जिस चावल को गरीब की थाली तक पहुंचना था. वह अब एथेनॉल प्लांट तक जा रहा है. सरकार देश में एथेनॉल मिक्स यानी E20 पेट्रोल को बढ़ावा दे रही है. ऐसे में सरकार ने देश भर में कई एथेनॉल प्लांट की स्थापना करवाई. इसके लिए एथेनाल प्लांट संचालकों को सब्सिडी भी दी गई. एमपी में 36 एथेनॉल प्लांट है.जिसमें 22 एथेनॉल प्लांट अनाज आधारित है.
ऐसे में उन एथेनॉल प्लांट को संचालित करने के लिए अनाज भी सब्सिडी में सरकार दे रही है. अब एथेनॉल प्लांट संचालक इसका खुब फायदा उठा रहे है.आर्थिक लाभ कमा रहे हैं. अब मध्य प्रदेश में एथेनॉल प्रोडक्शन के नाम पर सरकारी चावल के घोटाले का मामला उजागर हुआ है. लोकल 18 की पड़ताल में सामने आया कि लाखों क्विंटल चावल एथेनॉल फैक्ट्री के लिए निकला लेकिन वह वहां न पहुंचकर राइस मिलो तक जा रहा है.
पुलिस ने 17 ट्र्क जब्त किये
एसपी आदित्य मिश्रा ने लोकल 18 से कहा कि उसी के बाद 20 से ज्यादा अफसरों की एक एसआईटी गठित की गई. इस मामले में अब तक 50 से ज्यादा लोगों से पुछताछ की जा चुकी है. अब इस मामले में चार लोग गिरफ्तार हो चुके है. 13 अन्य लोगों पर मामला भी पंजीबद्ध हो चुका है. वहीं, पुलिस ने 17 ट्र्क जब्त किए है. अब जांच का दायरा बालाघाट जहां से चावल निकलता, सिवनी के ट्रांसपोर्टर और छिंदवाड़ा के एथेनॉल प्लांट भी जांच के दायरे में है.
यहां से खुली घोटाले की परतें
तीन जून की रात को बालाघाट के नवेगांव स्थित भारतीय खाद्य निगम यानी FCI के गोदाम से तीन ट्रक चावल छिंदवाड़ा की एग्रीको प्राइवेट लिमिटेड के लिए चावल निकलते हैं. लेकिन वह ट्रक वहां पहुंचते ही नहीं. इसमें से एक ट्रक बालाघाट के वारासिवनी के संचेती राइस मिल में मिलता है. ऐसे में सवाल उठा कि छिंदवाड़ा जाने वाला ट्रक वारासिवनी की राइस मिल में कैसे पहुंचा. फिर वहीं से पहली एफआईआर 5 जून को हुई, जिसमें ट्रक ड्राइवर दुर्गेश शेंद्रे AVJ एग्रिको एथेनॉल प्लांट के अधिकृत प्रतिनिधि राहुल प्रताप और राइस मिल संचालक सौरभ संचेती के खिलाफ दर्ज हुई. फिर यहीं से खुलती है चावल घोटाले की परतें.
गरीब की थाली की बजाय एथेनॉल प्लांट को गया चावल
इस मामले में लोकल 18 ने वरिष्ठ पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट आनंद ताम्रकार से बातचीत की. जो चावल एथेनॉल प्लांट को दिया गया वह सामान्य नहीं बल्कि फोर्टिफाइड चावल है. ऐसे में जो चावल गरीब की थाली में जाना था वह एथेनॉल प्लांट में जा रहा है. यह चावल कुपोषित बच्चों, गर्भवतियों और किशोरियों को पोषण देने के लिए पोषक तत्व डालकर तैयार किया जाता है. अब ऐसा होने पर न सिर्फ प्राइवेट प्लेयर्स बल्कि सरकारी तंत्र के भी बराबर की भागीदारी की आशंका है. ऐसे में समझिए वह चक्र जिससे हो रहा चावल का गोलमाल.
एमपी के 22 एथेनॉल प्लांटों तक पहुंचा FAQ चावल
वरिष्ठ पत्रकार आनंद ताम्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट का कहना है कि उन्हें जो आरटीआई से जानकारी मिली है वह बेहद चौकानें वाली है. एफसीआई ने एमपी के 22 एथेनॉल प्लांट को आवंटित किया है. यह बिक्री नवंबर 2025 से जून 2026 तक चली है. ऐसे में जो चावल बेचा जाएगा वह सरप्लस यानी अतिशेष रहेगा वह और पुराना चावल बेचा जाएगा. वहीं, जो ट्रक जो पुलिस ने जब्त किए है उसमें फोर्टिफाइड चावल मिला है. इसमें न सिर्फ एथेनॉल प्लांट संचालक बल्कि सरकारी तंत्र का एक संगठित गिरोह काम कर रहा है.
सब्सिडी वाले चावल का उठा रहे फायदा
सरकार एथेनॉल को प्रमोट करने के लिए एथेनॉल प्लांट को महंगे चावल को सब्सिडी में देती है. दरअसल, सरकार किसान से धान एमएसपी पर खरीद करती है. फिर उस धान के ट्रांसपोर्टेशन और प्रोसेसिंग पर पैसा खर्च करती है. ऐसे में एक क्विंटल चावल सरकार को 4000 रुपए में पड़ता है. लेकिन सरकार एथेनॉल प्लांट को वही चावल सिर्फ 2320 रुपए में बेचते हैं. सरकार की पॉलिसी के मुताबिक सरप्लस चावल एथेनॉल प्लांट को बेचा जा सकता है. अब इसी फायदा एथेनॉल प्लांट उठा रहे हैं.
अब समझिए घोटाले की क्या है एथेनॉल प्लांट की भूमिका
बालाघाट एक धान उत्पादक जिला है. ऐसे में यहां पर किसान से 2370 रुपए चावल खरीदा जाता है और इसकी प्रोसेसिंग, परिवहन और स्टोरेज का मिलाकर 4000 रुपए तक पहुंच जाता है. फिर वहीं चावल 2320 रुपए एथेनॉल प्लांटों के लिए निकलता है. फिर वह चावल भारतीय खाद्य निगम से एथेनॉल प्लांटों के लिए निकलता है. लेकिन वह चावल अच्छी किस्म का होता है. ऐसे में इसका सीधा फायदा एथेनॉल प्लांट उठाता है. यह चावल से एथेनॉल न बनाकर राइस मिलर्स से डील कर लेता है. वह राइस मिलर्स को वहीं, चावल 2800 रुपए में बेचता है. इससे एथेनॉल प्लांट संचालक एक क्विंटल पर लगभग 600 से 700 रुपए की कमाई करता है. वहीं, दूसरे बाजार से एथेनाल प्लांट संचालक बाहरी बाजार से सस्ती कीमत से सड़ा गला चावल खरीदता है और उससे एथेनॉल बनाता है.
राइस मिलर्स भी बड़े खिलाड़ी
सरकार एमएसपी पर जो चावल खरीदती है. उसकी मीलिंग भी करवाती है. ऐसे में यह जिम्मेदारी राइस मिलर्स को ही मिलती है. अब धान से चावल बनाने में उन्हें बिजली, मशीनरी और मजदूरी का खर्च आएगा. लेकिन वह जब एथेनॉल प्लांट से चावल खरीदेगी, तो उसकी बचत हो जाएगी. ऐसे में कस्टम मिलिंग के नाम पर सिर्फ मिल में चावल की बोरी और अपना टैग लगाकर एफसीआई में जमा करवा देता है. इसके अलावा वह भी मार्केट में वह चावल 32 सौ रुपए प्रति क्विंटल की दर से बेच देता है. ऐसे में राइस मिलर्स की भूमिका भी संदिग्ध हो जाती है.
अब समझिए किसका क्या है मुनाफा
इसमें प्रक्ररण में एथेनॉ़ल प्लांट संचालकों को धान बेचकर और सस्ता अनाज खरीदकर एथेनॉल बनाकर दोनों तरफ से आर्थिक लाभ होता है. इसमें वह राइस मिलर्स से सांठगांठ कर पैसा कमाते हैं. उन्हीं के माध्यम से सस्ता चावल और मक्का खरीद कर, उसी से एथेनॉल बनाकर सरकार की डिमांड को पूरा कर लेते हैं. ऐसे में वह सब्सिडी का फायदा भी उठाते और ऊपरी कमाई भी कर लेते हैं. फिर राइस मिलर्स पर जो एफसीआई गोदाम चावल जमा करवाने की जिम्मेदारी होती है. वह आसान हो जाती है. दरअसल, प्रोसेसिंग में मिलिंग, मजदूरी और मेंटेनेंस का खर्च बच जाता है और वही चावल एफसीआई गोदाम में जमा हो जाता है. आरटीआई एक्टिविस्ट आनंद ताम्रकार का कहना है कि इतनी बड़ी अनियमितता बिना सरकारी सहयोग के नहीं की जा सकती है. ऐसे में एफसीआई और जिला प्रशासन के अफसरों की मिलीभगत की भी आशंका है.
विपक्ष ने उठाए सवाल
इस प्रकरण में अब विपक्ष ने भी गंभीर सवाल खड़े किए है. इधर, पूर्व सांसद कंकर मुंजारे ने इस मामले में दो बार प्रेस कॉन्फ्रेंस की है. उन्होंने प्रशासन के मिलीभगत के आरोप लगाए है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि यह घोटाला मामूली नहीं बल्कि 100 करोड़ रुपए के घोटाले की आशंका जाहिर की है. पूर्व सांसद कंकर मुंजारे ने भी मसले में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठाया था. भाजपा जिलाध्यक्ष रामकिशोर कावरे के भाई राजकुमार कावरे इस रैकेट का सरगना होने का आरोप लगाया है. उनका आरोप है कि राजकुमार कावरे की हर्ष राइस इंडस्ट्रीज से इस रैकेट का संचालन होता है. वहीं, से सारे पेपर तैयार होते हैं और चावल कहा जाएगा तय होता है. ऐसे में इस मामले में उन्होंने हाईकोर्ट के जज की निगरानी करवाने के साथ सीबीआई जांच की मांग की है.
अब एसआईटी की जांच के खुलासे का इंतजार
अब इस मामले में बालाघाट एसपी आदित्य मिश्रा ने एक एसआईटी गठित की है. वह तीन जिलों को केंद्र में रखकर जांच कर रही है. ऐसे में अब सभी की निगाहें बालाघाट पुलिस की तरफ ही है. ऐसे में किसकी क्या भूमिका है और कौन लोग इस स्कैंडल में शामिल है. सवाल ये भी है कि कौन से रसूखदारों तक कानून के हाथ पहुंचते हैं. या फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा.