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पलामू की किसान कुंती देवी ने जैविक दवा ‘निर्मास्त्र’ बनाई है. यह नीम, धतूरा, गौमूत्र और पत्तों से तैयार होती है. इससे अरहर की फसल लाही कीट से सुरक्षित हुई. खास बात यह है कि इसकी गंध से नीलगाय भी खेत से दूर रही. इस उपाय से खेती की लागत कम हुई है.
पलामूः नील गाय की समस्या झारखंड राज्य भर के किसानों को झेलनी पड़ती है. ऐसे में कई किसान बचाव के कई तकनीक अपनाते बावजूद बचाव नहीं हो पाता है. लेकिन कुछ तरीके किसानों के लिए फायदेमंद हो जाते है. ऐसा ही एक नायाब तरीका पलामू के किसान के लिए बेहद फायदेमंद साबित हुआ है.
दरअसल, पलामू जिले के चेडाबार गांव की रहने वाली कुंती देवी जैविक खेती को अपनाकर न सिर्फ रासायनिक खाद और दवाओं पर निर्भरता कम कर रही हैं, बल्कि घर पर तैयार की गई जैविक दवा से फसल को कीटों और नीलगाय से भी बचाने का दावा कर रही हैं. कुंती देवी ने कहा कि उनके अरहर के खेत में लाही का प्रकोप हुआ था. इसके बचाव के लिए उन्होंने घर पर तैयार निर्मास्त्र का छिड़काव किया. इसके बाद फसल में लाही का प्रकोप कम होने के साथ नीलगाय से भी फसल को नुकसान नहीं हुआ.
कुंती देवी ने आगे बताया कि वो पिछले 10 सालों से खेती कर रही है. उनके खेत के बगल में भी अरहर की खेती की गई थी. जब अरहर की फसल तैयार होने लगी तो नीलगाय ने पड़ोसी किसान के खेत में लगी लगभग पूरी फसल को नुकसान पहुंचा दिया. वहीं उनके खेत में भी कुछ नीलगाय पहुंची थीं. जिससे उन्हें डर था कि उनकी फसल भी बर्बाद हो जाएगी. लेकिन निर्मास्त्र के छिड़काव के बाद नीलगाय उनके खेत की ओर नहीं आईं और अरहर की फसल सुरक्षित रही. लगातार छिड़काव करने से फसल बेहतर हुई और गांव में भी इसकी चर्चा होने लगी.
कैसे तैयार होता निर्मास्त्र?
कुंती देवी आगे बताया कि निर्मास्त्र तैयार करने के लिए नीम, धतूरा, करंज, अमरूद और पपीते के पत्ते पांच-पांच किलो लिए जाते हैं. सभी पत्तों को पीसकर उसमें बरगद के पेड़ के पास की मिट्टी और गौमूत्र मिलाया जाता है. इस मिश्रण को करीब 48 घंटे तक एक डिब्बे में रखा जाता है. इसके बाद इसे घड़ी की दिशा में चलाकर तैयार किया जाता है और फिर खेत में छिड़काव किया जाता है. उन्होंने कहा कि वो सब्जियों की खेती में भी इसका इस्तेमाल करने लगी. उनके इलाके में नील गाय की बड़ी समस्या है. लेकिन दवा छिड़काव करने उनके फसल को नील गाय नुकसान नहीं पहुंचाता है.
उन्होंने कहा कि पहले वह रासायनिक खाद और दवाओं का इस्तेमाल करती थीं, लेकिन अब जैविक खेती पर जोर दे रही हैं. पारंपरिक तौर पर वह मौसम के अनुसार धान, गेहूं और मक्का की खेती करती हैं, जबकि सब्जियों की खेती सालभर करती हैं. घर पर तैयार जैविक दवा से खेती की लागत कम करने में भी मदद मिल रही है. हालांकि, निर्मास्त्र के नीलगाय पर प्रभाव का उनका अनुभव स्थानीय स्तर पर बेहद कारगर हुआ है.
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प्रसून सिंह को मीडिया में 7 साल काम करने का अनुभव है. खबरों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रोचक अंजाद में पेश करना खासियत है. दैनिक भास्कर अखबार में इंटर्नशिप के साथ करियर की शुरुआत हुई.
इसके बाद ETV Bharat (बिहार)…
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