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हल्दी की खेती किसानों के लिए लाभदायक नकदी फसल साबित हो सकती है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार सही मिट्टी, स्वस्थ बीज, संतुलित उर्वरक, समय पर सिंचाई और वैज्ञानिक खेती अपनाकर किसान बेहतर उत्पादन और अधिक मुनाफा कमा सकते हैं. साथ ही प्रसंस्करण और पैकेजिंग पर ध्यान देकर हल्दी का बेहतर बाजार मूल्य भी प्राप्त किया जा सकता है.
हल्दी सिर्फ भारतीय रसोई का अहम मसाला ही नहीं बल्कि औषधीय गुणों से भरपूर एक ऐसी नकदी फसल भी है, जिसकी मांग पूरे साल बनी रहती है. मसाले, आयुर्वेद, कॉस्मेटिक और खाद्य उद्योग में बढ़ते इस्तेमाल के कारण इसकी खेती किसानों के लिए मुनाफे का अच्छा विकल्प बन रही है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसान सही किस्म का चयन संतुलित पोषण और समय पर देखभाल करें तो हल्दी की खेती से बेहतर उत्पादन के साथ अच्छी आमदनी भी हासिल की जा सकती है.
दरअसल रायबरेली जिले के राजकीय कृषि केंद्र शिवगढ़ के प्रभारी अधिकारी शिव शंकर वर्मा (बीएससी एग्रीकल्चर डॉक्टर राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद)लोकल 18 से बात करते हुए बताते हैं कि हल्दी की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है. इसकी अच्छी पैदावार के लिए 20 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान अनुकूल रहता है. दोमट या बलुई दोमट मिट्टी, जिसमें पानी निकासी की अच्छी व्यवस्था हो हल्दी की खेती के लिए सबसे बेहतर रहती है. खेत की मिट्टी का पीएच मान 5.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए.
बुवाई से पहले खेत की 2 से 3 बार गहरी जुताई करनी चाहिए. इसके बाद खेत में 20 से 25 टन प्रति हेक्टेयर अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पौधों का विकास बेहतर होता है. खेत को समतल कर मेड़ और नालियां बना लेने से जल निकासी आसान रहती है.
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हल्दी की बुवाई के लिए स्वस्थ और रोगमुक्त गांठों का चयन करना बेहद जरूरी है। सामान्यतः 25 से 30 ग्राम वजन वाली गांठें बीज के रूप में सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं. बुवाई से पहले बीजों का फफूंदनाशक या जैविक उपचार करने से रोगों का खतरा काफी कम हो जाता है. उत्तर भारत में इसकी बुवाई मई से जून के बीच, जबकि मानसून शुरू होने के समय करना सबसे अच्छा माना जाता है.
शिव शंकर वर्मा के मुताबिक पौधों के बीच लगभग 30 सेंटीमीटर और कतारों के बीच 45 सेंटीमीटर की दूरी रखने से पौधों को पर्याप्त पोषण और धूप मिलती है. बुवाई के बाद खेत में नमी बनाए रखना जरूरी है. बारिश कम होने पर समय-समय पर सिंचाई करनी चाहिए, लेकिन खेत में पानी जमा नहीं होने देना चाहिए, क्योंकि इससे गांठें सड़ सकती है.
हल्दी की अच्छी पैदावार के लिए खरपतवार नियंत्रण भी जरूरी है. समय-समय पर निराई-गुड़ाई करने से पौधों का विकास तेजी से होता है. साथ ही कृषि विशेषज्ञ मिट्टी चढ़ाने की सलाह भी देते है. जिससे गांठों का आकार अच्छा बनता है. संतुलित मात्रा में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का प्रयोग करने से उत्पादन में बढ़ोतरी होती है.
हल्दी की फसल सामान्यतः 7 से 9 महीने में तैयार हो जाती है. जब पौधों की पत्तियां पीली होकर सूखने लगें, तब खुदाई का समय आ जाता है. खुदाई के बाद गांठों को अच्छी तरह साफ कर उबालने और सुखाने की प्रक्रिया अपनाई जाती है. इसके बाद तैयार हल्दी को बाजार में बेचा जा सकता है या पाउडर बनाकर अधिक मूल्य प्राप्त किया जा सकता है.
शिव शंकर वर्मा बताते हैं कि वैज्ञानिक तरीके से हल्दी की खेती करने पर किसान बेहतर गुणवत्ता का उत्पादन हासिल कर सकते है. यदि खेती के साथ प्रसंस्करण और पैकेजिंग पर भी ध्यान दिया जाए तो हल्दी किसानों की आय बढ़ाने वाली एक लाभदायक फसल साबित हो सकती है.