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देसी हुनर का कमाल या सिस्टम की नाकामी? जटिया कॉलोनी की चप्पल...


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Jatiya Colony Slipper: जटिया कॉलोनी में चप्पल बनाने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है, जहां कारीगर अपने हुनर से शानदार हस्तनिर्मित चप्पलें तैयार करते हैं. इन चप्पलों की मांग केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि देशभर में है और यहां से बड़े पैमाने पर सप्लाई की जाती है. बावजूद इसके, इस पारंपरिक उद्योग को पर्याप्त सरकारी सहयोग नहीं मिल पा रहा है. कारीगर सीमित संसाधनों और आधुनिक तकनीक की कमी के बावजूद अपने काम को जारी रखे हुए हैं. यह कुटीर उद्योग कई परिवारों की आजीविका का मुख्य साधन है, लेकिन आर्थिक सहायता और प्रोत्साहन के अभाव में इसकी वृद्धि बाधित हो रही है. यदि सरकार की ओर से उचित समर्थन मिले, तो यह उद्योग और अधिक विकसित होकर रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर सकता है.

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अजमेर. अजमेर धार्मिक नगरी होने के साथ-साथ अपने पारंपरिक हुनर और कारीगरी के लिए भी विशेष पहचान रखता है. यहां के प्रमुख धार्मिक स्थलों के कारण देश-विदेश से आने वाले लोग जहां आध्यात्मिक शांति पाते हैं वहीं स्थानीय स्तर पर बनने वाले हस्तशिल्प उत्पाद भी इस शहर की अलग पहचान बनाते हैं. इन्हीं में से एक है हैंडमेड लेडीज चप्पल उद्योग जो लंबे समय से जटिया समाज की अर्थव्यवस्था और परंपरा का अहम हिस्सा रहा है.

अजमेर के पहरगंज स्थित जटिया कॉलोनी इस उद्योग का मुख्य केंद्र है, जहां कई परिवार पीढ़ियों से चप्पल बनाने के काम में लगे हुए हैं. पूरे शहर में लगभग चार से पांच हजार लोग, विशेष रूप से जटिया समाज के कारीगर, इस काम से जुड़े हुए हैं. खास बात यह है कि यहां कोई बड़ी फैक्ट्री नहीं है, बल्कि घरों में ही परिवार के सदस्य और मजदूर मिलकर इस काम को करते हैं. यह एक तरह का घरेलू उद्योग है जो पारंपरिक कौशल और मेहनत पर आधारित है.

राजस्थान के कई शहरों में सप्लाई की जाती हैं हैंडमेड चप्पलें
जटिया कॉलोनी निवासी कारीगर राजू सबलानिया ने बताया कि यह काम उनके समाज का पुश्तैनी व्यवसाय है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है. पहले जहां चप्पल और जूते चमड़े से बनाए जाते थे वहीं अब समय के साथ बदलाव करते हुए सिंथेटिक लेदर का उपयोग किया जा रहा है. इससे उत्पाद की लागत कम होती है और बाजार में इसकी मांग भी बनी रहती है. उन्होंने आगे बताया कि अजमेर में तैयार की गई ये हैंडमेड चप्पलें केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जयपुर, जोधपुर, नागौर, कुचामन, सीकर, बीकानेर, मेड़ता और भीलवाड़ा जैसे राजस्थान के कई शहरों व राजस्थान के बाहर भी  सप्लाई की जाती हैं. इससे कारीगरों को रोजगार के अवसर मिलते हैं और उनकी आजीविका चलती है.

सरकार से लगाई गुहार 
कारीगर राजू सबलानिया का कहना है कि इस क्षेत्र से जुड़े अधिकांश कारीगर और मजदूर वर्ग से आते हैं, फिर भी उन्हें सरकार की ओर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पा रहा है. खासकर मजदूर डायरी जैसी बुनियादी सुविधा का अभाव उन्हें सरकारी योजनाओं से वंचित कर रहा है. कारीगरों का मानना है कि यदि उन्हें मजदूर डायरी उपलब्ध कराई जाए, तो वे भी विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठा सकेंगे और उनका जीवन स्तर बेहतर हो सकेगा.

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Jagriti Dubey

Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें



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