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Thai Apple Ki Kheti: कृषि क्षेत्र में बढ़ती लागत और घटते मुनाफे के बीच किसान अब ऐसी फसलों की तलाश कर रहे हैं जो कम पानी, कम मेहनत और कम लागत में अधिक आय दे सकें. थाई एप्पल की खेती इसी दिशा में एक बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है. विशेषज्ञों के अनुसार एक बार पौधे लगाने के बाद कई वर्षों तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है, जिससे किसानों को लगातार आय का स्रोत मिलता है. यह फसल पारंपरिक फसलों की तुलना में अधिक लाभदायक मानी जा रही है. थाई एप्पल के पौधों को अपेक्षाकृत कम सिंचाई की आवश्यकता होती है और इनकी देखभाल भी आसान होती है. बाजार में इसकी अच्छी मांग होने के कारण किसानों को बेहतर कीमत मिलने की संभावना रहती है. बागवानी आधारित इस खेती से उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है.
बदलते समय के साथ करौली जिले के किसान अब परंपरागत खेती के बजाय नकदी फसलों और बागवानी की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. इन्हीं में से एक है थाई एप्पल की खेती, जो कम लागत, कम पानी और बेहतर मुनाफे के कारण किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रही है. विशेषज्ञों के अनुसार एक बार पौधे लगाने के बाद कई वर्षों तक इससे उत्पादन लिया जा सकता है.
पौधे लगाने के बाद लगभग दो से तीन वर्षों में अच्छी मात्रा में फल मिलने लगते हैं. हर साल फरवरी-मार्च में पौधों की छंटाई की जाती है, जिसके बाद नए फुटाव के साथ अक्टूबर-नवंबर से फल उत्पादन शुरू हो जाता है.
कृषि जानकारों के अनुसार थाई एप्पल के पौधे विश्वसनीय नर्सरी से खरीदकर लगाए जा सकते हैं. पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखी जाती है ताकि उनका विकास बेहतर तरीके से हो सके. खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था होना जरूरी है. अच्छी पैदावार के लिए जैविक खाद, गोबर खाद और सरसों की खली का उपयोग लाभदायक माना जाता है.
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थाईलैंड के फल की खेती करने वाले किसान हेमंत का कहना है कि परंपरागत खेती के साथ किसी दूसरी खेती को नहीं किया जा सकता है. लेकिन थाई एप्पल की खेती के साथ दूसरी खेती भी संभव है. हम हर साल इसकी खेती के साथ ही आलू, मूंगफली सहित कई प्रकार की खेती भी इसी के साथ ही कर लेते हैं.
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार में थाई एप्पल की मांग लगातार बढ़ रही है. बेहतर प्रबंधन और उचित देखभाल के साथ किसान इसकी खेती से सालाना लाखों रुपये की आय अर्जित कर सकते हैं. यही कारण है कि करौली जिले के कई किसान अब परंपरागत खेती छोड़कर इस फल की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं.
थाई एप्पल की खेती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें गेहूं, चना और अन्य पारंपरिक फसलों की तुलना में पानी की आवश्यकता काफी कम होती है. इसमें पौधों की देखभाल भी कम और आसान होती है, जिससे किसानों की मेहनत और लागत दोनों कम हो जाती हैं.
थाई एप्पल के बागानों में पर्याप्त जगह होने के कारण किसान इसके साथ आलू, मूंगफली, सब्जियां और अन्य फसलें भी उगा सकते हैं. इससे एक ही खेत से किसानों को आय के कई स्रोत मिल जाते हैं.