बोकारो. जिस काश के फूल को आपने अक्सर खेतों और सड़क किनारे उगते देखा होगा, क्या आप जानते हैं कि इसके तने से पीने वाला स्ट्रॉ भी बनाया जा सकता है? जी हां, बोकारो के गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक कॉलेज, खुटरी के छात्र श्रीशांत और खुशी ने इसी प्राकृतिक पौधे से स्ट्रॉ तैयार कर सबका ध्यान खींचा है. उनका उद्देश्य इस आइडिया से ग्रामीणों को रोजगार से जोड़ना है. उनका दावा है कि काश के तने से बना यह स्ट्रॉ कागज और प्लास्टिक से बने स्ट्रॉ की तुलना में अधिक सुविधाजनक और उपयोगी हो सकता है.
कॉलेज प्रोजेक्ट के दौरान आया आइडिया
खास बातचीत में छात्र श्रीशांत ने बताया कि उन्हें काश के तने से स्ट्रॉ बनाने का आइडिया कॉलेज प्रोजेक्ट के दौरान आया. उन्होंने देखा कि काश के फूल का तना अंदर से खोखला होने के बावजूद काफी मजबूत होता है. इसके बाद उन्होंने इस पर रिसर्च शुरू की और कई प्रयोगों के बाद इससे स्ट्रॉ तैयार करने में सफलता हासिल की. उनके मुताबिक, काश के तने से बना स्ट्रॉ पेपर और प्लास्टिक स्ट्रॉ की तुलना में बेहतर विकल्प हो सकता है, क्योंकि खासियत यह है कि यह ठंडे और गर्म पानी के संपर्क में भी अपनी बनावट बनाए रखता है और इसकी सेल्फ लाइफ करीब 6 महीने से 1 साल तक है. वहीं, झारखंड में काश का पौधा बड़ी मात्रा में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है, इसलिए इसे कम लागत में उपलब्ध होने वाला कच्चा माल माना जा सकता है, जिससे बेहद कम खर्च में स्ट्रॉ तैयार किया जा सकता है.
बेहद आसान है स्ट्रॉ बनाने की प्रक्रिया
श्रीशांत ने बताया कि काश के तने से स्ट्रॉ तैयार करने की प्रक्रिया काफी आसान है. इसके लिए सबसे पहले काश के पौधे के मोटे और सही आकार वाले तनों को इकट्ठा किया जाता है. इसके बाद उन्हें अच्छी तरह सुखाया जाता है. फिर लोहे की एक स्पोक की मदद से तने के अंदर की रुकावट को हटाकर उसे पूरी तरह खोखला और हवादार बनाया जाता है. इसके बाद जरूरत के अनुसार तने को स्ट्रॉ के आकार में काटकर उसकी सफाई और पैकेजिंग की जाती है. वहीं, ब्रांडिंग के जरिए इसे बाजार में बिजनेसमैन, होटल, रेस्टोरेंट और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तक पहुंचाया जा सकता है. छात्रों के अनुसार, इसे तैयार करने में मशीनों और अधिक मजदूरी की जरूरत नहीं पड़ती.
एक समान आकार में तना जुटाना सबसे बड़ी चुनौती
इस प्रोजेक्ट को बाजार तक पहुंचाने में सबसे बड़ी चुनौती काश के तनों का एक समान आकार में उपलब्ध होना है. छात्रा खुशी के मुताबिक, प्राकृतिक रूप से उगने वाले काश के प्रत्येक पौधे का तना अलग-अलग मोटाई और आकार का होता है. ऐसे में एक मानक के अनुसार स्ट्रॉ तैयार करने के लिए समान आकार के तने जुटाना थोड़ा मुश्किल होता है. अगर इस समस्या का समाधान कर लिया जाए, तो इससे बड़े पैमाने पर कमाई की जा सकती है.
ग्रामीण और आदिवासी समुदाय को स्वरोजगार से जोड़ने का लक्ष्य
छात्रों का अगला लक्ष्य इस आइडिया को सरकार और ग्रामीण समुदाय तक पहुंचाना है, ताकि गांवों में रहने वाले आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को इससे स्वरोजगार का अवसर मिल सके, क्योंकि उनका मानना है कि काश के तने से स्ट्रॉ तैयार करने का काम छोटे स्तर पर भी शुरू किया जा सकता है और इससे ग्रामीण परिवार स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल कर अपनी आमदनी भी बढ़ा सकते हैं.
कॉलेज की शिक्षिका ने भी किया प्रोत्साहित
इस प्रोजेक्ट को तैयार करने में कॉलेज की शिक्षिका सरस्वती कश्यप ने भी छात्रों का मार्गदर्शन और सहयोग किया है. उनका मानना है कि सरकार को भी इस आइडिया पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, ताकि इसे बड़े स्तर पर विकसित कर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकें. इससे एक ओर पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगों को आत्मनिर्भर बनने का मौका भी मिल सकता है.