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Deoghar Babadham Panchshool Story: जहां अधिकतर शिव मंदिरों के शिखर पर त्रिशूल विराजमान होता है वहीं देवघर के बाबा बैद्यनाथ धाम में शिव मंदिर के शिखर पर त्रिशूल नहीं, बल्कि पंचशूल विराजमान है. इसकी कहानी रावण से जुड़ी है. महाशिवरात्रि से पहले इसे उतारकर पूजा की जाती है.
देवघर. देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में एक है बाबा बैद्यनाथ धाम. देवघर की धरती पर विराजमान भगवान भोलेनाथ का यह दरबार अपने आप में कई अनोखी परंपराओं और रहस्यों को समेटे हुए है. आमतौर पर आपने शिव मंदिरों के शिखर पर त्रिशूल देखा होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बाबा बैद्यनाथ मंदिर के शिखर पर भगवान शिव का त्रिशूल नहीं, बल्कि पंचशूल विराजमान है. आखिर इस पंचशूल की क्या कहानी है, इसे मंदिर के ऊपर किसने स्थापित किया था. क्यों महाशिवरात्रि से पहले इसे मंदिर के शिखर से उतारा जाता है और फिर विधि-विधान के साथ दोबारा स्थापित किया जाता है? और सबसे बड़ी बात, पंचशूल के स्पर्श के लिए हर साल हजारों श्रद्धालु क्यों उमड़ पड़ते हैं? इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिए लोकल 18 ने देवघर के तीर्थ पुरोहित प्रमोद श्रृंगारी से खास बातचीत की.
सभी मंदिरों के शिखर के ऊपर पंचशूल विराजमान है
कहानी की शुरुआत बाबा बैद्यनाथ धाम के उस अनोखे रहस्य से होती है, जो इस ज्योतिर्लिंग को दूसरे ज्योतिर्लिंगों से अलग बनाता है. तीर्थ पुरोहित प्रमोद श्रृंगारी बताते हैं कि शास्त्रों में बाबा बैद्यनाथ धाम को पूर्वोत्तर क्षेत्र में विराजमान ज्योतिर्लिंग के रूप में बताया गया है. मान्यता है कि यह एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है, जहां भगवान बैद्यनाथ के साथ मां भगवती भी विराजमान हैं. यही वजह है कि बाबा बैद्यनाथ धाम की पूजा परंपराएं भी अपने आप में बेहद खास मानी जाती हैं. मंदिर परिसर में केवल बाबा बैद्यनाथ का मुख्य मंदिर ही नहीं, बल्कि कुल 22 मंदिर हैं और इन सभी मंदिरों के शिखर पर पंचशूल स्थापित है.
रावण से जुड़ी है पंचशूल की कहानी
अब सवाल यह है कि आखिर भगवान शिव के मंदिर के ऊपर त्रिशूल की जगह पंचशूल क्यों? तीर्थ पुरोहित प्रमोद श्रृंगारी के अनुसार, इसके पीछे पौराणिक मान्यता जुड़ी हुई है. मान्यता है कि लंकापति रावण ने अपने गुरु शुक्राचार्य से पंचवक्त्रम निर्माण की विद्या सीखी थी. इसके बाद रावण ने लंका की सुरक्षा के लिए उसके चारों ओर पंचशूल स्थापित किया था. मान्यता के अनुसार पंचशूल की शक्ति के कारण रावण की ताकत और सुरक्षा कई गुना बढ़ गई थी. इसी पौराणिक कथा के अनुसार रावण ने बाबा बैद्यनाथ मंदिर के शीर्ष पर भी पंचशूल स्थापित किया था, ताकि मंदिर और बाबा बैद्यनाथ की शक्ति को किसी तरह की क्षति न पहुंच सके.
पंचशूल के दर्शन मात्र से ही नष्ट हो जाता है सारा कष्ट
कहा जाता है कि पंचशूल की शक्ति इतनी प्रभावशाली थी कि कोई भी आसानी से इसे नष्ट नहीं कर सकता था. पौराणिक मान्यता के अनुसार जब भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध का समय आया, तब अगस्त्य मुनि ने भगवान श्रीराम को रावण के पंचशूल को ध्वस्त करने की विधि बताई थी. इसी वजह से पंचशूल को लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम में एक अलग ही धार्मिक आस्था देखने को मिलती है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि बाबा मंदिर के शिखर पर विराजमान यह पंचशूल केवल मंदिर की पहचान नहीं, बल्कि बाबा बैद्यनाथ धाम की सुरक्षा और शक्ति का प्रतीक भी है.
महाशिवरात्रि से पहले उतारा जाता है पंचशूल
बाबा मंदिर में पंचशूल को लेकर एक और बेहद खास परंपरा है. हर साल महाशिवरात्रि से कुछ दिन पहले, बाबा बैद्यनाथ मंदिर और परिसर के अन्य मंदिरों के शिखर से पंचशूल को उतारा जाता है. इसके बाद पंचशूल की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है. इस दौरान श्रद्धालुओं के बीच इसे लेकर जबरदस्त उत्साह देखने को मिलता है. जैसे ही पंचशूल को मंदिर के शिखर से नीचे लाया जाता है, उसे स्पर्श करने और उसके दर्शन करने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं. हर किसी की कोशिश होती है कि किसी तरह पंचशूल का स्पर्श हो जाए और बाबा का आशीर्वाद प्राप्त हो.
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Raina Shukla is an experienced journalist and content professional with nearly two decades of experience in print and digital media. She holds a Master’s degree in Mass Communication and Journalism from Bundelk…
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