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झारखंड सरकार का उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग इन दिनों नियमों और वित्त विभाग के आदेशों को ताक पर रखकर संचालित हो रहा है। विभाग में पिछले एक दशक (वर्ष 2016) से कई अधिकारी पदोन्नति के बिना एक ही पद पर ‘प्रभारी’ के रूप में जमे हुए हैं। जब भी विभागीय तबादला होता है, तो सिर्फ उनका जिला बदलता है, लेकिन उनका ‘प्रभारी अधीक्षक’ का ओहदा और प्रभाव जस का तस बना रहता है। यह स्थिति तब है जब राज्य के वित्त विभाग ने इसी वर्ष 19 मई को एक कड़ा पत्र जारी किया था। पत्र में स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि “उच्चतर पद का स्वतंत्र चालू प्रभार दिए जाने की व्यवस्था को अविलंब समाप्त किया जाए।” वित्त विभाग ने साफ किया था कि यदि अत्यंत अनिवार्य हो, तो सक्षम प्राधिकार से अल्प अवधि के लिए अनुमोदन लेकर मूल पद पर रहते हुए ही अतिरिक्त प्रभार दिया जा सकता है। इसके बावजूद उत्पाद विभाग में यह व्यवस्था निर्बाध रूप से जारी है। इन जिलों में 10 साल से काबिज हैं प्रभारी अधीक्षक वर्ष 2016 से ही इंस्पेक्टर (निरीक्षक) रैंक के अधिकारी लगातार अलग-अलग जिलों में प्रभारी अधीक्षक की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इनमें पलामू में निरीक्षक उत्पाद सुजीत कुमार प्रभारी अधीक्षक बने हुए हैं। लोहर्दगा में निरीक्षक उत्पाद अनिल कुमार शर्मा के पास प्रभारी अधीक्षक का पद है। देवघर में निरीक्षक उत्पाद विमला लकड़ा लंबे समय से प्रभारी अधीक्षक हैं। सरायकेला में निरीक्षक उत्पाद क्षितिज विजय मिंज प्रभारी अधीक्षक के पद पर कार्यरत हैं। गिरिडीह में निरीक्षक उत्पाद शिव कुमार साहू भी प्रभारी अधीक्षक की कुर्सी संभाल रहे हैं। डीपीसी की बैठक में न पदोन्नति मिल रही, न रेगुलर नियुक्तियां की जा रही विभागीय नियमों के अनुसार, अधिकारियों की समय पर पदोन्नति के लिए हर साल जुलाई महीने में विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक आयोजित की जानी चाहिए। नियमतः पात्र अधिकारियों की फाइल आगे बढ़ाई जानी चाहिए, लेकिन उत्पाद विभाग में लंबे समय से डीपीसी की बैठकें ठंडे बस्ते में हैं। परिणामस्वरूप निरीक्षकों को नियमित अधीक्षक के पद पर प्रोन्नति नहीं मिल पा रही है। अवर निरीक्षकों (दारोगा) को निरीक्षक के पद पर पदोन्नत नहीं किया जा रहा है। 85% पद खाली, कैसे चलेगा काम विभाग द्वारा जारी आधिकारिक बल सूची के आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि उत्पाद विभाग में मानव संसाधन का भारी संकट है।
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