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WW2: हिटलर के ‘समुद्री दानव’ को डुबाने में ब्रिटेन को लगे थे...


27 मई 1941 की सुबह उत्तरी अटलांटिक महासागर में इतिहास का एक सबसे नाटकीय अध्याय अपने अंतिम मोड़ पर पहुंच चुका था. कुछ ही दिन पहले जिस जर्मन युद्धपोत ने ब्रिटिश साम्राज्य की समुद्री ताकत को खुली चुनौती दी थी, वही अब चारों ओर से दुश्मन जहाजों से घिरा खड़ा था. यह था जर्मनी का महाविशाल युद्धपोत बिस्मार्क, एक ऐसा नाम जिसने कुछ ही दिनों में पूरी दुनिया को अपनी ताकत का एहसास करा दिया था.

फरवरी 1939 में हैम्बर्ग से लॉन्च किया गया 823 फुट लंबा बिस्मार्क उस दौर के सबसे आधुनिक और सबसे शक्तिशाली युद्धपोतों में गिना जाता था. एडोल्फ हिटलर को उम्मीद थी कि यह जहाज जर्मन नौसैनिक शक्ति के पुनर्जन्म का प्रतीक बनेगा. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब ब्रिटेन ने जर्मनी के समुद्री रास्तों पर कड़ी निगरानी लगा रखी थी, तब बिस्मार्क को अटलांटिक महासागर में भेजने का फैसला किया गया.

योजना बेहद खतरनाक थी. खुले अटलांटिक में पहुंचकर बिस्मार्क मित्र देशों के व्यापारिक जहाजों और ब्रिटेन की आपूर्ति लाइनों पर हमला करने वाला था. यदि वह खुले समुद्र में स्वतंत्र रूप से घूमने लगता, तो ब्रिटेन की समुद्री जीवनरेखा गंभीर संकट में पड़ सकती थी.

फिर आया 24 मई 1941 का दिन
आइसलैंड के पास डेनमार्क स्ट्रेट में बिस्मार्क का सामना ब्रिटिश नौसेना के गौरव HMS Hood और नए युद्धपोत Prince of Wales से हुआ. इसके बाद शुरू हुई भीषण गोलाबारी ने नौसैनिक इतिहास का रुख बदल दिया. बिस्मार्क के एक घातक गोले ने HMS Hood के गोला-बारूद भंडार को भेद दिया. कुछ ही क्षणों में एक विशाल विस्फोट हुआ और ब्रिटेन का गौरव माना जाने वाला युद्धपोत दो हिस्सों में टूटकर समुद्र में समा गया.

1,418 अधिकारियों और नौसैनिकों में से केवल तीन लोग जीवित बच सके. यह ब्रिटिश नौसेना के इतिहास की सबसे बड़ी समुद्री त्रासदियों में से एक थी. इसी लड़ाई में Prince of Wales भी भारी दबाव में आ गया और उसे पीछे हटना पड़ा. कुछ ही घंटों में बिस्मार्क दुनिया का सबसे चर्चित युद्धपोत बन चुका था.

लेकिन इस जीत की कीमत भी उसे चुकानी पड़ी
लड़ाई के दौरान उसके ईंधन टैंक को नुकसान पहुंचा और तेल का रिसाव शुरू हो गया. यही रिसाव आगे चलकर उसकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुआ, क्योंकि ब्रिटिश नौसेना उसके रास्ते का अनुमान लगाने में सफल हो गई.

HMS Hood के डूबने की खबर ने पूरे ब्रिटेन को झकझोर दिया. इसके बाद एक ही आदेश दिया गया—”बिस्मार्क को हर हाल में खत्म करो” ब्रिटिश नौसेना ने अपने इतिहास के सबसे बड़े शिकार अभियानों में से एक शुरू किया. बिस्मार्क को खोजने के लिए लगभग 50 युद्धपोतों और सहायक जहाजों को अभियान में झोंक दिया गया. विमानवाहक पोत, क्रूजर, विध्वंसक और युद्धपोत लाखों वर्ग मील समुद्री क्षेत्र में उसकी तलाश करने लगे.

करीब तीन दिनों तक अटलांटिक महासागर में पीछा चलता रहा
24 मई 1941 की रात विमानवाहक पोत HMS Victorious से उड़ान भरने वाले Swordfish विमानों ने पहला हमला किया. खराब मौसम, अंधेरा और भारी एंटी-एयरक्राफ्ट फायर के बावजूद पायलटों ने बिस्मार्क तक पहुंचकर टॉरपीडो हमला किया. जहाज को कुछ नुकसान पहुंचा, लेकिन वह अभी भी भाग निकलने में सक्षम था.

दो दिन बाद, 26 मई को बिस्मार्क फिर दिखाई दिया. अब वह फ्रांस के ब्रेस्ट बंदरगाह से एक दिन से भी कम दूरी पर था. अगर वह वहां पहुंच जाता, तो जर्मन हवाई सुरक्षा उसे बचा सकती थी.

यहीं से इतिहास का निर्णायक मोड़ आया
विमानवाहक पोत HMS Ark Royal से 15 Swordfish विमान खराब मौसम, तेज हवाओं और ऊंची लहरों के बीच उड़ान भरकर बिस्मार्क पर टूट पड़े. भारी गोलाबारी और कठिन परिस्थितियों के बावजूद दो टॉरपीडो अपने लक्ष्य तक पहुंचे. इनमें से एक टॉरपीडो बिस्मार्क के पिछले हिस्से में लगा और उसके रडर को जाम कर गया. अब दुनिया के सबसे चर्चित युद्धपोत की दिशा नियंत्रित करने की क्षमता लगभग खत्म हो चुकी थी. विशाल बिस्मार्क खुले समुद्र में फंस गया था.

इसके बाद ब्रिटिश बेड़े ने उसे चारों ओर से घेर लिया
27 मई 1941 की सुबह HMS King George V और HMS Rodney समेत ब्रिटिश युद्धपोत उसके करीब पहुंचे और अंतिम हमला शुरू हुआ. बिस्मार्क ने अंत तक जवाबी गोलाबारी की. उसके विशाल तोपखाने आखिरी क्षण तक लड़ते रहे. लेकिन अब उसके खिलाफ पूरा ब्रिटिश बेड़ा खड़ा था.

करीब 90 मिनट तक चली भीषण लड़ाई में बिस्मार्क पर 700 से अधिक गोले बरसाए गए. लगातार गोलाबारी, आग, विस्फोट और टॉरपीडो हमलों ने जर्मनी के इस महाविशाल युद्धपोत को धीरे-धीरे एक तैरते हुए मलबे में बदल दिया.

फिर भी उसने आखिरी सांस तक युद्ध जारी रखा
आखिरकार जब जहाज को बचाना असंभव हो गया, तो उसे स्वयं डुबाने का आदेश दिया गया. इसी दौरान ब्रिटिश भारी क्रूजर HMS Dorsetshire ने भी टॉरपीडो दागे. सुबह 10 बजकर 36 मिनट पर बिस्मार्क उत्तरी अटलांटिक की गहराइयों में समा गया.

2,221 लोगों के चालक दल में से केवल लगभग 115-116 लोग ही जीवित बच पाए. 2,000 से अधिक जर्मन नौसैनिक उसके साथ समुद्र में खो गए. सिर्फ 96 घंटे पहले जिसने HMS Hood को डुबोकर पूरी दुनिया को चौंका दिया था, वही बिस्मार्क अब समुद्र की तलहटी में पहुंच चुका था.

लेकिन उसकी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई
बिस्मार्क का अंत केवल एक युद्धपोत का डूबना नहीं था. इस घटना ने साबित कर दिया कि समुद्री युद्ध का भविष्य बदल रहा है. विमानवाहक पोतों और नौसैनिक विमानों ने दिखा दिया कि दुनिया का सबसे शक्तिशाली युद्धपोत भी अब अजेय नहीं रहा.

फिर भी इतिहास में बिस्मार्क का नाम आज भी उस जहाज के रूप में दर्ज है, जिसने कुछ दिनों के लिए ही सही, लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य की सबसे शक्तिशाली नौसेना को चुनौती दी, HMS Hood को समुद्र में दफनाया और अपने पीछे ऐसी कहानी छोड़ गया, जिसे दुनिया आज भी रोमांच के साथ पढ़ती है.



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