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Brahma Chellaney on CJP Protest: रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने जंतर-मंतर पर हुए CJP छात्र आंदोलन की पृष्ठभूमि में सड़क आंदोलनों की बढ़ती भूमिका पर चिंता जताई है. X पर किए गए पोस्ट में उन्होंने कहा कि विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन यदि राजनीतिक फैसले लगातार सड़क के दबाव से होने लगें तो संवैधानिक संस्थाएं कमजोर हो सकती हैं. उनके मुताबिक, ऐसे आंदोलन सरकारों से तत्काल रियायतें तो दिला देते हैं, लेकिन बेरोजगारी, महंगाई और प्रशासनिक समस्याओं जैसी मूल चुनौतियां बनी रहती हैं.
जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन को लेकर ब्रह्मानी चेलानी ने गंभीर चिंता जताई है. (फाइल फोटो)
जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन और उस कारण धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से बने राजनीतिक माहौल पर रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने अपनी बात रखी है. चेलानी ने लोकतंत्र में सड़क आंदोलनों की बढ़ती भूमिका को लेकर गंभीर चिंता जताई है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर किए गए अपने विस्तृत पोस्ट में उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का मूल अधिकार है, लेकिन अगर राजनीतिक बदलाव का सबसे बड़ा माध्यम केवल सड़कें बन जाएं तो इससे संवैधानिक व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं.
चेलानी ने अपने पोस्ट में भारत के हालिया छात्र आंदोलन का जिक्र करते हुए इसे वैश्विक दक्षिण (Global South) के कई देशों में उभर रहे एक व्यापक राजनीतिक रुझान का हिस्सा बताया.
‘संस्थाओं को दरकिनार कर सड़कों पर बढ़ रहा भरोसा’
ब्रह्मा चेलानी के अनुसार, डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिये संगठित हो रहे युवा आंदोलन पारंपरिक राजनीतिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं को दरकिनार कर सीधे सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहे हैं. उनका कहना है कि इस तरह के आंदोलन कई बार सरकारों से तात्कालिक फैसले तो करवा लेते हैं, लेकिन वे उन मूल समस्याओं का समाधान नहीं कर पाते जिनकी वजह से आंदोलन शुरू हुए थे.
‘जीत के बाद भी नहीं बदलती मूल समस्याएं’
चेलानी का तर्क है कि सड़क आंदोलन से सरकारें तत्काल रियायतें दे सकती हैं, लेकिन इससे बेरोजगारी, महंगाई, प्रशासनिक कमियां और आर्थिक ढांचे जैसी गहरी समस्याएं खत्म नहीं होतीं. उन्होंने लिखा कि जब मूल कारण जस के तस बने रहते हैं तो युवाओं में फिर निराशा पैदा होती है. इसके बाद वे दोबारा सड़कों पर उतरते हैं और इस तरह आंदोलन, उम्मीद और निराशा का एक चक्र बन जाता है.
GenZ आंदोलन और नेपाल का उदाहरण
अपने पोस्ट में ब्रह्मा चेलानी ने नेपाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी युवा प्रदर्शनकारी फिर से सड़कों पर उतर आए हैं. उनका दावा है कि जिन युवाओं ने जिस सरकार को सत्ता तक पहुंचाने में भूमिका निभाई थी, अब वही उससे नाराज होकर आंदोलन कर रहे हैं. उनके अनुसार, इससे राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ सकती है.
‘लोकतंत्र में संस्थाएं रहें केंद्र में’
चेलानी का कहना है कि अगर हर राजनीतिक विवाद और सार्वजनिक मांग का समाधान केवल सड़क आंदोलनों से होने लगे, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका कमजोर पड़ सकती है. उन्होंने इसे संवैधानिक लोकतंत्र के लिए दीर्घकालिक चुनौती बताया और कहा कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन स्थायी समाधान संस्थागत सुधारों और नीति निर्माण से ही निकल सकता है.
हालांकि, अपने पोस्ट में उन्होंने कहीं भी शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का विरोध नहीं किया. उनका जोर इस बात पर रहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और संस्थागत प्रक्रिया के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है.
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साद बिन उमर मीडिया इंडस्ट्री में 15 साल से अधिक के अनुभव वाले सीनियर पत्रकार हैं. वह अभी News18 Hindi (hindi.news18.com) से जुड़े हैं, जहां वे होम पेज डेस्क पर काम करते हैं.
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