बोकारो. मानसून के अंत तक मक्के की फसल तेजी से विकसित होने लगती है और खेतों में भुट्टे आने शुरू हो जाते हैं. इस समय फसल पर कई तरह के रोग और कीटों का प्रकोप बढ़ने लगता है, जिससे मक्के की पैदावार और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकती हैं. ऐसे में बोकारो के कृषि एक्सपर्ट और प्रखंड तकनीकी प्रबंधक अजय तिर्की ने मक्के की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग और कीटों की पहचान के साथ-साथ उनसे बचाव के उपाय बताए हैं.
डाउनी मिल्ड्यू रोग से रुक जाती है पौधे की बढ़वार
अजय तिर्की के अनुसार, मक्के की फसल में डाउनी मिल्ड्यू एक प्रमुख रोग है. फसल में यह रोग पौध निकलने के करीब दो से तीन सप्ताह बाद दिखाई दे सकता है. इसकी चपेट में आने पर पत्तियों पर धारियां पड़ने लगती हैं और पौधे की बढ़वार रुक जाती है.
इस रोग की रोकथाम के लिए किसान रिडोमिल एमजेड का 1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव कर सकते हैं. आवश्यकता के अनुसार दो बार छिड़काव करने से फसल को रोग के प्रभाव से बचाने में मदद मिल सकती है.
पत्तियों का झुलसा रोग भी पहुंचाता है नुकसान
मक्के में पत्तियों का झुलसा रोग भी किसानों के लिए चिंता का कारण बन सकता है. इसमें पत्तियों पर लंबे नाव के आकार के भूरे धब्बे बनने लगते हैं. धीरे-धीरे यह रोग ऊपर की पत्तियों तक फैल जाता है और अधिक प्रकोप होने पर पूरा पौधा सूख सकता है.
इस रोग की रोकथाम के लिए जिनेब या जिंक मैंगनीज कार्बोनेट का निर्धारित मात्रा में छिड़काव करने की सलाह दी गई है. इसके अलावा नीम के काढ़े का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. विशेषज्ञ के अनुसार, करीब 250 मिलीलीटर नीम के काढ़े को प्रति पंप पानी में मिलाकर फसल पर अच्छी तरह छिड़काव किया जा सकता है.
मेडिस अंगमारी रोग
मक्के की फसल में फफूंद जनित रोगों का प्रकोप होने पर पत्तियों पर सिलवटी और भूरे रंग के धब्बे दिखाई दे सकते हैं. इन धब्बों के चारों ओर पीले रंग की परत बनने लगती है और धीरे-धीरे पत्तियां सूखने लगती हैं. शुरुआत में ही रोग की पहचान कर नियंत्रण करने पर फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है.
इसके नियंत्रण के लिए रोग दिखाई देते ही 0.2 प्रतिशत यानी 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से मैन्कोजेब का छिड़काव करने की सलाह दी गई है. इसके बाद करीब 10 दिन के अंतराल पर जरूरत के अनुसार एक या दो और छिड़काव किए जा सकते हैं.
इन कीटों से होता है बड़ा नुकसान
रोगों के अलावा मक्के की फसल में कई तरह के कीट भी नुकसान पहुंचाते हैं. इनमें तना छेदक प्रमुख कीट है. यह कीट मक्के के तने में छेद कर अंदर से पौधे को नुकसान पहुंचाता है. शुरुआत में ही इसका प्रकोप होने पर पौधे कमजोर पड़ने लगते हैं और भुट्टे छोटे रह सकते हैं. तेज हवा चलने पर कमजोर पौधे टूटकर गिर भी सकते हैं.
इसके नियंत्रण के लिए फिप्रोनिल 0.3 जी या कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 4 जी का उपयोग करने की सलाह दी गई है. विशेषज्ञ के अनुसार, फसल के अंकुरण के करीब दो सप्ताह बाद दवा का ऊपरी चक्र में प्रयोग किया जा सकता है. आवश्यकता पड़ने पर कारटाप या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल का निर्धारित मात्रा में छिड़काव किया जा सकता है.
फॉल आर्मीवर्म से मक्का को सबसे ज्यादा खतरा
मक्के की फसल में फॉल आर्मीवर्म एक बेहद नुकसानदायक कीट माना जाता है. यह कीट अपने जीवन चक्र में बड़ी संख्या में अंडे दे सकता है. शुरुआती अवस्था में इसके लार्वा हल्के हरे, गुलाबी या भूरे रंग के दिखाई दे सकते हैं. यह कीट मक्के की पत्तियों के किनारे और निचली सतह को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ भुट्टे को भी प्रभावित कर सकता है.
करीब 14 से 18 दिनों में लार्वा विकसित होकर वयस्क कीट में बदल जाते हैं और दोबारा अंडे देकर फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं. फॉल आर्मीवर्म के प्रबंधन के लिए किसान ट्राइकोडर्मा और फेरोमोन ट्रैप का इस्तेमाल कर सकते हैं. फेरोमोन ट्रैप उड़ने वाले वयस्क कीटों को आकर्षित कर फंसाने में मदद करता है, जिससे उनके प्रजनन और अंडे देने की प्रक्रिया को कम करने में सहायता मिलती है.