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Nagaur Hindi News: एक गांव में संत की समाधि से जुड़ी करीब 450 साल पुरानी आस्था आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है. स्थानीय मान्यता के अनुसार समाधि लेने से पहले संत ने गांववासियों को आशीर्वाद दिया था कि यहां ओलावृष्टि से फसलों को नुकसान नहीं होगा और आग भी नहीं फैलेगी. ग्रामीण इस परंपरा और मान्यता को पीढ़ियों से मानते आ रहे हैं. संत की समाधि पर आज भी दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचकर दर्शन और पूजा-अर्चना करते हैं. ग्रामीणों के लिए यह स्थान आस्था और विश्वास का केंद्र बना हुआ है. हालांकि, ओलावृष्टि या आग से सुरक्षा से जुड़ी बातों को स्थानीय धार्मिक मान्यता के रूप में देखा जाता है, वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं.
नागौर की धरती संत-महात्माओं की तपस्या, लोक आस्था और उनसे जुड़ी रहस्यमयी कथाओं के लिए जानी जाती है. इसी आस्था की एक अनोखी कहानी भेरूंदा क्षेत्र के गुढ़ा जोधा गांव में आज भी सुनाई जाती है. यहां करीब 450 वर्ष पहले संत खेमदास महाराज ने जीवित समाधि लेने से पहले गांव को दो ऐसे वचन दिए थे, जिन्हें आज भी लोग चमत्कार से जोड़कर देखते हैं. ग्रामीणों के अनुसार, तब से गांव में ओलावृष्टि का प्रकोप नहीं हुआ और यदि किसी घर में आग लगी भी, तो उसकी लपटें दूसरे घर तक नहीं पहुंचीं.
गुढ़ा जोधा स्थित संत खेमदास महाराज की समाधि आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र बनी हुई है. देश-विदेश से लोग यहां दर्शन करने पहुंचते हैं और समाधि स्थल की सात परिक्रमा कर मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं. ठाकुरजी मंदिर के पुजारी भरतदास वैष्णव बताते हैं कि संत खेमदास महाराज का इतिहास करीब साढ़े चार सौ साल पुराना है. वे मूल रूप से कोटपुतली जिले के राजनोता गांव के रहने वाले बताए जाते हैं और अपनी बहन से मिलने भेरूंदा आए थे.
मान्यता के अनुसार, भेरूंदा पहुंचने के बाद खेमदास महाराज ने यहां तपस्या शुरू कर दी. शुरुआत में जब कुछ ग्रामीणों ने उनके वहां ठहरने का विरोध किया तो महाराज ने अपनी तपस्या की शक्ति का पहला परिचय दिया. कहा जाता है कि उन्होंने जलते हुए अंगारे उठाकर अपनी झोली में डाल लिए और उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ. यह देखकर ग्रामीण भयभीत हो गए और उन्होंने संत के चरण पकड़कर क्षमा मांगी. हालांकि महाराज भेरूंदा में नहीं रुके और गांव से करीब दो किलोमीटर दूर सरहद की ओर चले गए, जहां बाद में उनकी तपस्या और समाधि की कथा जु
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संत खेमदास महाराज से जुड़ी सबसे हैरान करने वाली मान्यता उनकी जीवित समाधि को लेकर है. ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के अनुसार, महाराज ने एक ही दिन और एक ही समय पर तीन अलग-अलग स्थानों गुढ़ा जोधा, राजनोता और जयपुर के बाड़ी जोड़ी में जीवित समाधि ली थी. यह कथा आज भी लोगों के बीच कौतूहल का विषय बनी हुई है. राजनोता में भी संत के प्रति गहरी आस्था है. वहां मान्यता है कि उनके शिष्यों की गायों को किसान अपने खेतों में जाने से नहीं रोकते. इन मान्यताओं ने संत खेमदास महाराज की लोक आस्था को कई क्षेत्रों तक पहुंचाया
संत खेमदास महाराज की समाधि से जुड़ी सबसे मान्यता उनके दो वचनों को लेकर है. कहा जाता है कि समाधि लेने से पहले उन्होंने ग्रामीणों को आश्वासन दिया था कि इस गांव में कभी ओलावृष्टि का प्रकोप नहीं होगा. दूसरा वचन था कि यदि किसी घर में आग लगती है तो उसकी लपटें पास के दूसरे घर तक नहीं पहुंचेंगी. ग्रामीण इन दोनों बातों को संत के आशीर्वाद से जोड़ते हैं. करीब साढ़े चार सौ वर्षों के बाद भी ये कथाएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों की जुबान पर हैं और समाधि स्थल के प्रति आस्था को मजबूत करती हैं.
गुढ़ा जोधा के ग्रामीणों की संत खेमदास महाराज के प्रति आस्था केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है. ग्रामीणों का कहना है कि गांव में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले लोग समाधि स्थल पर पहुंचकर संत का आशीर्वाद लेते हैं. आसपास के गांवों में भी इस स्थान को लेकर गहरी श्रद्धा है. ग्रामीण मानते हैं कि संतों का आशीर्वाद मिलने से कार्य निर्विघ्न पूरे होते हैं. यही वजह है कि सामान्य दिनों के साथ-साथ विशेष अवसरों पर भी समाधि स्थल पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है.
समाधि स्थल की अपनी अलग परंपराएं भी हैं. यहां समाधि पर हरी डाब (घास) अर्पित की जाती है और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी पवाड़ियां भी रखी होने की बात सामने आती है. श्रद्धालु यहां पहुंचकर दर्शन करते हैं, परिक्रमा लगाते हैं और संत के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं. 450 साल पुरानी यह जीवित समाधि आज इतिहास और आस्था के संगम की तरह दिखाई देती है. चमत्कारों से जुड़ी इन मान्यताओं की अपनी कोई वैज्ञानिक पुष्टि भले न हो, लेकिन गुढ़ा जोधा में संत खेमदास महाराज की कहानी आज भी लोगों के विश्वास और परंपरा में पूर