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DJ के दौर में भी कायम है बोड़ाम के मेघनाथ परिवार का...


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Jamshedpur News: झारखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं में पारंपरिक वाद्य यंत्रों का खास महत्व है. इसी क्रम में जमशेदपुर से सटे बोड़ाम क्षेत्र के मेघनाथ परिवार ने पांच पीढ़ियों से ढोल-नगाड़े बनाने की इस पुश्तैनी कला को पूरी निष्ठा के साथ सहेज कर रखा है.

जमशेदपुर. झारखंड की पहचान यहां की समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं से भी है, जिसमें पर्व-त्योहार और धार्मिक आयोजन पारंपरिक वाद्य यंत्रों के बिना अधूरे लगते हैं. इसी क्रम में जमशेदपुर से सटे बोड़ाम क्षेत्र के रहने वाले मेघनाथ आज भी अपनी पांच पीढ़ियों से ढोल-नगाड़े और पारंपरिक वाद्य यंत्र बनाने के पुश्तैनी काम को पूरी निष्ठा के साथ निभा रहे हैं. मेघनाथ बताते हैं कि उनके पूर्वज कई पीढ़ियों पहले से ही ढोल और नगाड़े बनाने का काम करते आ रहे हैं.

उन्होंने बचपन से ही अपने परिवार के लोगों को लकड़ी को आकार देते और उसे वाद्य यंत्र का रूप देते देखा. धीरे-धीरे उन्होंने भी यह हुनर सीखा और आज खुद इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. उनके लिए यह सिर्फ रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि परिवार की पहचान और झारखंड की लोक संस्कृति से जुड़ी विरासत है.

ढोल बनाने की प्रक्रिया
ढोल बनाने की प्रक्रिया काफी अनोखी और मेहनत भरी होती है. सबसे पहले अच्छी और मजबूत लकड़ी का चयन किया जाता है. इसके बाद लकड़ी को जरूरत के हिसाब से काटकर अंदर से खोखला किया जाता है और उसे गोल आकार दिया जाता है. लकड़ी की मोटाई और मजबूती का खास ध्यान रखा जाता है, क्योंकि इसी पर ढोल की आवाज और उसकी मजबूती निर्भर करती है. इसके बाद लकड़ी के ढांचे को अच्छी तरह तैयार कर उसकी सतह को चिकना किया जाता है.

अंतिम रूप देना
इसके बाद ढोल को अंतिम रूप देने का काम शुरू होता है. पारंपरिक तरीके से तैयार किए गए लकड़ी के खोल पर जरूरी जगहों पर मिट्टी और अन्य प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. फिर ढोल के दोनों सिरों पर चमड़े को सही तरीके से लगाया और कसकर बांधा जाता है. चमड़े की कसावट को आवाज के हिसाब से ठीक किया जाता है, ताकि ढोल से निकलने वाली धुन साफ और दमदार हो.

आधुनिक दौर में चुनौती
नगाड़े में भी इसी तरह कई चरणों से गुजरकर उसकी आवाज को तैयार किया जाता है. एक वाद्य यंत्र बनाने में अनुभव के साथ-साथ काफी धैर्य और बारीकी की जरूरत होती है. मेघनाथ कहते हैं कि समय के साथ पारंपरिक ढोल-नगाड़ों की मांग पहले की तुलना में जरूर कम हुई है. आधुनिक डीजे और इलेक्ट्रॉनिक संगीत के बढ़ते चलन ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों के लिए चुनौती खड़ी की है.

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Raina Shukla

Raina Shukla is an experienced journalist and content professional with nearly two decades of experience in print and digital media. She holds a Master’s degree in Mass Communication and Journalism from Bundelk…

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