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Akhilesh Yadav Vs Akash Anand | UP Chunav 2027 | यूपी चुनाव...


लखनऊ. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बहुजन समाज पार्टी ने अपनी तैयारी तेज कर दी है. बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने अपने भतीजे और राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद को एक बार फिर से चुनावी अभियान की अहम जिम्मेदारी सौंपी है. आकाश अब केवल रैलियों में भाषण देने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पार्टी के उम्मीदवारों की घोषणा, युवाओं को जोड़ने और प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में संगठन को सक्रिय करने की भूमिका भी निभा रहे हैं. बसपा की रणनीति में दो बातें खास तौर पर ध्यान खींच रही हैं. पहली, पार्टी सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी के साथ अपना संगठन मजबूत करना चाहती है. दूसरी, कुछ चुनिंदा सीटों पर उम्मीदवार पहले से तय कर उन्हें लंबा समय देने की रणनीति पर काम हो रहा है.

बसपा नेताओं की मानें तो उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया जल्दी पूरी करने और शुरुआती चरण में करीब 150 सीटों पर विशेष तैयारी की चर्चा शुरू हो गई है. ऐसे में इसे पार्टी की संभावित चुनावी रणनीति के रूप में ही देखा जा रहा है. सवाल यह है कि क्या आकाश आनंद की सक्रियता बसपा को उसका पुराना सामाजिक आधार वापस दिलाने की कोशिश है? और अगर बीएसपी ने अपने उम्मीदवारों के जरिए दलित, मुस्लिम, ब्राह्मण, पिछड़े और अन्य सामाजिक समूहों में जगह बनाई, तो इसका असर अखिलेश यादव की पीडीए रणनीति और बीजेपी के चुनावी समीकरणों पर किस तरह पड़ सकता है?

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मायावती के भरोसे पर आकाश आनंद क्या उतर पाएंगे?

आकाश आनंद के राजनीतिक सफर में उतार-चढ़ाव रहे हैं. मायावती ने दिसंबर 2023 में उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी और पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक घोषित किया था. लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान उनके भाषणों को लेकर विवाद हुआ और मई 2024 में मायावती ने उन्हें जिम्मेदारियों से हटा दिया था. बाद में उनकी वापसी हुई, लेकिन सितंबर 2026 में उन्हें फिर राष्ट्रीय संयोजक पद से हटाया गया. अक्टूबर में आकाश ने सार्वजनिक रूप से मायावती से माफी मांगते हुए दोबारा मौका मांगा. इसके बाद उन्हें फिर पार्टी में जिम्मेदारी मिली. बीते 18 अक्टूबर 2026 को मायावती ने आकाश की वापसी का समर्थन करते हुए कहा कि उन्होंने परिवार से ऊपर पार्टी और आंदोलन को रखा है. मायावती ने कार्यकर्ताओं से उनके कार्यक्रमों को सफल बनाने की अपील भी की.

रैलियों से उम्मीदवारों की घोषणा तक, आकाश का चुनावी रोडमैप

बसपा ने आकाश आनंद को उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में चुनावी अभियान की जिम्मेदारी दी है. उत्तर प्रदेश में उनके कार्यक्रमों की शुरुआत 28 अक्टूबर को बुलंदशहर के अनूपशहर से हुई. इसके बाद 2 नवंबर को सहारनपुर के नकुड़ में जनसभा का कार्यक्रम रखा गया. आगे 20 नवंबर को अयोध्या के बीकापुर, 22 नवंबर को आगरा और 29 नवंबर को कानपुर के बिल्हौर में सभाएं प्रस्तावित हैं. इन कार्यक्रमों में आकाश पार्टी के उम्मीदवारों की घोषणा भी करेंगे.

यूपी चुनाव 2027 में क्या मायावती-अखिलेश फिर आएंगे एक साथ?

यहां बसपा की चुनावी शैली का एक अहम बदलाव दिखाई देता है. पहले पार्टी में उम्मीदवारों के नाम की घोषणा अक्सर चुनाव के नजदीक होती थी और मायावती की बड़ी रैलियां अभियान का मुख्य चेहरा रहती थीं. अब पार्टी कुछ सीटों पर पहले से विधानसभा प्रभारियों के नाम घोषित कर रही है, ताकि उन्हें क्षेत्र में काम करने, लोगों से संपर्क बनाने और संगठन मजबूत करने का समय मिल सके.

150 सीटों पर क्या है खास रणनीति?

बसपा की चुनावी तैयारी में करीब 150 सीटों का आंकड़ा चर्चा में है. इसे समझने के लिए पार्टी की दो अलग-अलग प्राथमिकताओं को देखना होगा. पहली प्राथमिकता सभी 403 सीटों पर अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखना है. दूसरी प्राथमिकता उन सीटों पर पहले से काम शुरू करना है, जहां पार्टी को अपना आधार मजबूत करने या नए सामाजिक समीकरण बनाने की संभावना दिखाई देती है. ऐसी सीटों पर पार्टी उम्मीदवारों को पहले ही प्रभारी बनाकर उतार सकती है.

2007 वाला सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला?

बसपा की सबसे बड़ी ताकत उसका दलित आधार रहा है. मायावती के नेतृत्व में पार्टी ने 2007 के विधानसभा चुनाव में 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी. उस चुनाव में बसपा ने दलितों के साथ ब्राह्मणों और अन्य जातियों को जोड़कर सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला अपनाया था. 2027 के लिए भी मायावती इसी तरह व्यापक सामाजिक गठजोड़ बनाने की कोशिश कर सकती हैं. पार्टी की रणनीति में अनुसूचित जातियों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के साथ ब्राह्मण, मुस्लिम, पिछड़े और सवर्ण समुदायों के उम्मीदवारों को भी जगह देने की बात सामने आई है.

शुरुआती दौर में बीएसपी ने जिन उम्मीदवारों के नामों पर विचार हुआ, उनमें मुस्लिम, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और पिछड़ी जातियों के चेहरे शामिल थे. बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दलित मतदाताओं के बीच उसका पुराना प्रभाव कितना बचा है और वह उसे दोबारा किस हद तक संगठित कर पाती है. 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटों पर लड़ी, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी. 2022 के विधानसभा चुनाव में भी उसे सिर्फ एक सीट मिली थी. ये नतीजे बताते हैं कि पार्टी को अपने संगठन और चुनावी समर्थन दोनों को फिर से मजबूत करने की जरूरत है.

अखिलेश यादव की PDA रणनीति को कैसे मिलेगी चुनौती?

अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी 2027 के लिए PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को मजबूत करने में जुटी है. सपा की कोशिश है कि गैर-यादव पिछड़ी जातियों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एक साझा राजनीतिक मंच पर लाया जाए. इसके लिए पार्टी उम्मीदवार चयन में सामाजिक प्रतिनिधित्व को महत्व देने की बात भी कर रही है. बसपा की सक्रियता इस रणनीति के सामने एक अलग चुनौती खड़ी कर सकती है. खासकर दलित वोटों को लेकर दोनों दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है. अगर बसपा अपने पारंपरिक दलित आधार को फिर से संगठित करती है, तो सपा के PDA समीकरण में उस हिस्से को लेकर चुनौती पैदा हो सकती है, जिसे अखिलेश यादव अपने साथ जोड़ना चाहते हैं.

लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि दलित मतदाता एक समान राजनीतिक समूह नहीं हैं. अलग-अलग क्षेत्रों में जातीय उपसमूह, स्थानीय उम्मीदवार, संगठन और चुनावी मुद्दे उनकी पसंद को प्रभावित करते हैं. इसलिए यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि बसपा की वापसी से PDA का पूरा समीकरण बदल जाएगा. बसपा की सक्रियता का असर केवल सपा पर ही नहीं, बीजेपी के चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है. उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने गैर-यादव पिछड़ी जातियों और दलित समुदायों के अलग-अलग वर्गों के बीच अपना समर्थन बढ़ाने की कोशिश की है. ऐसे में अगर बसपा अपने पुराने दलित आधार को मजबूत करती है, तो बीजेपी के सामने भी इन मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने की चुनौती होगी.

अगर यूपी चुनाव 2027 में बसपा कई सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारती है और मुकाबला त्रिकोणीय होता है, तो उसका असर सपा और बीजेपी दोनों के चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है. किसे कितना फायदा या नुकसान होगा, यह सीट-दर-सीट उम्मीदवारों, स्थानीय गठबंधनों और वोटों के बंटवारे पर निर्भर करेगा.



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