मुंबई/नई दिल्ली. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), मुंबई जोनल ऑफिस ने मंगलवार को मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) 2002 के तहत साइप्रस स्थित अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म ‘पैरीमैच’ के मामले में चल रही जांच के हिस्से के रूप में महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, गुजरात, दमन और उत्तर प्रदेश में 17 जगहों पर तलाशी अभियान चलाए.
तलाशी के दौरान ईडी द्वारा लगभग 1.56 करोड़ रुपए की चल संपत्ति जब्त की गई, जिसमें लगभग 1.2 करोड़ रुपए की नकदी भी शामिल है. इसके अलावा, विभिन्न बैंक खातों में जमा लगभग 3.8 करोड़ रुपए की राशि को फ्रीज कर दिया गया है. तलाशी के दौरान कई आपत्तिजनक दस्तावेज और डिजिटल उपकरण भी मिले हैं, जिन्हें जब्त कर लिया गया है.
ईडी ने मुंबई के साइबर पुलिस स्टेशन में पैरीमैच के खिलाफ दर्ज एआआईआर के आधार पर जांच शुरू की थी. इस एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि पैरीमैच ऑनलाइन सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म के जरिए यूजर्स को धोखा दिया जा रहा था. जांच से अब तक मिली जानकारी के अनुसार, उन्होंने निवेशकों को ऊंचे रिटर्न का लालच देकर ठगा और एक साल में 3,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की.
अब तक की जांच से पता चला है कि पैरीमैच और उसके सहयोगियों ने यूजर्स के पैसे इकट्ठा करने, उन्हें घुमाने और ट्रांसफर करने के लिए ‘म्यूल अकाउंट्स’, पेमेंट बिचौलियों और वित्तीय समावेशन चैनलों का एक जटिल नेटवर्क अपनाया था. कुछ मामलों में, यूजर्स द्वारा पैसे निकालने की प्रक्रिया बिना किसी सीधे बाहरी भुगतान के पूरी की गई यानी, प्लेटफॉर्म द्वारा नियंत्रित खातों से कोई सीधा भुगतान नहीं किया गया. इसके बजाय, अन्य यूजर्स द्वारा जमा की गई राशि को सीधे पैसे निकालने वाले यूजर के बैंक खाते या यूपीआई-आईडी में कई किस्तों में भेजा गया. ऐसा करके, उन्होंने पैसे के असली रास्ते को छिपाया और सीधे भुगतान के जुड़ाव से बचने की कोशिश की.
जांच में यह भी पता चला है कि यूजर्स द्वारा जमा और निकाले गए पैसे को सॉफ्टवेयर, फिनटेक और टेक्नोलॉजी से जुड़ी संस्थाओं के नाम पर खोले गए कई करंट खातों के जरिए भेजा गया था. ये संस्थाएं असल में वैध व्यावसायिक गतिविधियों में भी शामिल थीं. आरोप है कि इन खातों का इस्तेमाल यूजर्स के पैसे जमा करने और ‘वेंडर पेमेंट्स’ (विक्रेता भुगतान), व्यावसायिक लेन-देन और ‘पेमेंट गेटवे सेवाओं’ की आड़ में भुगतान के लिए किया गया था.
तलाशी से यह भी पता चला है कि प्लेटफॉर्म से जुड़े भुगतान करने और पैसे के लेन-देन के लिए ‘बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट’ (बीसी) नेटवर्क, मोबाइल मनी ट्रांसफर एजेंटों, ‘ग्राहक सेवा केंद्रों’, ‘नकद प्रबंधन सेवाओं’ (सीएमएस), स्थानीय किराना दुकानों और खुदरा दुकानों का भी दुरुपयोग किया गया था. जांच में एक ऐसी बहु-स्तरीय व्यवस्था का भी खुलासा हुआ है, जिसमें यूजर्स के पैसे को ‘बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट’ (बीसी) नेटवर्क के तहत काम करने वाले खुदरा विक्रेताओं/ग्राहक सेवा केंद्रों के जरिए भेजा गया था.
कुछ एजेंट्स ने कथित तौर पर सीएमएस चैनलों के जरिए मिले कैश को दूसरी तरफ मोड़ दिया और उसे पैरीमैच यूजर्स द्वारा जमा की गई रकम से किए गए आरटीजीएस ट्रांसफर के साथ एडजस्ट कर दिया. इस तरह, फंड्स के असली सोर्स और उनके आने-जाने के रास्ते को छिपा दिया गया. इस तरह के कैश फंड्स को बाद में हवाला चैनलों के जरिए भारत से बाहर भेज दिया गया.
आगे की जांच से पता चला है कि पैरीमैच ने ‘पैरीमैच स्पोर्ट्स’ और ‘पैरीमैच न्यूज’ नामों के तहत सरोगेट विज्ञापनों के जरिए अपने बेटिंग प्लेटफॉर्म का जोरदार प्रचार किया. दूसरी बेटिंग वेबसाइटों के उलट, पैरीमैच ने हाइपरलोकल मार्केटिंग पर फोकस किया. इसके तहत उसने भारत के 15 से ज्यादा राज्यों में लोकल क्रिकेट लीग की टीमों को स्पॉन्सर किया, साथ ही हॉकी और फुटबॉल टूर्नामेंट को भी स्पॉन्सर किया.
जांच में यह भी पता चला है कि इस प्लेटफॉर्म ने बेटिंग से जुड़े विज्ञापनों को प्रमुख क्विक-कॉमर्स ऐप्स के जरिए प्रमोट किया और नए यूजर्स को आकर्षित करने और उन्हें प्लेटफॉर्म से जोड़ने के लिए किराने के सामान की डिलीवरी के साथ प्रमोशनल सामग्री भी बांटी. ये विज्ञापन यूजर्स को ऐप इस्तेमाल करते समय और ऑर्डर देते समय खास रणनीति के तहत दिखाए जाते थे, ताकि नए यूजर्स को प्लेटफॉर्म की ओर आकर्षित किया जा सके और उन्हें प्लेटफॉर्म से जोड़ा जा सके. ईडी ने इस मामले में अब तक 112 करोड़ रुपए की संपत्ति फ्रीज कर दी है. वहीं, आगे की जांच अभी जारी है.
अवैध आईपीएल सट्टेबाजी रैकेट का भंडाफोड़
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के गुवाहाटी जोनल ऑफिस ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) 2002 की धारा 17 के तहत तलाशी अभियान चलाया. यह अभियान पूरी रात जारी रहा, और गुवाहाटी व तिनसुकिया (असम) के साथ-साथ नई दिल्ली में स्थित कई ठिकानों पर छापे मारे गए. ये तलाशी एक बड़े पैमाने पर चल रहे अवैध आईपीएल क्रिकेट सट्टेबाजी रैकेट और उससे कमाए गए ‘अपराध से प्राप्त धन’ की लॉन्ड्रिंग की जांच के सिलसिले में की गई थी.
ईडी ने गुवाहाटी के क्राइम ब्रांच पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर के आधार पर जांच शुरू की थी. यह एफआईआर दीपेश बजोरिया, रौनक बजोरिया, राजेश जैन और अन्य लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता, 1860 और असम गेम एंड बेटिंग एक्ट, 1970 की विभिन्न धाराओं के तहत अपराधों के लिए दर्ज की गई थी.
इसके बाद 30 मार्च को ईसीआईआर में एक परिशिष्ट जोड़ा गया. इसमें तिनसुकिया पुलिस स्टेशन द्वारा विकास बेरिया, नितिन बेरिया, सुप्रित बिस्वास और अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज की गई दो और एफआईआर को शामिल किया गया. ये एफआईआर एक-दूसरे से जुड़े सिंडिकेट द्वारा चलाए जा रहे इसी तरह के अवैध आईपीएल सट्टेबाजी अभियानों से संबंधित थीं.
जांच से पता चला है कि आरोपी व्यक्ति आईपीएल क्रिकेट मैचों पर एक सुव्यवस्थित, पदानुक्रमित और तकनीकी रूप से सक्षम अवैध सट्टेबाजी और जुआ रैकेट चला रहे थे. सट्टे की बोलियां मोबाइल फोन के जरिए मांगी व स्वीकार की जाती थीं और उनका निपटारा किया जाता था. इसके लिए व्हाट्सएप, टेलीग्राम और इंस्टाग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म और विदेशों में स्थित ऑनलाइन सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जाता था.
सट्टेबाजी से प्राप्त धन नकद के साथ-साथ डिजिटल माध्यमों (यूपीआई/बैंक ट्रांसफर) से प्राप्त और वितरित किया जाता था. इसके बाद, इस पैसे को गुवाहाटी, तिनसुकिया और दिल्ली में फैले परिवार के सदस्यों और सहयोगियों के एक नेटवर्क के जरिए कई चरणों में घुमाया और छिपाकर रखा जाता था. फिर इसे ‘बेदाग संपत्ति’ के रूप में दिखाया जाता था.
यह तलाशी दीपेश बजोरिया, रौनक बजोरिया, राजेश जैन, विकास अग्रवाल, सुप्रित बिस्वास, विकास बेरिया, नितिन बेरिया और दुर्गा प्रसाद बेरिया के रिहायशी ठिकानों पर और गुवाहाटी में ‘रॉयसी’ (पहले ‘प्लेबॉय’) नाम से चल रहे एक व्यावसायिक ठिकाने पर की गई थी.
तलाशी अभियान के दौरान कई ऐसे सबूत मिले हैं, जो अपराध में शामिल होने की ओर इशारा करते हैं. ये सबूत ज्यादातर डिजिटल उपकरणों (जिनमें मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक स्टोरेज मीडिया शामिल हैं) में मौजूद थे, जिनमें सट्टेबाजी के लेन-देन का रिकॉर्ड, सट्टेबाजों और सब-एजेंटों के साथ सांकेतिक बातचीत और अपराध से हासिल पैसों के लेन-देन के डिजिटल निशान शामिल हैं.
तलाशी वाली जगहों से 13 लाख रुपए की बेहिसाब नकद राशि भी मिली है, जिसे जब्त कर लिया गया है. तलाशी अभियान के दौरान तीन महंगी गाड़ियां भी जब्त की गई हैं, जिनमें एक मर्सिडीज-बेंज कार, एक एमजी हेक्टर कार और एक टोयोटा फॉर्च्यूनर कार शामिल है. माना जा रहा है कि इन गाड़ियों को अपराध से हासिल पैसों से ही खरीदा गया था.
इसके अलावा, कई ऐसे बैंक खाते भी मिले हैं जिनका इस्तेमाल आईपीएल की अवैध सट्टेबाजी गतिविधियों में और अपराध से हासिल पैसों के लेन-देन के लिए किया जा रहा था. इन खातों को फ्रीज कर दिया गया है, ताकि इन पैसों का आगे कोई लेन-देन न हो सके या इन्हें कहीं और न भेजा जा सके. वहीं, आगे की जांच अभी जारी है.
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जमीन अधिग्रहण घोटाले में 45.84 करोड़ की संपत्ति जब्त
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) 2002 के प्रावधानों के तहत विशेष न्यायालय (पीएमएलए), साकेत, नई दिल्ली के समक्ष एम/एस तरबिया एजुकेशन फाउंडेशन, जवाद अहमद सिद्दीकी, विनोद कुमार और श्रीओम चौहान के खिलाफ एक अभियोजन शिकायत (पीसी) दायर की है. इन आरोपियों को जांच के दौरान ईडी ने पहले ही गिरफ्तार कर लिया था.
ईडी ने दिल्ली पुलिस द्वारा आईपीसी, 1860 की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज एफआईआर के आधार पर जांच शुरू की थी. ये एफआईआर नई दिल्ली के मदनपुर खादर गांव में स्थित खसरा संख्या 792 वाली जमीन के धोखाधड़ी से अधिग्रहण से संबंधित थी, जिसमें जाली और मनगढ़ंत दस्तावेजों, जिनमें जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) और अन्य स्वामित्व दस्तावेज शामिल हैं, का इस्तेमाल किया गया था.
ईडी की जांच में पता चला कि जिन जीपीए के आधार पर जमीन एम/एस तरबिया एजुकेशन फाउंडेशन को ट्रांसफर की गई थी, उन पर 7 जनवरी 2024 की तारीख अंकित थी. जांच से यह भी सामने आया कि जमीन के कई मूल मालिक वर्ष 2004 से दशकों पहले ही दिवंगत हो चुके थे. इसके अलावा, जांच में यह भी खुलासा हुआ कि आरोपी जवाद अहमद सिद्दीकी और अन्य ने मिलकर जमीन पर अवैध रूप से कब्जा करने के लिए मूल मालिकों के हस्ताक्षर/अंगूठे के निशान जाली बनाने की साजिश रची थी.
जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि ये जीपीए वर्ष 2012-13 में, एम/एस तरबिया एजुकेशन फाउंडेशन को संपत्ति हस्तांतरित किए जाने से ठीक पहले जाली तरीके से तैयार किए गए थे. आरोपी जवाद अहमद सिद्दीकी ने अन्य आरोपियों की मिलीभगत से, जमीन पर किए गए इस अवैध कब्जे को एक वास्तविक लेनदेन के रूप में दिखाने के लिए बैंकिंग लेनदेन का एक दिखावा भी किया था.
जांच में यह भी सामने आया कि इस अवैध जमीन अधिग्रहण के लिए जवाद अहमद सिद्दीकी द्वारा भारी मात्रा में नकद लेनदेन किया गया था. इस मामले में शामिल अपराध से अर्जित संपत्ति का मूल्य लगभग 47.76 करोड़ रुपए आंका गया है.
ईडी ने उक्त जमीन को भी कुर्क कर लिया है, जिसका मूल्य 45.84 करोड़ रुपए है और जिस पर जवाद अहमद सिद्दीकी तथा एम/एस तरबिया एजुकेशन फाउंडेशन ने अवैध रूप से कब्जा जमा रखा था. ईडी द्वारा आगे की जांच अभी जारी है.
11 करोड़ रुपए की संपत्तियां अस्थायी रूप से कुर्क
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के पणजी जोनल ऑफिस ने गोवा के अरपोरा में ‘बिर्च’ नाम के प्रतिष्ठान के अवैध संचालन से जुड़ी चल रही जांच के सिलसिले में मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) 2002 के प्रावधानों के तहत 11.01 करोड़ रुपए की अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क कर लिया है.
ईडी ने गोवा पुलिस (अंजुना पुलिस स्टेशन और मापुसा पुलिस स्टेशन) द्वारा सौरभ लूथरा और अन्य लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 के विभिन्न प्रावधानों के तहत दर्ज एफआईआर के आधार पर जांच शुरू की. ये एफआईआर न केवल 6 दिसंबर 2025 को हुई भीषण आग की घटना से संबंधित हैं, जिसमें 25 लोगों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हो गए थे, बल्कि दस्तावेजों की जालसाजी से जुड़े अपराधों से भी संबंधित हैं, जिनमें नियामक मंजूरी प्राप्त करने के लिए उपयोग किए गए नकली और मनगढ़ंत अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) और अन्य वैधानिक दस्तावेज शामिल हैं.
पीएमएलए के तहत जांच से पता चला कि इस प्रतिष्ठान का संचालन एम/एस बीइंग जीएस हॉस्पिटैलिटी गोवा अर्पोरा एलएलपी द्वारा बिना अनिवार्य वैधानिक मंजूरी, जिसमें फायर एनओसी भी शामिल है, प्राप्त किए किया जा रहा था. प्रतिष्ठान के भागीदारों ने कथित तौर पर लाइसेंस प्राप्त करने और इस अवैध प्रतिष्ठान को वैध दिखाने के लिए नकली और मनगढ़ंत दस्तावेज, जिनमें एक नकली स्वास्थ्य एनओसी और जाली पुलिस क्लीयरेंस प्रमाण पत्र शामिल हैं, जमा किए थे.
जांच में आगे पता चला कि भागीदारों ने एक-दूसरे के साथ मिलीभगत करके, अनिवार्य लाइसेंसों की अनुपस्थिति और उनकी समय सीमा समाप्त होने के बावजूद जानबूझकर व्यावसायिक संचालन जारी रखा. प्रतिष्ठान का व्यापार लाइसेंस 31 मार्च 2024 को समाप्त हो गया था और उसका नवीनीकरण नहीं किया गया था. फिर भी, प्रतिष्ठान उसके बाद भी संचालित होता रहा.
जांच में आगे यह भी पता चला कि प्रतिष्ठान ने वित्त वर्ष 2023-24 से वित्त वर्ष 2025-26 (6 दिसंबर 2025 तक) की अवधि के दौरान लगभग 29.78 करोड़ रुपए का कुल राजस्व अर्जित किया, जिसे पीएमएलए के प्रावधानों के तहत ‘अपराध से अर्जित आय’ के रूप में पहचाना गया है.
इससे पहले, जांच के दौरान, 23 जनवरी 2026 को संबंधित संस्था से जुड़े विभिन्न परिसरों पर तलाशी ली गई थी, जिसके परिणामस्वरूप आपत्तिजनक दस्तावेज और डिजिटल उपकरण जब्त किए गए, तथा लगभग 59 लाख रुपए की राशि वाले बैंक खातों को फ्रीज कर दिया गया. इससे पहले, इस मामले में लगभग 17.45 करोड़ रुपए का एक प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर (पीएओ) जारी किया गया था. ताजा अटैचमेंट और फ्रीजिंग के साथ, इस मामले में अब कुल अटैचमेंट/फ्रीजिंग लगभग 29.05 करोड़ रुपए हो गई है.