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Mamata Banerjee Politics : पश्चिम बंगाल की राजनीति में शनिवार को उस वक्त सबसे बड़ा सियासी उलटफेर हो गया, जब ममता बनर्जी ने खुद को टीएमसी का प्रदेश अध्यक्ष घोषित कर दिया. चंद्रिमा भट्टाचार्य के इस्तीफे के बाद ममता ने मदन मित्रा और कुणाल घोष को पार्टी कमेटी में जनरल सेक्रेटरी बनाकर सबको चौंका दिया है.
ममता बनर्जी बनीं टीएमसी बंगाल की अध्यक्ष.
कोलकाता. पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय अपने सबसे बड़े ऐतिहासिक और अभूतपूर्व दौर से गुजर रही है. मई 2026 में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों और सत्ता गंवाने के बाद से ही तृणमूल कांग्रेस के भीतर छिड़ा अंदरूनी घमासान अब बिल्कुल चरम पर पहुंच गया है. शनिवार को कोलकाता में टीएमसी की राष्ट्रीय अध्यक्ष ममता बनर्जी ने एक ऐसा चौंकाने वाला और गजब का ऐलान कर दिया, जिसने सूबे की पूरी सियासत को हिलाकर रख दिया है. ममता बनर्जी ने साफ शब्दों में घोषणा की है कि अध्यक्ष होने के नाते वे आज से खुद पश्चिम बंगाल राज्य टीएमसी अध्यक्ष का पदभार भी संभालेंगी.
ममता ने पार्टी के दो सबसे आक्रामक और वफादार चेहरों मदन मित्रा और कुणाल घोष को राज्य कमेटी में शामिल करते हुए सीधे जनरल सेक्रेटरी जैसी बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी है. इस बड़े फैसले के बाद राजनीतिक पंडितों का मानना है कि ममता बनर्जी ने विरोधियों और पार्टी के भीतर पनप रहे बागी सुरों को कुचलने के लिए सीधे कमान अपने हाथों में ले ली है.
क्यों लेना पड़ा ‘दीदी’ को यह बड़ा फैसला?
ममता बनर्जी का यह फैसला अचानक नहीं आया है, बल्कि इसके पीछे पिछले 24 घंटों में हुआ हाई-वोल्टेज ड्रामा है. ममता बनर्जी की बेहद करीबी मानी जाने वाली और हाल ही में बनाई गईं प्रदेश अध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य ने शनिवार को अचानक पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि शुक्रवार रात फोन पर ममता बनर्जी ने उनकी वफादारी पर सवाल उठाए थे, जिससे वे बेहद आहत हैं. शुक्रवार शाम को पार्टी के बागी विधायक दल के नेता रीताब्रत बनर्जी के गुट ने कोलकाता के तपसिया स्थित केंद्रीय कार्यालय ‘तृणमूल भवन’ पर नियंत्रण कर लिया और वहां ताला लगा दिया. उस वक्त चंद्रिमा भी वहीं थीं, जिसके बाद उन पर लापरवाही के आरोप लगे.
टीएमसी विधायक कुणाल घोष ने कहा है कि अच्छा हुआ कि उनकी पार्टी चुनाव हार गई. इससे पार्टी के भीतर छिपे गद्दारों की पहचान हो गई है.
कुणाल और मदन की वफादारी का इनाम
जब बागी गुट ने दफ्तर पर कब्जा किया, तो कुणाल घोष और मदन मित्रा ही वो नेता थे जो तुरंत मौके पर पहुंचे और इसका पुरजोर विरोध किया. यही वजह है कि संकट के समय साथ खड़े रहने के कारण दीदी ने इन्हें सीधे पार्टी का मुख्य रणनीतिकार बना दिया है.
अब बंगाल पॉलिटिक्स में क्या होगा?
ममता बनर्जी के खुद फ्रंट फुट पर आने और मदन-कुणाल की जोड़ी को कमान सौंपने के बाद अब बंगाल की राजनीति में ये तीन बड़े मोड़ देखने को मिल सकते हैं. रीताब्रत बनर्जी का बागी गुट बहुमत करीब 64 विधायक का दावा कर रहा है. ममता बनर्जी ने खुद कमान संभालकर चुनाव आयोग को कड़ा संदेश दिया है कि असली टीएमसी वही हैं. वहीं बागी गुट और विरोधी दल टीएमसी को कमजोर मान रहे थे. मदन मित्रा और कुणाल घोष जैसे फायरब्रांड नेताओं के हाथ में कमान आने से सड़कों पर टकराव बढ़ेगा. चंद्रिमा के हटने से बैंक खातों के ‘ऑथराइज्ड सिग्नेटरी’ का पद खाली हुआ था. खुद अध्यक्ष बनकर ममता बनर्जी ने आर्थिक और प्रशासनिक नियंत्रण पूरी तरह अपने हाथ में सुरक्षित कर लिया है.
मदन मित्रा कमरहाटी विधानसभा क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस के विधायक हैं. (फाइल फोटो)
कुणाल और मदन का बागी गुट को चैलेंज
जनरल सेक्रेटरी नियुक्त होने के तुरंत बाद कुणाल घोष और मदन मित्रा के तेवर बेहद तल्ख नजर आ रहे हैं. चंद्रिमा भट्टाचार्य के इस्तीफे पर निशाना साधते हुए कुणाल घोष ने कहा, “जब वे सत्ता में थीं और ढेरों मंत्रालयों का सुख भोग रही थीं, तब उन्होंने कभी इस्तीफा नहीं दिया. आज जब पार्टी संघर्ष कर रही है, तो वे मैदान छोड़कर भाग गईं. जाहिर है कि पश्चिम बंगाल में अब तृणमूल कांग्रेस के दो फाड़ होने की कानूनी और राजनीतिक जंग चुनाव आयोग की चौखट तक पहुंच चुकी है. लेकिन ममता बनर्जी ने खुद राज्य अध्यक्ष बनकर यह साफ कर दिया है कि वह टीएमसी को किसी भी हालत में छोड़ नहीं सकती.
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I am an alumnus of Bharatiya Vidya Bhavan, Delhi with a career in journalism that spans across several prestigious newsrooms. Over the years, I have honed my craft at Sahara Samay, Tehelka, P7 and Live India, a…और पढ़ें