दुनिया की सबसे अमीर स्पेस एजेंसी नासा बस हाथ मलता रह गया और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO ने एक बार फिर चुपचाप बाजी मार ली है. चांद के दक्षिणी ध्रुव पर स्थित उस खौफनाक और घने अंधेरे से भरे फॉस्टिनी क्रेटर के नीचे जहां अरबों सालों से सूरज की एक किरण तक नहीं पहुंची है, चंद्रयान-2 के खोजी रडार ने एक ऐसा महा-खजाना ढूंढ निकाला है जिसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है. इसरो को इस बेहद रहस्यमयी गड्ढे की गहराई में पानी की बर्फ का एक विशाल भंडार मिला है, जिसे चांद का पेट्रोल’ कहा जाए तो गलत नहीं होगा. दरअसल, यह सिर्फ पीने का पानी नहीं बल्कि भविष्य में चांद पर बसने की दिशा में बेहद अहम चीज है.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के वैज्ञानिकों ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास चार ऐसे गड्ढों (क्रेटर्स) का पता लगाया है, जहां हमेशा अंधेरा रहता है. चंद्रयान-2 लूनर ऑर्बिटर के रडार डेटा का एनालिसिस करने के बाद वैज्ञानिकों को इन गड्ढों की सतह के नीचे पानी की बर्फ होने के पुख्ता संकेत मिले हैं. जांचे गए क्रेटर्स में से, फॉस्टिनी क्रेटर के भीतर 1.1 किलोमीटर (0.7 मील) का एक ऐसा क्षेत्र मिला है जो पूरी तरह से धूप और हानिकारक रेडिएशन से सुरक्षित है. इस हिस्से में रडार सिग्नेचर और सतह की बनावट से बर्फ दबी होने के सबसे मजबूत सबूत मिले हैं.
इसरो के आधिकारिक बयान के अनुसार, “ये निष्कर्ष चंद्र ध्रुवीय वाष्पशील पदार्थों के वितरण में महत्वपूर्ण नई अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं. भविष्य के चंद्र अन्वेषण मिशनों के लिए इसके गंभीर मायने हैं, जिसमें भविष्य में लैंडिंग और इन-सिटू रिसोर्स यूटिलाइजेशन (In-situ Resource Utilization – स्थानीय संसाधनों का वहीं उपयोग) गतिविधियों के लिए संभावित बर्फ-युक्त क्षेत्रों की पहचान शामिल है.” यह पूरी खोज चंद्रयान-2 ऑर्बिटर पर लगे डुअल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर रडार (DFSAR) के ऑब्जर्वेशन पर आधारित है, जो चंद्रमा की सतह के नीचे तक झांकने में सक्षम एक माइक्रोवेव इमेजिंग उपकरण है.
इस खोज की 5 मुख्य बातें
• चार अंधेरे गड्ढों में बर्फ के संकेत: चंद्रयान-2 के रडार डेटा ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास हमेशा अंधेरे में रहने वाले (Permanently Shadowed) चार प्रमुख क्रेटर्स के नीचे दबी हुई बर्फ का पता लगाया है.
• फॉस्टिनी क्रेटर में सबसे मजबूत सबूत: जांच किए गए क्षेत्रों में से फॉस्टिनी क्रेटर के अंदर 1.1 किलोमीटर का एक ऐसा इलाका मिला है, जहां धूप और रेडिएशन न पहुंचने के कारण बर्फ सुरक्षित रूप से जमी हुई है.
• DFSAR तकनीक का कमाल: यह पूरी खोज चंद्रयान-2 के विशेष उपकरण ‘डुअल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर रडार’ (DFSAR) की मदद से संभव हो सकी है, जो माइक्रोवेव तरंगों के जरिए चंद्र सतह के भीतर तक की मैपिंग कर सकता है.
• पहले के दावों को मिला मजबूत आधार: इससे पहले भी चंद्रयान-2 ने चंद्रमा की सतह पर पानी के अणुओं (Water Molecules) और हाइड्रॉक्सिल (Hydroxyl) की मौजूदगी दर्ज की थी. नया डेटा अब सतह के नीचे छिपे बड़े भंडारों की पुष्टि करता है.
• भविष्य के मिशनों का बदलेगा रास्ता: इसरो ने अब चंद्र ध्रुवों के हाई-रिझॉल्यूशन वाले नक्शे तैयार कर लिए हैं. ये मैप आने वाले समय में इंसानी बस्तियां बसाने और स्पेसक्राफ्ट की लैंडिंग साइट चुनने में गेम-चेंजर साबित होंगे.
सवाल-जवाब
चंद्रयान-2 ने चंद्रमा की सतह के नीचे छिपे पानी का पता कैसे लगाया, जबकि वह खुद ऊपर चक्कर काट रहा है?
इसके लिए चंद्रयान-2 में लगे ‘डुअल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर रडार’ (DFSAR) उपकरण का इस्तेमाल किया गया. यह उपकरण विशेष माइक्रोवेव किरणें नीचे भेजता है, जो चंद्रमा की सूखी धूल भरी सतह को भेदकर नीचे तक चली जाती हैं. जब ये किरणें नीचे दबी बर्फ से टकराकर वापस ऑर्बिटर के पास आती हैं, तो उनके सिग्नेचर बदल जाते हैं, जिससे सतह के नीचे छिपी चीजों का पता चल जाता है.
फॉस्टिनी (Faustini) क्रेटर में बर्फ इतने सुरक्षित रूप से कैसे बची रह सकती है?
फॉस्टिनी क्रेटर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के उस हिस्से में है जिसे ‘परमानेंटली शैडोएड रीजन’ (PSR) कहा जाता है. यहां गड्ढों की गहराई और स्थिति ऐसी है कि अरबों सालों से सूरज की सीधी रोशनी कभी नहीं पड़ी. धूप और घातक कॉस्मिक रेडिएशन न होने के कारण यहां का तापमान हमेशा बेहद कम (माइनस में) रहता है, जिससे पानी बर्फ के रूप में सुरक्षित जमा हुआ है.
इसरो की इस खोज से भविष्य के चंद्र मिशनों (जैसे चंद्रयान-4 या नासा के आर्टेमिस) को क्या सीधा फायदा होगा?
इस खोज के बाद इसरो ने उच्च-क्षमता वाले पोलर मैप (ध्रुवीय नक्शे) तैयार किए हैं. इससे नासा और इसरो जैसे संगठनों को यह सटीक जानकारी मिल जाएगी कि चांद पर अपने लैंडर और अंतरिक्ष यात्रियों को कहां उतारना है. इन नक्शों की मदद से वैज्ञानिक सीधे उसी 1.1 किलोमीटर वाले क्षेत्र के पास लैंडिंग कर सकते हैं जहां पानी आसानी से उपलब्ध हो सके.
क्या चांद पर मिलने वाले पानी का इस्तेमाल रॉकेट ईंधन के रूप में भी किया जा सकता है?
हां, यह इस खोज का सबसे क्रांतिकारी पहलू है. पानी ($H_2O$) को इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया के जरिए हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग किया जा सकता है. लिक्विड हाइड्रोजन और लिक्विड ऑक्सीजन को मिलाकर दुनिया का सबसे ताकतवर रॉकेट ईंधन (क्रायोजेनिक फ्यूल) बनता है. इससे चांद से ही दूसरे ग्रहों के लिए रॉकेट लॉन्च करना संभव हो जाएगा.