगार पर खड़ी दिखाई दे रही है.
क्या कांग्रेस के बिना सरकार संभव है?
इसके बाद कांग्रेस और राजद एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं और यहीं से सरयू राय का 41 विधायकों वाला फॉर्मूला चर्चा में आया है. उनका संकेत यह है कि यदि कांग्रेस से रिश्ते और खराब होते हैं, तो झामुमो दूसरे सहयोगियों के साथ भी सरकार चला सकता है. हालांकि, राजनीति के जानकारों की मानें तो राजनीतिक रूप से यह उतना आसान नहीं दिखता. दरअसल, सरकार बनाना केवल संख्या का खेल नहीं होता, बल्कि स्थिरता, साझा एजेंडा और राजनीतिक भरोसे का भी सवाल होता है. जेडीयू राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए का हिस्सा है, जबकि झारखंड में उसका केवल एक विधायक है. ऐसे में इस फॉर्मूले के व्यावहारिक पक्ष पर भी सवाल उठ रहे हैं.
क्या सरयू राय के फॉर्मूले पर मुहर लगाएंगे हेमंत सोरेन?
झारखंड के राजनीति के जानकारों का मानना है कि सरयू राय का यह बयान महज एक सुझाव नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के इशारे पर कांग्रेस पर दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है. दरअसल, जेएमएम अच्छी तरह जानती है कि कांग्रेस के भीतर टिकट बंटवारे और अंदरूनी कलह को लेकर भारी असंतोष है. ऐसे में अगर हेमंत सोरेन सरयू राय के इस 41 विधायकों वाले ‘नो कांग्रेस’ फॉर्मूले पर आगे बढ़ते हैं, तो झारखंड की राजनीति में एक नया इतिहास रचा जाएगा. फिलहाल गेंद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पाले में है और आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि झारखंड में पुरानी सरकार बचेगी या नए समीकरणों के साथ कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया जाएगा.
क्या हेमंत सोरेन ऐसा जोखिम उठाएंगे?
दूसरी ओर, झारखंड की राजनीति में फिलहाल मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन या झामुमो की ओर से कांग्रेस को सरकार से बाहर करने जैसा कोई संकेत नहीं दिया गया है. इसके विपरीत चुनावी झटके के बाद भी गठबंधन को बचाए रखने की कोशिशें अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देती हैं. राजनीति के जानकार मानते हैं कि झामुमो अच्छी तरह जानता है कि विधानसभा चुनाव और राष्ट्रीय राजनीति दोनों में कांग्रेस उसके लिए महत्वपूर्ण सहयोगी है. ऐसे में केवल एक राज्यसभा चुनाव के आधार पर गठबंधन तोड़ना राजनीतिक रूप से महंगा फैसला हो सकता है.
… लेकिन दबाव जरूर बढ़ गया है!
हालांकि, इतना जरूर है कि इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर यह हुआ है कि कांग्रेस अब अपने सहयोगियों से जवाब चाह रही है. पार्टी के नेताओं के बयान बता रहे हैं कि अंदरखाने नाराजगी गहरी है. दूसरी ओर विपक्ष इस मौके का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है. सरयू राय का बयान भी इसी माहौल में आया है, जिसने नई राजनीतिक चर्चा शुरू कर दी है. सरयू राय ने दोटूक कहा कि इस नए और साफ-सुथरे फॉर्मूले के तहत हेमंत सोरेन को तुरंत एक नई सरकार का गठन करना चाहिए.
झारखंड की राजनीति में अब आगे क्या?
फिलहाल सरयू राय का फॉर्मूला राजनीतिक चर्चा का विषय है, कोई आधिकारिक प्रस्ताव नहीं. लेकिन यह जरूर साफ हो गया है कि राज्यसभा चुनाव ने महागठबंधन के भीतर भरोसे की दरार उजागर कर दी है. आने वाले दिनों में यदि कांग्रेस और झामुमो के बीच सियासी संवाद मजबूत नहीं हुआ, तो यह दरार और गहरी हो सकती है. अभी के लिए इतना तय है कि झारखंड की राजनीति में संख्या से ज्यादा भरोसा सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है.