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कारगिल की साज़िश के 4 चेहरे… आखिर कौन था पाकिस्तान का ‘Gang...


यह कारगिल युद्ध के पीछे की सबसे बड़ी साजिश की कहानी है. इसे आसान भाषा में समझाने के लिए इस विशेष रिपोर्ट को 3 भागों में तैयार किया है. इसमें जानेंगे कि आखिर ‘गैंग ऑफ फोर’ कौन था, कारगिल की योजना कब और कैसे बनी, किन चार जनरलों ने इसे तैयार किया, नवाज़ शरीफ को कितनी जानकारी थी और इस पूरे ऑपरेशन ने पाकिस्तान की राजनीति को कैसे बदल दिया. पूरी कहानी समझने के लिए तीनों भाग क्रम से जरूर पढ़ें, क्योंकि हर भाग पिछले भाग से जुड़ा हुआ है.

कारगिल की साजिश की शुरुआत… कैसे बने ‘गैंग ऑफ फोर’ और कब तैयार हुआ पहला प्लान?
1999 कारगिल युद्ध की साज़िश पाकिस्तानी सेना मुख्यालय (GHQ) के बंद कमरों में लिखी जा रही थी. कारगिल की पूरी योजना किसी बड़े सैन्य संस्थागत विचार-विमर्श का नतीजा नहीं थी, बल्कि यह केवल चार वरिष्ठ जनरलों की सोच थी. बाद में यही “Gang of Four” के नाम से जाना गया.

हालांकि पाकिस्तान सरकार या सेना ने कभी आधिकारिक रूप से “Gang of Four” शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार नसीम ज़हरा ने अपनी चर्चित किताब From Kargil to the Coup: Events That Shook Pakistan में इस सीमित समूह का विस्तार से जिक्र किया है. वहीं पाकिस्तान सेना के पूर्व Director General Military Operations (DGMO) लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) शाहिद अज़ीज़ ने अपनी उर्दू किताब Ye Khamoshi Kahan Tak में लिखा कि कारगिल अभियान की पूरी जानकारी केवल कुछ चुनिंदा अधिकारियों तक सीमित थी और सामान्य सैन्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था.

कारगिल की योजना बनाने वाले इन चार अधिकारियों में उस समय के सेना प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ, चीफ ऑफ जनरल स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद अज़ीज़ खान, 10 कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल महमूद अहमद और फोर्स कमांड नॉर्दर्न एरियाज़ (FCNA) के कमांडर मेजर जनरल जावेद हसन शामिल थे. इन्हीं चार अधिकारियों को कारगिल योजना का मुख्य रणनीतिक समूह माना जाता है. पाकिस्तानी न्यूज़ के एक शू में वहां के वरिष्ठ पत्रकार नज़म सेठी भी इसका ज़िक्र कर चुके हैं.

अचानक नहीं बनी थी कारगिल की योजना
कई लोगों को लगता है कि कारगिल की योजना 1999 में अचानक बना ली गई थी, लेकिन उपलब्ध सैन्य दस्तावेज़ और शोध बताते हैं कि इसकी जड़ें लगभग डेढ़ दशक पुरानी थीं. वर्ष 1984 में भारत ने ऑपरेशन मेघदूत के जरिए सियाचिन ग्लेशियर की रणनीतिक चोटियों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था. इसके बाद पाकिस्तान सेना के भीतर लगातार यह चर्चा होती रही कि भारत की इस बढ़त का जवाब कैसे दिया जाए.

पाकिस्तान के कई सैन्य अधिकारियों का मानना था कि यदि नियंत्रण रेखा (LoC) के भारतीय हिस्से में मौजूद कुछ ऊंची चोटियों पर कब्जा कर लिया जाए तो श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-1A) पर दबाव बनाया जा सकता है. यही सड़क भारतीय सेना के लिए लद्दाख और सियाचिन तक रसद पहुंचाने की जीवनरेखा थी. परवेज़ मुशर्रफ ने अपनी आत्मकथा In the Line of Fire में दावा किया है कि 1989–90 के दौरान, जब बेनज़ीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री थीं और वह मेजर जनरल के पद पर थे, तब उन्होंने कश्मीर में भारत के खिलाफ एक आक्रामक सैन्य योजना का प्रस्ताव रखा था. हालांकि, मुशर्रफ के मुताबिक बेनज़ीर भुट्टो ने इस प्रस्ताव को मंजूरी देने से इनकार कर दिया.

अक्टूबर 1998: जब सब कुछ बदल गया
कारगिल की कहानी में सबसे अहम मोड़ 12 अक्टूबर 1998 को आया. उस दिन पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने सेना प्रमुख जनरल जहांगीर करामत के इस्तीफे के बाद जनरल परवेज़ मुशर्रफ को नया Chief of Army Staff (COAS) नियुक्त किया. मुशर्रफ की नियुक्ति कई मायनों में चौंकाने वाली थी. उनसे वरिष्ठ कई अधिकारी मौजूद थे, लेकिन नवाज़ शरीफ ने उन्हें दरकिनार कर मुशर्रफ को सेना की कमान सौंप दी. यही फैसला पाकिस्तान की राजनीति और सेना, दोनों के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ.

पत्रकार नसीम ज़हरा के अनुसार, सेना प्रमुख बनने के कुछ ही सप्ताह बाद मुशर्रफ ने कश्मीर और कारगिल सेक्टर को लेकर पुराने सैन्य प्रस्तावों की समीक्षा शुरू कर दी. उन्होंने सीमित अधिकारियों के साथ बैठकों का दौर शुरू किया और कारगिल क्षेत्र का हवाई तथा जमीनी अध्ययन कराया. इन बैठकों में केवल वही अधिकारी शामिल किए गए जिन पर उन्हें पूरा भरोसा था.

कौन थे वे चार जनरल?
यही वह समय था जब पाकिस्तान सेना के भीतर एक छोटा लेकिन बेहद प्रभावशाली समूह सक्रिय हुआ. इसमें चार अधिकारी शामिल थे: जनरल परवेज़ मुशर्रफ, लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद अज़ीज़ खान, लेफ्टिनेंट जनरल महमूद अहमद और मेजर जनरल जावेद हसन. बाद में इन्हें ही अनौपचारिक रूप से “Gang of Four” कहा गया.

इस समूह की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि चारों अधिकारी कश्मीर मोर्चे और उत्तरी इलाकों की सैन्य परिस्थितियों से अच्छी तरह परिचित थे. मुशर्रफ ने अपने सैन्य करियर का बड़ा हिस्सा उत्तरी क्षेत्रों में बिताया था. जावेद हसन लंबे समय से उत्तरी इलाकों में तैनात रहे थे और इलाके की भौगोलिक चुनौतियों को अच्छी तरह समझते थे. मोहम्मद अज़ीज़ रणनीतिक योजना और समन्वय के विशेषज्ञ माने जाते थे, जबकि महमूद अहमद के पास नियंत्रण रेखा से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण सैन्य क्षेत्र की जिम्मेदारी थी.

सबसे पहले क्या सोचा गया?
इस समूह का मानना था कि सर्दियों के दौरान भारत नियंत्रण रेखा के कई ऊंचे पोस्ट मौसम की वजह से खाली कर देता है. यदि पाकिस्तान की सेना इन चोटियों पर पहले पहुंच जाए और वहां मजबूत बंकर बना ले, तो गर्मियों में भारतीय सेना के लिए उन्हें वापस लेना बेहद कठिन होगा.

योजना का मूल उद्देश्य भारत पर व्यापक युद्ध थोपना नहीं था. बल्कि यह सोचा गया कि सीमित सैन्य कार्रवाई के जरिए भारत को रणनीतिक दबाव में लाया जाए, ताकि कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फिर से प्रमुखता मिले और भारत बातचीत के लिए मजबूर हो. इसी सोच के आधार पर एक गुप्त सैन्य योजना तैयार की गई, जिसे अधिकांश शोधकर्ता “ऑपरेशन बद्र (Operation Badr)” के नाम से जानते हैं. इस नाम का इस्तेमाल अक्सर इस्लामिक देशों द्वारा ‘अपेक्षाकृत छोटी ताकत से बड़ी जीत हासिल करने’ या ‘असंभव को संभव करने’ के प्रतीक के रूप में किया जाता है.

योजना इतनी गोपनीय क्यों रखी गई?
कारगिल योजना की सबसे बड़ी विशेषता उसकी गोपनीयता थी. पूर्व डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल शाहिद अज़ीज़ ने बाद में लिखा कि यह पाकिस्तान सेना की सामान्य निर्णय प्रक्रिया से अलग था. उनके अनुसार, सेना मुख्यालय के कई वरिष्ठ अधिकारी पूरी योजना से अनजान थे. यहां तक कि सैन्य संचालन निदेशालय (Military Operations Directorate) के कुछ अधिकारियों को भी पूरी जानकारी बहुत बाद में मिली.

शाहिद अज़ीज़ के मुताबिक, पाकिस्तान वायुसेना (PAF) को भी शुरुआती योजना में शामिल नहीं किया गया था. नौसेना को भी इसकी पूरी जानकारी नहीं थी. यही कारण था कि बाद में पाकिस्तान के भीतर भी इस बात पर गंभीर सवाल उठे कि आखिर इतना बड़ा सैन्य अभियान केवल चार अधिकारियों के सीमित समूह तक ही क्यों रखा गया?

क्या नवाज़ शरीफ को पूरी जानकारी थी?
कारगिल विवाद का सबसे बड़ा और सबसे संवेदनशील सवाल यही है. पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने कई बार कहा कि उन्हें कारगिल अभियान की पूरी जानकारी नहीं दी गई थी. उनका दावा था कि उन्हें नियमित पाकिस्तानी सैनिकों की घुसपैठ और अभियान के वास्तविक उद्देश्य के बारे में पूरी तरह नहीं बताया गया.

दूसरी ओर, नवाज़ शरीफ को कुछ स्तर तक जानकारी दी गई थी, लेकिन पूरी सैन्य योजना और उसके संभावित परिणामों से उन्हें अवगत नहीं कराया गया. नसीम ज़हरा ने भी अपनी पुस्तक में लिखा है कि नागरिक और सैन्य नेतृत्व के बीच सूचना का गंभीर अंतर था. हालांकि उपलब्ध स्रोत इस बात पर पूरी तरह एकमत नहीं हैं कि नवाज़ शरीफ को कितनी जानकारी थी. पाकिस्तानी न्यूज़ के एक शू में वहां के वरिष्ठ पत्रकार नज़म सेठी भी इसका ज़िक्र कर चुके हैं.

नवंबर 1998 से जनवरी 1999: तैयारियां तेज हुईं
अक्टूबर 1998 में प्रारंभिक चर्चा शुरू होने के बाद नवंबर और दिसंबर में योजना को अंतिम रूप दिया जाने लगा. इसी दौरान उत्तरी क्षेत्रों में मौजूद Northern Light Infantry (NLI) की कुछ इकाइयों को विशेष जिम्मेदारियां दी गईं. सर्दियों की आड़ में सीमित संख्या में सैनिकों और रसद को आगे बढ़ाने की तैयारी शुरू हुई. उद्देश्य था कि बर्फ पिघलने से पहले ऊंची चोटियों पर कब्जा कर मजबूत ठिकाने बना लिए जाएं, ताकि गर्मियों में भारतीय सेना के लिए उन्हें खाली कराना बेहद कठिन हो.

यहीं से कारगिल अभियान की वह कहानी शुरू होती है, जिसने कुछ ही महीनों बाद दक्षिण एशिया की राजनीति, भारत-पाकिस्तान संबंधों और पाकिस्तान की आंतरिक सत्ता व्यवस्था को हमेशा के लिए बदल दिया.

भाग-2: ऑपरेशन बद्र का ब्लूप्रिंट… चार जनरल कैसे बना रहे थे कारगिल की सबसे गुप्त योजना?
अक्टूबर 1998 में जनरल परवेज़ मुशर्रफ के सेना प्रमुख बनने के बाद कारगिल को लेकर पाकिस्तान सेना के भीतर एक सीमित स्तर पर चर्चा शुरू हुई. वरिष्ठ पत्रकार नसीम ज़हरा अपनी पुस्तक From Kargil to the Coup में लिखती हैं कि मुशर्रफ ने सेना प्रमुख बनने के कुछ ही समय बाद कश्मीर और कारगिल सेक्टर का कई बार दौरा किया. इन दौरों में उनके साथ केवल चुनिंदा अधिकारी होते थे. इन्हीं बैठकों में यह विचार आकार लेने लगा कि नियंत्रण रेखा (LoC) के भारतीय हिस्से की ऊंची चोटियों पर कब्जा कर भारत को सामरिक रूप से दबाव में लाया जा सकता है.

योजना का सबसे अहम पहलू उसकी गोपनीयता थी. यह पाकिस्तान सेना के सामान्य सैन्य ढांचे के तहत तैयार नहीं की गई. सामान्य परिस्थितियों में किसी बड़े सैन्य अभियान पर विभिन्न कोर कमांडरों, सैन्य संचालन निदेशालय (Military Operations Directorate), वायुसेना और नौसेना के साथ विस्तृत विचार-विमर्श होता है. लेकिन कारगिल योजना में ऐसा नहीं हुआ. पाकिस्तान सेना के पूर्व डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल शाहिद अज़ीज़ ने अपनी पुस्तक Ye Khamoshi Kahan Tak में लिखा है कि उन्हें भी पूरी जानकारी बहुत बाद में मिली और उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि इतना बड़ा अभियान संस्थागत प्रक्रिया से नहीं गुजर रहा था.

योजना का संचालन चार अधिकारियों के बीच बांट दिया गया था.

  • जनरल परवेज़ मुशर्रफ सर्वोच्च निर्णयकर्ता थे. अंतिम मंजूरी देना, अभियान की दिशा तय करना और पूरे ऑपरेशन की गोपनीयता बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी थी.
  • चीफ ऑफ जनरल स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद अज़ीज़ खान जीएचक्यू और फील्ड कमांडरों के बीच समन्वय कर रहे थे.
  • लेफ्टिनेंट जनरल महमूद अहमद, जो उस समय 10 कोर के कमांडर थे, उन्हें नियंत्रण रेखा पर अभियान के क्रियान्वयन और रसद की जिम्मेदारी दी गई.
  • मेजर जनरल जावेद हसन, जो फोर्स कमांड नॉर्दर्न एरियाज़ (FCNA) के कमांडर थे, उन्होंने इलाके का सैन्य अध्ययन किया और वास्तविक ऑपरेशनल प्लान तैयार किया.

जावेद हसन को कारगिल योजना का वास्तविक सैन्य वास्तुकार माना जाता है. उन्होंने उत्तरी क्षेत्रों में लंबे समय तक सेवा की थी और उन्हें कारगिल, द्रास, बटालिक और आसपास के दुर्गम इलाकों की भौगोलिक परिस्थितियों का गहरा अनुभव था. उनके नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया कि किन भारतीय चौकियों तक सर्दियों में पहुंचा जा सकता है और किन स्थानों पर लंबे समय तक टिके रहना संभव होगा.

पूर्व डीजीएमओ शाहिद अज़ीज़ ने अपनी पुस्तक में लिखा कि यदि उन्हें पहले पूरी जानकारी होती तो वे इस योजना का समर्थन नहीं करते. उनके अनुसार, योजना में कई गंभीर सैन्य कमियां थीं. उन्होंने लिखा कि ऑपरेशन के लिए पर्याप्त रसद, दीर्घकालिक आपूर्ति और राजनीतिक परिणामों का सही आकलन नहीं किया गया था. शाहिद अज़ीज़ ने यहां तक लिखा कि कारगिल अभियान “पाकिस्तान के लिए सैन्य और राजनीतिक दोनों स्तरों पर नुकसानदेह साबित हुआ.”

इसी दौरान पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व और सेना के बीच दूरी भी बढ़ने लगी. पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ लगातार कहते रहे कि उन्हें अभियान की वास्तविक प्रकृति नहीं बताई गई थी. योजना को आगे बढ़ाने के लिए दिसंबर 1998 और जनवरी 1999 के दौरान उत्तरी क्षेत्रों में तैनात Northern Light Infantry (NLI) की इकाइयों को धीरे-धीरे आगे बढ़ाया जाने लगा. आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान लंबे समय तक दावा करता रहा कि कारगिल में लड़ने वाले लोग “कश्मीरी मुजाहिदीन” थे, लेकिन बाद में पाकिस्तान के कई सैन्य अधिकारियों, दस्तावेज़ों और शहीद सैनिकों के रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि NLI के नियमित सैनिक भी अभियान का हिस्सा थे.

फरवरी 1999 तक अधिकांश तैयारियां पूरी हो चुकी थीं. ठीक इसी समय पाकिस्तान और भारत के बीच दोस्ती का माहौल भी बन रहा था. 20 फरवरी 1999 को भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस से लाहौर पहुंचे और 21 फरवरी 1999 को दोनों देशों के बीच लाहौर घोषणा (Lahore Declaration) पर हस्ताक्षर हुए. लेकिन उसी समय कारगिल की सैन्य तैयारियां भी जारी थीं. यही विरोधाभास बाद में कारगिल विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना.

यदि उस समय नागरिक सरकार, सेना और अन्य सैन्य संस्थानों के बीच पूरी पारदर्शिता होती, तो संभव है कि कारगिल जैसी स्थिति पैदा ही न होती. लेकिन गैंग ऑफ फोर ने पूरे अभियान को इतनी गोपनीयता में रखा कि पाकिस्तान के भीतर भी बाद में इस पर तीखी आलोचना हुई.

भाग-3: जब खुलने लगी ‘गैंग ऑफ फोर’ की पोल… इंटरसेप्टेड कॉल, नवाज़ शरीफ का दावा और आखिर कैसे खत्म हुआ चार जनरलों का गुप्त मिशन?
फरवरी 1999 तक कर्गिल की योजना काफी हद तक जमीन पर उतर चुकी थी. पाकिस्तान की सेना की Northern Light Infantry (NLI) की टुकड़ियां धीरे-धीरे नियंत्रण रेखा के भारतीय हिस्से की ऊंची चोटियों पर पहुंच चुकी थीं. इन सैनिकों को स्थानीय लड़ाकों या “मुजाहिदीन” के रूप में पेश करने की रणनीति बनाई गई थी, ताकि दुनिया के सामने पाकिस्तान सीधे तौर पर युद्ध में शामिल न दिखाई दे.

लेकिन जैसे-जैसे हालात बिगड़ने लगे, पाकिस्तान के भीतर ही इस योजना पर सवाल उठने शुरू हो गए. सबसे बड़ा सवाल यह था कि आखिर इतने बड़े सैन्य अभियान की जानकारी पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व, वायुसेना और नौसेना को क्यों नहीं दी गई?

DGMO शाहिद अज़ीज़ का सबसे बड़ा खुलासा
पाकिस्तान सेना के पूर्व Director General Military Operations (DGMO) लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) शाहिद अज़ीज़ की किताब Ye Khamoshi Kahan Tak कर्गिल पर सबसे महत्वपूर्ण अंदरूनी गवाहियों में मानी जाती है. शाहिद अज़ीज़ लिखते हैं कि जब उन्हें अभियान की पूरी जानकारी मिली, तब तक योजना काफी आगे बढ़ चुकी थी. उनके अनुसार, यदि सैन्य मुख्यालय की सामान्य प्रक्रिया अपनाई जाती, तो इस योजना में मौजूद कई कमियों की ओर पहले ही ध्यान दिलाया जा सकता था.

उन्होंने साफ लिखा कि कर्गिल अभियान GHQ (General Headquarters) का संस्थागत निर्णय नहीं था, बल्कि कुछ चुनिंदा अधिकारियों का फैसला था. उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान की सेना के कई वरिष्ठ अधिकारी पूरे ऑपरेशन से पूरी तरह अनजान थे. यही बयान बाद में “Gang of Four” की अवधारणा को सबसे मजबूत आधार देता है.

नवाज़ शरीफ का सबसे बड़ा आरोप
कर्गिल युद्ध समाप्त होने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने कई इंटरव्यू और अपने सार्वजनिक बयानों में कहा कि उन्हें पूरी सैन्य योजना की जानकारी नहीं दी गई थी.

उनका दावा था कि: उन्हें नियंत्रण रेखा पार कर नियमित पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती की पूरी जानकारी नहीं थी. उन्हें यह बताया गया था कि सीमित स्तर पर गतिविधियां चल रही हैं. अभियान के वास्तविक उद्देश्य और उसके संभावित परिणामों से उन्हें अवगत नहीं कराया गया.

इंटरसेप्टेड फोन कॉल ने बदल दी पूरी कहानी
कर्गिल युद्ध के दौरान एक घटना ने पाकिस्तान के आधिकारिक दावे को सबसे बड़ा झटका दिया. उस समय जनरल परवेज़ मुशर्रफ चीन के दौरे पर थे. इसी दौरान उनकी लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद अज़ीज़ खान से हुई टेलीफोन बातचीत को भारत ने इंटरसेप्ट करने का दावा किया.

बाद में भारत सरकार ने इस बातचीत का ट्रांसक्रिप्ट सार्वजनिक किया. इस बातचीत में दोनों अधिकारी कर्गिल क्षेत्र की सैन्य स्थिति, अंतरराष्ट्रीय दबाव और पाकिस्तान की रणनीति पर चर्चा करते सुनाई देते हैं.

भारत ने इसे इस बात का प्रमाण बताया कि कर्गिल अभियान “मुजाहिदीन” का नहीं, बल्कि पाकिस्तान सेना का ऑपरेशन था. पाकिस्तान ने इस रिकॉर्डिंग को लेकर अलग-अलग समय पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दीं, लेकिन इसी घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को आइसोलेट किया.

पाकिस्तान एयर फोर्स क्यों नाराज़ हुई?
कर्गिल के बाद पाकिस्तान के कई पूर्व एयर फोर्स अधिकारियों ने स्वीकार किया कि उन्हें पहले से पूरी जानकारी नहीं थी. यदि वायुसेना को पहले से शामिल किया जाता, तो रसद की बेहतर योजना बन सकती थी. सैन्य जोखिमों का बेहतर आकलन होता. संयुक्त सैन्य रणनीति तैयार की जा सकती थी.

इसी तरह पाकिस्तान नौसेना भी लगभग पूरी तरह इस योजना से बाहर रही. बाद में पाकिस्तान के सैन्य विश्लेषकों ने इसे Joint Planning की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक माना.

गैंग ऑफ फोर की सबसे बड़ी रणनीतिक गलती क्या थी?
कई सैन्य अध्ययनों के अनुसार, इस समूह ने पांच बड़े अनुमान लगाए थे:

  • पहला, भारत सीमित जवाब देगा
  • दूसरा, संघर्ष नियंत्रण रेखा तक ही सीमित रहेगा
  • तीसरा, अंतरराष्ट्रीय समुदाय तुरंत युद्धविराम के लिए दबाव बनाएगा
  • चौथा, कब्जा की गई ऊंची चोटियों पर लंबे समय तक टिके रहना संभव होगा
  • पांचवां, इससे कश्मीर मुद्दा फिर से अंतरराष्ट्रीय एजेंडे पर आ जाएगा

ये सभी अनुमान या तो पूरी तरह गलत साबित हुए

कर्गिल के बाद चारों जनरलों का क्या हुआ?
युद्ध समाप्त होने के बाद पाकिस्तान की राजनीति में भूचाल आ गया. प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ और सेना प्रमुख परवेज़ मुशर्रफ के संबंध लगातार खराब होते गए. 12 अक्टूबर 1999 को नवाज़ शरीफ ने मुशर्रफ को सेना प्रमुख पद से हटाने की कोशिश की. लेकिन सेना ने इसका विरोध किया और उसी दिन पाकिस्तान में सैन्य तख्तापलट हो गया.

जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने सत्ता संभाल ली
इस पूरे घटनाक्रम में लेफ्टिनेंट जनरल महमूद अहमद और लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद अज़ीज़ खान मुशर्रफ के सबसे भरोसेमंद अधिकारियों में गिने गए. दोनों ने तख्तापलट के दौरान अहम भूमिका निभाई. इसके बाद महमूद अहमद को ISI का महानिदेशक (Director General, ISI) बनाया गया, जबकि मोहम्मद अज़ीज़ खान बाद में Chairman Joint Chiefs of Staff Committee बने. मेजर जनरल जावेद हसन भी बाद में लेफ्टिनेंट जनरल बने और पाकिस्तान की सेना में महत्वपूर्ण पदों पर रहे.

(Authentic References)
– Nasim Zehra – From Kargil to the Coup: Events That Shook Pakistan
– Lt Gen (Retd.) Shahid Aziz – Ye Khamoshi Kahan Tak
– Gen Pervez Musharraf – In the Line of Fire
– Hassan Abbas – Pakistan’s Drift into Extremism



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