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el nino impact on kitchen: आपकी सुबह की चाय पर भी मंडरा...


अपूर्वा म‍िश्रा. 

क्या प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में बनने वाला मौसम पैटर्न आपकी सुबह की चाय को महंगा कर सकता है? सुनने में यह अजीब लग सकता है, लेकिन उद्योग विशेषज्ञ ठीक यही चेतावनी दे रहे हैं. तेज होता एल नीनो (El Niño) भारत के मानसून को कमजोर कर सकता है, जिससे पशुओं के चारे की उपलब्धता घटेगी और दूध उत्पादन पर दबाव पड़ेगा. इसके चलते आने वाले हफ्तों में दूध की कीमतों में फिर बढ़ोतरी हो सकती है.

डेयरी कंपनियां पहले से ही कीमतें बढ़ाने की संभावना के लिए तैयारी कर रही हैं. Parag Milk Foods के चेयरमैन देवेंद्र शाह ने The Times of India से कहा, “दूध की कीमतें पहले ही लगभग 2-3% बढ़ चुकी हैं और अगर प्रमुख दुग्ध उत्पादन वाले क्षेत्रों में बारिश सामान्य से कम रही, तो जुलाई तक कीमतों में 3-4% की और बढ़ोतरी संभव है.”

और असर सिर्फ दूध तक सीमित नहीं रह सकता. दालों, सब्जियों से लेकर खाद्य तेलों तक, सामान्य से कमजोर मानसून लाखों परिवारों का किराने का खर्च बढ़ा सकता है.

पहली नजर में यह संबंध साफ नहीं दिखता, लेकिन इसकी एक आसान कड़ी है. एल नीनो कमजोर मानसून लाता है, जिससे चारा और पानी कम हो जाता है. इसका परिणाम दूध उत्पादन में कमी और फिर दूध की कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में सामने आता है.

ज्यादातर दुग्ध पशु हरा चारा, फसल अवशेष और पर्याप्त पानी पर निर्भर होते हैं. कम बारिश से चारे की उपलब्धता घटती है और पशु आहार महंगा हो जाता है. ऐसे में किसानों को पशुओं को पालने पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है या फिर पशुओं की संख्या घटानी पड़ती है, जिससे दूध उत्पादन कम हो जाता है. जब सप्लाई घटती है लेकिन मांग बनी रहती है, तो कीमतें आमतौर पर बढ़ जाती हैं.

क्या दूध की कीमतें अभी हाल में नहीं बढ़ीं?

हाँ. Amul, Mother Dairy और Parag Milk Foods जैसी बड़ी डेयरी कंपनियों ने मई में दूध के दाम लगभग 2-3% बढ़ाए थे. उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर दूध उत्पादन वाले इलाकों में बारिश सामान्य से कम रही, तो जुलाई या अगस्त में 3-4% की एक और बढ़ोतरी हो सकती है.

इसका मतलब है कि दूध के अलावा दही, पनीर, मक्खन, घी और चीज़ जैसे डेयरी उत्पाद भी महंगे हो सकते हैं.

और क्या महंगा हो सकता है?

दूध सिर्फ शुरुआत हो सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोर मानसून कई खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ा सकता है, क्योंकि बारिश सीधे खेती को प्रभावित करती है.

पीडब्‍ल्‍यूसी इंड‍िया में कृषि, खाद्य और एग्रीबिजनेस के पार्टनर शशि कांत सिंह ने Moneycontrol से कहा, “प्रशांत महासागर में एक सुपर एल नीनो आकार ले रहा है और भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था इसकी सीधी चपेट में है. यह भारतीय कृषि के लिए बड़ा जोखिम बन रहा है.”

उन्होंने कहा कि इसका असर सिर्फ खरीफ फसलों तक सीमित नहीं रहेगा; गर्म सर्दियां रबी फसलों को भी प्रभावित कर सकती हैं.

सबसे बड़े खतरे इन क्षेत्रों में हैं:

  1. दालें:- तूर (अरहर) और अन्य दालें कमजोर मानसून में सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाली फसलों में हैं. सरकारी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि बारिश कमजोर रही तो उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है.
  2. खाद्य तेल:- सोयाबीन जैसी तिलहन फसलों का उत्पादन घट सकता है. इससे भारत की आयात पर निर्भरता बढ़ेगी और खाने के तेल की कीमतों पर दबाव पड़ेगा.
  3. सब्जियां:-टमाटर और अन्य सब्जियों के दाम खराब मानसून वाले वर्षों में तेजी से बढ़ते हैं, क्योंकि सप्लाई में थोड़ी भी कमी सीधे खुदरा कीमतों को प्रभावित करती है.
  4. पशु उत्पाद:-महंगे पशु आहार का असर समय के साथ अंडे, पोल्ट्री और अन्य पशु उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ सकता है, हालांकि इसका असर क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकता है.

Deloitte South Asia में क्लाइमेट चेंज एंड सस्टेनेबिलिटी के पार्टनर शैलेश त्यागी ने कहा कि फिलहाल सबसे बड़ी चिंता बारिश पर निर्भर फसलें हैं, जैसे दालें, तिलहन, मक्का और मोटे अनाज. कमजोर बारिश ग्रामीण आय, महंगाई और समग्र आर्थिक माहौल को प्रभावित कर सकती है.

क्या चावल और गेहूं भी महंगे होंगे?

ज़रूरी नहीं.

दालों और तिलहन जैसी फसलें बारिश की कमी से ज्यादा प्रभावित होती हैं, लेकिन चावल और गेहूं पर असर अपेक्षाकृत कम पड़ सकता है, क्योंकि भारत के पास पर्याप्त बफर स्टॉक, जलाशयों में अच्छा जल स्तर और पहले की तुलना में बेहतर सिंचाई सुविधाएं हैं.

हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर लंबे समय तक मानसून खराब रहा, तो स्थिति बदल सकती है.

क्या एल नीनो हमेशा महंगाई बढ़ाता है?

हर बार नहीं.

एल नीनो कमजोर और अस्थिर मानसून की संभावना बढ़ाता है, लेकिन उसका असर कई बातों पर निर्भर करता है—जैसे भारत में कुल बारिश, उसका वितरण, जलाशयों में पानी, सिंचाई सुविधाएं और सरकार द्वारा बफर स्टॉक या आयात जैसे कदम.

इसलिए हर एल नीनो के दौरान महंगाई बढ़े, यह जरूरी नहीं. लेकिन यह देखा गया है कि जब मानसून खराब रहता है, तब खाद्य कीमतें अक्सर बढ़ जाती हैं.

क्या उपभोक्ताओं को चिंता करनी चाहिए?

फिलहाल विशेषज्ञों की सलाह है कि जुलाई और अगस्त के मानसून पर नजर रखें, क्योंकि ये भारत की कृषि के लिए सबसे अहम महीने हैं.

अगर बारिश में सुधार होता है, तो दूध और खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है. लेकिन अगर एल नीनो और मजबूत हुआ और बारिश की कमी बनी रही, तो साल के दूसरे हिस्से में लोगों को महंगे किराने के लिए तैयार रहना पड़ सकता है. इसमें दूध सबसे पहले महंगा होने वाली जरूरी चीजों में शामिल हो सकता है.

साथ ही, कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि पिछले एल नीनो वर्षों की तुलना में भारत की स्थिति बेहतर है, क्योंकि अब सिंचाई कवरेज ज्यादा, खाद्यान्न बफर स्टॉक मजबूत और सरकारी तैयारी बेहतर है. इसलिए जब तक अगले दो महीनों में बारिश बहुत ज्यादा खराब नहीं होती, असर सीमित रह सकता है.



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