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सूखी लकड़ियां बेचकर परिवार पाल रहे जमशेदपुर के दिलशान


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Jamshedpur News: जमशेदपुर के कोवाली प्रखंड के कल्याणकोचा गांव के रहने वाले दिलशान जी जंगलों से सूखी लकड़ियां इकट्ठा कर बाजार में बेचते हैं. उन्हें दिनभर की मेहनत के बाद करीब 350 से 400 रुपये की कमाई होती है, जिससे वह अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं.

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जमशेदपुर: झारखंड में आज भी कई आदिवासी समुदायों के लोग जंगलों से मिलने वाले संसाधनों के सहारे अपनी आजीविका चलाते हैं. आधुनिकता के इस दौर में जहां लोग रोजगार के लिए शहरों की ओर रुख कर रहे हैं. वहीं, जमशेदपुर के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले कई परिवार आज भी मेहनत-मजदूरी और जंगलों से मिलने वाली सूखी लकड़ियों को बेचकर अपना जीवन गुजार रहे हैं. सुबह होते ही ये लोग अपनी साइकिल लेकर घने जंगलों की ओर निकल जाते हैं और वहां से सूखी लकड़ियां इकट्ठा कर बाजार में बेचने के लिए लाते हैं.

रोजी-रोटी के लिए करते हैं लकड़ियों का बिजनेस

जमशेदपुर के आसपास के ग्रामीण इलाकों में भी ऐसे कई लोग देखने को मिलते हैं, जिनकी रोजी-रोटी का साधन जंगल है. इसी कड़ी में झारखंड के कोवाली प्रखंड के कल्याणकोचा गांव के रहने वाले दिलशान जी भी शामिल हैं. यहां के दिलशान सुबह करीब 5 बजे ही अपने घर से निकल जाते हैं. इसके बाद वे जंगलों में काफी अंदर तक जाते हैं और वहां से सूखी लकड़ियां इकट्ठा करते हैं. इस काम में उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ती है, क्योंकि जंगलों में जाकर लकड़ियां चुनना और उन्हें उठाकर साइकिल तक लाना आसान नहीं होता है.

लकड़ियां बेचकर चलाते हैं परिवार

दिलशान बताते हैं कि सुबह-सुबह जंगल जाने के बाद सूखी लकड़ियां इकट्ठा करने और उन्हें साइकिल पर लादने में करीब दो से तीन घंटे का समय लग जाता है. इसके बाद वे साइकिल पर लकड़ियां लेकर बाजार पहुंचते हैं, जहां उन्हें बेचकर परिवार के खर्च के लिए पैसे मिलते हैं. उनके मुताबिक, लकड़ियों को करीब दो फीट के टुकड़ों में काटा जाता है, ताकि लोगों को चूल्हे पर खाना बनाने और अन्य घरेलू कामों में जलाने के लिए इन्हें इस्तेमाल करने में आसानी हो.

दिनभर में हो जाती है 400 रुपये की कमाई

दिलशान बताते हैं कि एक साइकिल भर सूखी लकड़ी बेचने पर करीब 350 से 400 रुपये तक मिल जाते हैं. हालांकि, जंगल में इतनी लकड़ियां इकट्ठा करने से लेकर उन्हें काटने और बाजार तक पहुंचाने में काफी मेहनत लगती है. इसके बावजूद आमदनी बहुत अधिक नहीं हो पाती. दिनभर की मेहनत के बाद मिलने वाली यह रकम ही उनके परिवार की जरूरतों को पूरा करने में मदद करती है.

पेट पालने के लिए करते हैं लकड़ियों का बिजनेस

दिलशान का कहना है कि भले ही इस काम में मेहनत ज्यादा है और कमाई सीमित है, लेकिन जंगल और गांव के आसपास रहने वाले लोगों के लिए यह भी आजीविका का एक महत्वपूर्ण साधन है. ग्रामीण जीवन में खर्च भी सीमित होता है, इसलिए वे इसी आमदनी से अपना गुजारा करने की कोशिश करते हैं. उनकी जिंदगी उन लोगों की कहानी बयां करती है, जो हर दिन सुबह से मेहनत शुरू करते हैं और अपने परिवार का पेट पालने के लिए प्रकृति पर निर्भर रहते हैं.

About the Author

Brijendra Pratap Singh

बृजेंद्र प्रताप सिंह डिजिटल-टीवी मीडिया में (2021) लगभग 5 सालों से सक्रिय हैं. मेट्रो न्यूज 24 टीवी चैनल मुंबई, ईटीवी भारत, दैनिक भास्कर के अनुभव के साथ 14 मई 2024 से  Hindi.News18.com<…

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