लालू की जमानत पर SC ने HC के फैसले पर दखल देने से किया इनकार, बेल का पूरा खेल
Last Updated:
Kapil Sibal vs Raju News: चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट के जमानत आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया. कोर्ट रूम में लालू की तरफ से पेश हुए कपिल सिब्बल और सीबीआई वकील राजू के बीच जोरदार दलीलें पेश की गई. पर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक कानूनी सवाल खुला रखा है….
लालू प्रसाद यादव को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है.
नई दिल्ली: चारा घोटाले के देवघर कोषागार मामले में आरजेडी प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई ने झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें लालू प्रसाद यादव की सजा पर रोक लगाते हुए उन्हें जमानत दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने लालू की जेल में बिताई अवधि की गिनती गलत तरीके से की और 50 फीसदी सजा पूरी होने का आधार सही नहीं था. लेकिन लालू की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने सीबीआई की दलील का विरोध करते हुए कहा कि यह तर्क ही गलत है कि लालू को पहले एक सजा और उसके बाद दूसरी सजा पूरी करनी थी. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के जमानत आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. हालांकि कोर्ट ने मुख्य अपीलों की सुनवाई तेज करने को कहा और कानूनी सवाल को खुला छोड़ दिया. आखिर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर हस्ताक्षेप करने से क्यों इनकार किया और ऐसा क्या कहा जो आने वाले समय पर लालू के लिए मुसीबत बन सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में दखल क्यों नहीं दिया? जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि वह हाईकोर्ट के जमानत आदेश में हस्तक्षेप करने की इच्छुक नहीं है. इसकी एक महत्वपूर्ण वजह मुख्य अपीलों का लंबे समय से लंबित होना बताया है. लालू प्रसाद यादव की दोषसिद्धि के खिलाफ अपील और सीबीआई की सजा बढ़ाने की मांग वाली अपील वर्ष 2018 से हाईकोर्ट में लंबित हैं. सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जमानत आदेश में हस्तक्षेप करने के बजाय मुख्य अपीलों का जल्द निपटारा किया जाना उचित होगा.
हाईकोर्ट को सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट से मुख्य अपीलों की सुनवाई तेज करने को कहा है. पीठ ने कहा कि अपील वर्ष 2018 से लंबित है, इसलिए हाईकोर्ट से इसकी सुनवाई में तेजी लाने का अनुरोध करना उचित होगा. कोर्ट ने कहा कि इन अपीलों का निपटारा अधिमानतः छह महीने के भीतर किया जाए यानी अब झारखंड हाईकोर्ट के सामने लालू प्रसाद यादव की दोषसिद्धि के खिलाफ अपील और सीबीआई की सजा बढ़ाने की मांग वाली अपील पर तेजी से सुनवाई करने का रास्ता साफ हुआ है.
अरुण बिंजोला इस वक्त न्यूज 18 में बतौर एसोसिएट एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. वह करीब 15 सालों से पत्रकारिता में सक्रिए हैं और पिछले 10 सालों से डिजिटल मीडिया में काम कर रहे हैं. करीब एक साल से न्यूज 1…और पढ़ें
News18 न्यूजलेटर
अब ईमेल पर इनसाइड स्टोरीज
खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्स में
Location :
Delhi,Delhi,Delhi
क्या सुप्रीम कोर्ट का फैसला बन सकता है लालू के लिए मुसीबत सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह घोषित नहीं किया कि सीबीआई की कानूनी दलील गलत है और कपिल सिब्बल की दलील ही सही है. कोर्ट ने हाईकोर्ट के जमानत आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, लेकिन साथ ही कानूनी मुद्दे को खुला छोड़ दिया. इसका मतलब है कि सजाओं की अवधि की गिनती और एक सजा के बाद दूसरी सजा काटने से जुड़ा कानूनी सवाल सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम रूप से तय नहीं किया. यानी इस सुनवाई से लालू प्रसाद यादव को तत्काल राहत जरूर मिली, लेकिन सीबीआई द्वारा उठाया गया कानूनी सवाल हमेशा के लिए समाप्त नहीं हुआ.
फिर कपिल सिब्बल की एक दलील ने कैसे बदल दिया मामला? लालू प्रसाद यादव की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने CBI के तर्क का विरोध किया. सिब्बल ने कहा कि यह पूरी दलील कि उसे पहले पहली सजा और फिर दूसरी सजा भुगतनी चाहिए थी, बिल्कुल गलत है. न्यायाधीश ने एक समान मापदंड अपनाया है. यह न्यायाधीश का विवेक है. यानी सिब्बल का तर्क था कि हाईकोर्ट ने लालू प्रसाद यादव को कोई असाधारण लाभ नहीं दिया था. उनके मुताबिक, जमानत और सजा निलंबित करने का फैसला न्यायाधीश के विवेक के दायरे में था और हाईकोर्ट ने वही पैमाना अपनाया था, जो ऐसे मामलों में अपनाया जाता रहा है.
आखिर सुप्रीम कोर्ट में किस बात को लेकर चल रही थी लड़ाई? यह मामला चारा घोटाले के देवघर कोषागार से अवैध निकासी से जुड़ा है. साल 1991 से 1994 के बीच देवघर कोषागार से करीब 89 लाख रुपये की अवैध निकासी का आरोप था. दिसंबर 2017 में लालू प्रसाद यादव को इस मामले में दोषी ठहराया गया था और बाद में रांची की सीबीआई विशेष अदालत ने उन्हें अलग-अलग अपराधों के लिए कुल सात साल की सजा सुनाई थी. इसके बाद लालू प्रसाद यादव ने अपनी दोषसिद्धि और सजा को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी.
हाईकोर्ट ने लालू यादव को क्यों दी थी जमानत? जुलाई 2019 में झारखंड हाईकोर्ट ने लालू प्रसाद यादव की सजा को निलंबित करते हुए उन्हें जमानत दे दी थी. हाईकोर्ट के सामने महत्वपूर्ण आधार यह था कि लालू प्रसाद यादव अपनी सजा की करीब आधी अवधि जेल में काट चुके थे. इसके बाद CBI ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. सीबीआई की दलील थी कि हाईकोर्ट ने लालू प्रसाद यादव को जमानत देते समय सजा की अवधि की गिनती सही तरीके से नहीं की.
CBI ने कहा- 50 फीसदी सजा पूरी होने की बात तथ्यात्मक रूप से गलत सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले का विरोध किया. उन्होंने कहा कि लालू प्रसाद यादव की सजा निलंबित करने की मांग पहले दो बार गुण-दोष के आधार पर खारिज हो चुकी थी. इसके बावजूद बाद में हाईकोर्ट ने 50 फीसदी सजा पूरी होने के आधार पर उन्हें जमानत दे दी. सीबीआई का तर्क था कि लालू प्रसाद यादव को सुनाई गई सजाओं को एक साथ चलने वाली सजा मानकर जेल में बिताई गई अवधि की गणना नहीं की जा सकती. एएसजी एसवी राजू ने कहा कि हाईकोर्ट ने इस तथ्य को ध्यान में नहीं रखा कि सजाएं कॉनकरेंट सजा यानी एक साथ चलने वाली नहीं थीं. उनके मुताबिक, इसी कारण लालू यादव के 50 फीसदी सजा काट लेने का निष्कर्ष तथ्यात्मक रूप से गलत था.
CBI की दलील मान ली जाती तो लालू यादव के लिए क्या होता? यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल था. अगर सुप्रीम कोर्ट सीबीआई की दलील स्वीकार कर लेता कि लालू प्रसाद यादव को पहले एक सजा पूरी करनी थी और उसके बाद दूसरी सजा काटनी थी, तो उनकी जेल में बिताई गई अवधि की गणना बदल सकती थी. ऐसी स्थिति में हाईकोर्ट द्वारा 50 फीसदी सजा पूरी होने के आधार पर दी गई जमानत सवालों के घेरे में आ सकती थी. सीबीआई इसी आधार पर हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कराने की मांग कर रही थी.
खबरें पढ़ने का बेहतरीन अनुभव
QR स्कैन करें, डाउनलोड करें News18 ऐप या वेबसाइट पर जारी रखने के लिए यहां क्लिक करें