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झारखंड के विश्वविद्यालयों में परीक्षा व्यवस्था में बड़ी वित्तीय गड़बड़ी सामने आई है। विश्वविद्यालयों में परीक्षा संचालन, उत्तर पुस्तिका प्रबंधन, ऑनलाइन टेस्टिंग, रिजल्ट प्रोसेसिंग और डिजिटलाइजेशन के नाम पर एजेंसी को करीब पांच साल में 75 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया। केंद्र सरकार ने परीक्षा संबंधी सेवाओं को जीएसटी से मुक्त रखा है। इसके बावजूद एजेंसी को 18 प्रतिशत की दर से करीब 13.50 करोड़ रुपए का अतिरिक्त जीाएसटी भुगतान भी कर दिया गया। गड़बड़ी खुलासा नीलांबर-पीतांबर यूनिवर्सिटी की स्पेशल ऑडिट रिपोर्ट में हुआ। यह ऑडिट रिपोर्ट लोकभवन और सरकार को भेज दी गई है। इस गड़बड़ी के खुलासे के बाद रांची यूनविर्सिटी, विनोबा भावे यूनिवर्सिटी सहित सभी विश्वविद्यालयों की वित्तीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। चूंकि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी यूनिवर्सिटी को छोड़कर सभी यूनिवर्सिटी में एक ही एजेंसी नेशनल कंज्यूमर को-ऑपरेटिव फेडरेशन ऑफ इंडिया (एनसीसीएफ) सेवा दे रही है। यह केंद्रीय उपभोक्ता मामले मंत्रालय के तहत आने वाली एक मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव सोसाइटी है। इसलिए आने वाले दिनों में जांच का दायरा पूरे राज्य में फैलना तय है। रिकवर हो सकती है जीएसटी की यह राशि झारखंड के विश्वविद्यालयों द्वारा परीक्षा सेवा के नाम पर एजेंसी को चुकाया गया जीएसटी अवैध है। ये पैसे रिकवर हो सकते हैं। विश्वविद्यालयों के पास इसके दो कानूनी रास्ते हैं…सावित्री झा, चार्टर्ड अकाउंटेंट 1. क्रेडिट नोट : विवि प्रशासन संबंधित एजेंसी पर दबाव बनाए कि वह जीएसटी कानून की धारा 34 के तहत ‘क्रेडिट नोट’ जारी करे। इससे विवि का पैसा वापस मिल जाएगा।
2. सीधे सरकार से रिफंड : एजेंसी सहयोग न करे तो विवि जीएसटी पोर्टल पर अस्थाई आईडी बनाकर फॉर्म जीएसटी आरएफडी-01 के जरिए केंद्र से रिफंड का दावा ठोके। एनपीयू में पकड़ी गईं ये 7 गड़बड़ियां…
1. क्रेडिट नोट : विवि प्रशासन संबंधित एजेंसी पर दबाव बनाए कि वह जीएसटी कानून की धारा 34 के तहत ‘क्रेडिट नोट’ जारी करे। इससे विवि का पैसा वापस मिल जाएगा। 2. सीधे सरकार से रिफंड : एजेंसी सहयोग न करे तो विवि जीएसटी पोर्टल पर अस्थाई आईडी बनाकर फॉर्म जीएसटी आरएफडी-01 के जरिए केंद्र से रिफंड का दावा ठोके। 1 एक तारीख…दो एग्रीमेंट, दोनों अलग: ऑडिट टीम को एक ही तारीख के दो अलग-अलग एग्रीमेंट मिले हैं। एक एग्रीमेंट में भुगतान की दर और 18 प्रतिशत जीएसटी का स्पष्ट उल्लेख है। वहीं दूसरे में जीएसटी का जिक्र नहीं है। यह पूरी टेंडर प्रक्रिया को संदिग्ध बनाता है। 2 शर्तों में लगातार बदलाव: फाइनेंसियल बीड में कुछ और शर्त थी, निगोशिएशन के बाद दूसरी शर्त जोड़ी गई। एग्रीमेंट में तीसरी और वर्क ऑर्डर में चौथी शर्त मिली। इसमें सबसे बड़ा हेरफर जीएसटी को लेकर किया गया। 3 अधिकारियों की चुप्पी: वर्षों तक विश्वविद्यालय के जिम्मेदार अधिकारियों ने यह जांचने की जहमत नहीं नहीं उठाई कि जिन सेवाओं पर करोड़ों का जीएसटी दिया जा रहा है, वह नियम के अनुकूल है या नही। 4 गलत सैक कोड का खेल: टैक्स चारी या गलत तरीके से टैक्स वसूलने के लिए परीक्षा सेवाओं के निर्धारित सर्विस अकाउंटिंग कोड (सैक कोड) को बदलकर दूसरे कोड का इस्तेमाल किया गया। ताकि 18 प्रतिशत जीएसटी को वैध दिखाया जा सके। 5 ई-इनवॉइसिंग का उल्लंघन: कई बड़े भुगतान में सरकार द्वारा अनिवार्य की गई ई-इनवॉइसिंग की प्रक्रिया का पालन नहीं किया। 6 फाइनेंशियल एडवाइजर की लापरवाही: नीलांबर-पीतांबर यूनिवर्सिटी के फाइनेंशियल एडवाइजर ने लिखित में स्वीकार किया कि परीक्षा सेवाओं पर जीरो जीएसटी लागू होने चाहिए। फिर भी लापरवाही बरती और भुगतान होता रहा। 7 सीए की भूमिका भी सवाल: ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्वविद्यालयों के आंतरिक चार्टर्ड अकाउंटेंट ने इतने साल तक इस अवैध भुगतान प्रक्रिया पर कोई आपत्ति क्यों नहीं दर्ज की। जानिए…शैक्षणिक संस्थानों के लिए क्या है जीएसटी नियम जीएसटी कानून की अधिसूचना संख्या 12/2017- सेंट्रल टैक्स (रेट) में शैक्षणिक संस्थानों को टैक्स से छूट दी गई है। इसके तहत दोतरफा राहत मिलती है। छात्रों से ली जानेवाली फीस जब कोई मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय छात्रों से परीक्षा फॉर्म, प्रवेश परीक्षा, स्क्रूटनी, या डुप्लीकेट मार्शशीट और डिग्री के नाम पर कोई शुल्क लेता है तो उस पर कोई जीएसटी नहीं लगता। आउटसोर्स एजेंसियां अगर कोई विश्वविद्यालय किसी बाहरी एजेंसी जैसे एनसी सीएफ या किसी अन्य एजेंसी को परीक्षा से जुड़े कार्यों का ठेका देता है तो उस एजेंसी द्वारा विश्वविद्यालयों केा दिए जाने वाले िबल पर भी जीएसटी शून्य होता है।
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