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रांची में JPSC-JSSC आंदोलन के दौरान AISA अध्यक्ष नेहा बोरा पर स्याही फेंके जाने की घटना ने बड़ा संदेश दिया. छात्र अपने आंदोलन को राजनीति से दूर रखना चाहते हैं. नेहा बोरा हाल ही में जंतर-मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ हुए आंदोलन का प्रमुख चेहरा रही थीं. इसलिए उनके रांची पहुंचने को कई छात्रों ने राजनीतिक दखल माना. छात्र आंदोलनों की ताकत उनकी निष्पक्षता होती है. राजनीति हावी होने पर असली मुद्दे कमजोर पड़ जाते हैं.
नेहा बोरा
रांची: JPSC-JSSC परीक्षा को लेकर रांची में चल रहा छात्र आंदोलन अब नए मोड़ पर पहुंच गया है. AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा जैसे ही आंदोलन में पहुंचीं, कुछ छात्रों ने उन पर स्याही फेंक दी. इस घटना की पूरे देश में चर्चा हो रही है. इसके साथ ही एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है. क्या छात्र आंदोलन में राजनीतिक दलों और नेताओं की एंट्री होनी चाहिए? छात्र आंदोलन का मकसद साफ होता है. छात्र नौकरी, परीक्षा और अपने भविष्य के लिए लड़ते हैं. उनका संघर्ष किसी राजनीतिक दल के लिए नहीं होता. जब राजनीति ऐसे आंदोलनों में घुसती है, तो असली मुद्दे पीछे छूटने लगते हैं.
रांची में भी JPSC-JSSC का आंदोलन अब तक छात्रों के नेतृत्व में चल रहा था. यही इसकी सबसे बड़ी ताकत थी. आम लोग भी इसका समर्थन कर रहे थे. लेकिन जैसे ही AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा आंदोलन में पहुंचीं, कई छात्रों ने इसका विरोध कर दिया. छात्रों का संदेश साफ था. वे अपने आंदोलन को किसी भी राजनीतिक रंग में नहीं रंगने देना चाहते.
नेहा बोरा छात्र राजनीति का जाना-पहचाना चेहरा हैं. दिल्ली के जंतर-मंतर पर परीक्षा में गड़बड़ी और पेपर लीक के खिलाफ चले आंदोलन से उन्हें राष्ट्रीय पहचान मिली थी. उन्होंने लंबी भूख हड़ताल भी की थी. उस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में उनका नाम शामिल रहा. इसलिए उनका किसी भी छात्र आंदोलन में पहुंचना सिर्फ एक व्यक्ति का पहुंचना नहीं माना जाता, बल्कि एक राजनीतिक छात्र संगठन की मौजूदगी के रूप में भी देखा जाता है. यही वजह है कि रांची के कई छात्रों को लगा कि उनका आंदोलन अब राजनीतिक दिशा में जा सकता है. उन्होंने इसका विरोध किया. हालांकि किसी पर स्याही फेंकना विरोध का सही तरीका नहीं कहा जा सकता. लोकतंत्र में विरोध शांतिपूर्ण होना चाहिए. लेकिन इस घटना ने यह जरूर दिखा दिया कि छात्र अपने आंदोलन को राजनीतिक मंच नहीं बनने देना चाहते.
देश में कई बार ऐसा हुआ है. कोई छात्र आंदोलन बड़ा होता है, तो अलग-अलग राजनीतिक दल उसमें अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगते हैं. इसके बाद चर्चा छात्रों की मांगों से हटकर नेताओं के बयान और राजनीति पर होने लगती है. सबसे ज्यादा नुकसान आंदोलन को ही होता है. रांची की घटना सभी राजनीतिक दलों और छात्र संगठनों के लिए एक संदेश है. अगर छात्र खुद किसी नेता या संगठन को नहीं बुलाते, तो उनके आंदोलन को उनके भरोसे ही छोड़ देना चाहिए. बाहर से समर्थन देना अलग बात है. लेकिन आंदोलन की कमान अपने हाथ में लेने की कोशिश नहीं होनी चाहिए. हर छात्र आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसकी निष्पक्षता होती है. उसकी लड़ाई सिर्फ छात्रों के हक की होनी चाहिए. जब तक यह भावना बनी रहेगी, तब तक आंदोलन मजबूत रहेगा. यही रांची की इस घटना का सबसे बड़ा संदेश भी है.
नेहा बोरा छात्र राजनीति का जाना-पहचाना चेहरा हैं. वह AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष और जेएनयू की शोध छात्रा हैं. हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर परीक्षा में गड़बड़ी और पेपर लीक के खिलाफ हुए छात्र आंदोलन में उनकी बड़ी भूमिका रही थी. उन्होंने दूसरे छात्र नेताओं के साथ लंबे समय तक भूख हड़ताल की. आंदोलन के दौरान वह लगातार धरना स्थल पर मौजूद रहीं. पुलिस कार्रवाई के बाद भी उन्होंने आंदोलन का नेतृत्व किया और छात्रों को संबोधित किया. इसी आंदोलन के बाद वह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित चेहरों में शामिल हो गईं. इसलिए जब वह रांची के JPSC-JSSC आंदोलन में पहुंचीं, तो कई छात्रों ने इसे सिर्फ एक छात्र नेता की मौजूदगी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक छात्र संगठन की एंट्री के तौर पर देखा. यही वजह रही कि कुछ छात्रों ने उनका विरोध किया और आंदोलन को राजनीति से दूर रखने का संदेश देने की कोशिश की.
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मनीष कुमार इस समय न्यूज18 हिंदी में बिहार, झारखंड और दिल्ली की टीम को लीड कर रहे हैं. इन राज्यों की बड़ी खबरों से लेकर खास फीचर स्टोरी तक, उनकी नजर हर अहम मुद्दे पर रहती है. उनका मुख्य उद्देश्य है कि हर जरूरी ख…
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