भारतन्यूज़ – टॉप हेडर
News Menu Bar

ताज़ा खबर

ताज़ा खबर

‘सिर तन से जुदा’ को लेकर ऐसे भड़के लोग, दंगों की आग...

होमदुनियायूरोप सिर तन से जुदा पर दंगों से झुलसा बेलफास्‍ट, नहीं देखना चाहते मुस्लिम, क्‍यों? Last Updated:June 10, 2026, 21:04 IST Belfast Violence Explainer: उत्तरी आयरलैंड के बेलफास्ट में भड़की हिंसा को केवल एक दर्दनाक वारदात से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है. इसके पीछे वर्षों से जमा सामाजिक असुरक्षा, तेजी से बदलती जनसांख्यिकी, शरणार्थी मुस्लिमों को लेकर बढ़ती नाराजगी, संसाधनों पर दबाव और कमजोर पड़ती कानून-व्यवस्था जैसी कई कारण हैं. स्थानीय समुदायों में अपने इलाकों पर नियंत्रण खोने का डर बढ़ रहा है, जबकि सोशल मीडिया पर कुछ समूह इस माहौल को और भड़का रहे हैं. नार्थ आयरलैंड की राजधानी बेलफास्‍ट में अब दंगे बेकाबू हो चले हैं. Belfast Violence Explainer: आयरलैंड की राजधानी बेलफास्ट में 8 जून 2026 की रात दर्दनाक वारदात के बाद से पूरा शहर दंगे की आग में धधक रहा है. दरअसल, एक अपार्टमेंट के बाहर एक बुजुर्ग व्‍यक्ति पर एक शख्‍स ने चाकू से अंधाधुंध वार करना शुरू कर दिया. बुजुर्ग व्‍यक्ति के सिर, गर्दन और पीठ पर चाकू से कई वार किए गए. मौके से गुजर रहे कुछ लोगों ने हमलावर को काबू कर बुजुर्ग व्‍यक्ति को बचाने की कोशिश की. इसी बीच स्‍थानीय पुलिस भी मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने 30 साल के इस हमलावर को गिरफ्तार कर लिया. वहीं, इस पूरी वारदात का सीसीटीवी फुटेज अगले कुछ घंटों में पूरे बेलफास्‍ट में वायरल हो गया. साथ ही, लोगों को यह भी पता लग गया कि हमलावर सूडान मूल का एक शरणार्थी है. हमलावर की पहचान पता चलते ही स्‍थानीय लोगों के दिल में सालों से धधकती आग आक्रोश बनकर बाहर आने लगे. देखते ही देखते बेलफास्‍ट की तमाम इलाके दंगों की आग में धधकने लगे. 9 जून की शाम होते-होते उत्तरी आयरलैंड की राजधानी बेलफास्ट की सड़कों पर नकाबपोश युवकों की भारी भीड़ उतर आई. इन नकाबपोशों ने ग्लाइडर बसों और सड़क से गुजरती कारों को आग में झोंकना शुरू कर दिया. ये दंगे यही तक सीमित नहीं रहे, बल्कि बेलफास्‍ट में रहने वाले शरणार्थी मुस्मिल समुदाय की घरों और दुकानों को भी निशाना बनाया जाने लगा. देर रात तक पूरे शहर में हाहाकार मच चुका था. कानून और व्‍यवस्‍था लगभग पूरी तरह से पुलिस के कंट्रोल से बाहर जा चुकी थी. सतही तौर पर देखने पर भले ही यह मामला एक दर्दनाक वारदात से जुड़ा हुआ लगता है. लेकिन, इसकी सतह पर जाएं तो चाकूबाजी इस वारदात ने स्‍थानीय नागरिकों के लिए ट्रिगर का काम किया है. ‘सिर तन से जुदा’ के नारा देने वाले मुस्मिल शरणार्थियों को लेकर लोगों का गुस्‍सा तो बेलफास्ट की गलियों में पिछले कई सालों से जमा हो रहा था. लेकिन इस वारदात के बाद ऐसा लगा जैसे उनके सब्र का बांध अब टूट चुका है. नतीजा, पूरी दुनिया बेलफास्‍ट के दंगों के तौर पर देख रहा है. इंटरनेशनल रिपोर्ट की मानें तो बेलफास्‍ट के हालत कुछ ऐसे हैं कि वहां के स्‍थानीय निवासी अब एक भी प्रवासी मुसलमान को अपनी शहर में नहीं देखना चाह रहे हैं. बेलफास्‍ट इलाके में नकाबपोश दंगाई शरणार्थी इलाकों की दुकानों, मकानों के साथ कारों और बसों को भी आग के हवाले कर रहे हैं. कैसे फैला बेलफास्‍ट में खास समुदाय के खिलाफ दंगा इस पूरी हिंसा की क्रोनोलॉजी को समझने के लिए सबसे पहले सोमवार रात की उस घटना और उसके बाद के डिजिटल नैरेटिव को देखना होगा. जैसे ही पुलिस ने आरोपी को हिरासत में लिया, इस वारदात से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल होने लगा. कुछ ही घंटों में ब्रिटेन और आयरलैंड के इन्फ्लुएंसर्स और बॉट्स ने इस वीडियो को लपक लिया. इस वीडियो में साफ तौर एक एक ही संदेश दिया जा रहा था कि एक बाहरी शख्‍स ने हमारे देश में आकर हमारे नागरिक की जान लेने की कोशिश की है. इस डिजिटल मोबिलाइजेशन का नतीजा यह हुआ कि मंगलवार शाम को उत्तरी, पूर्वी और पश्चिमी बेलफास्ट के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. देखते ही देखते ये प्रदर्शन हिंसक दंगों में बदल गए. कामकाजी वर्ग की आबादी वाले शंकील रोड जैसे इलाकों में नकाबपोश दंगाइयों ने चुन-चुनकर मुस्लिम प्रवासी परिवारों के घरों को निशाना बनाया. एक अफ्रीकी फूड स्टोर और एक तुर्की नाई की दुकान को फूंक दिया गया. यह साफ दिखाता है कि गुस्सा किसी अपराधी के खिलाफ नहीं, बल्कि एक पूरी कम्युनिटी और पहचान के खिलाफ मोड़ दिया गया था. यहां पर है बेलफास्‍ट में फैले दंगो की असली जड़ उत्तरी आयरलैंड और उसकी राजधानी बेलफास्ट का इतिहास भी बहुत कुछ अच्‍छा नहीं है. यहां पर दशकों से दो समुदायों के बीच हिंसक संघर्ष का इतिहास रहा है. इन दो समुदायों में एक है प्रोटेस्टेंट और दूसरा है कैथोलिक. प्रोटेस्‍टेंट यूके के साथ रहना चाहते हैं और कैथोलिक आयरलैंड के साथ जाना चाहते हैं. इस संघर्ष के चलते बेलफास्ट कभी भी लंदन, बर्मिंघम या डबलिन की तरह मल्‍टी कल्‍चरल शहर नहीं बन पाया. कुछ साल पहले तक यहां पर प्रवासियों की संख्‍या ना के बराबर थी. लेकिन पिछले पांच-छह सालों में हालात तेजी से बदले हैं. ब्रिटेन की शरणार्थी नीति और रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड के साथ खुली सीमा का फायदा उठाकर हजारों की संख्या मे मध्य-पूर्व और अफ्रीका से आए मुस्लिम शरणार्थियों को उत्तरी आयरलैंड पहुंचा दिया. यूके होम ऑफिस ने इन शरणार्थियों को ठहराने के लिए बेलफास्ट और उसके आस-पास के कामकाजी वर्ग के इलाकों के होटलों और हॉस्टलों का इस्तेमाल किया. यूके होम ऑफिस के इस कदम से स्थानीय नागरिकों का मन असुरक्षा से भर गया. स्थानीय लोगों के भीतर यह भावना बैठ गई है कि सरकार उनसे बिना पूछे उनके छोटे और सीमित संसाधनों वाले शहर में सैकड़ों अनजान लोगों को बसा रही है.इसकी वजह से सोशल हाउसिंग, हेल्‍थ सर्विसेज और स्थानीय स्कूलों पर दबाव बढ़ रहा है, जिससे खुद उनके बच्चों का हक मारा जा रहा है. उत्‍तरी आयरलैंड को मूल नागरिक खुद को अपने ही देश में अजनबी महसूस करने लगे हैं. उन्‍हें लगा कि वे अपने ही इलाके पर कंट्रोल खो रहे हैं. ऐसे में एक चिंगारी ने बड़े विस्‍फोट का काम किया और उसका नतीजा बेलफास्‍ट के दंगों के तौर पर सबके सामने हैं. बेलफास्‍ट की सड़कों पर हो रहा विरोध प्रदर्शन अब किसी घटना को लेकर

ताज़ा खबर

pm modi 12 Historic Decisions | Article 370 Abrogation | Ram Mandir...

नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने बीते 12 वर्षों में कई ऐसे फैसले लिए, जिन्होंने भारत की राजनीति, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये निर्णय आने वाली पीढ़ियों तक याद रखे जाएंगे. जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने से लेकर राम मंदिर निर्माण, जीएसटी, तीन तलाक कानून, नई शिक्षा नीति, डिजिटल इंडिया, महिला आरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कदमों तक, मोदी सरकार ने कई बड़े निर्णय लिए. इनमें कुछ फैसले ऐसे रहे जिन्होंने दशकों पुरानी व्यवस्थाओं को बदल दिया, जबकि कुछ ने भारत की वैश्विक छवि और रणनीतिक स्थिति को मजबूत किया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी प्रधानमंत्री की विरासत केवल चुनावी जीत से नहीं, बल्कि उन फैसलों से तय होती है जो देश की दिशा बदल देते हैं. हालांकि इन फैसलों के प्रभाव और परिणामों पर बहस जारी रहेगी, लेकिन इतना तय है कि 2014 के बाद के भारत के इतिहास को लिखते समय इन निर्णयों का उल्लेख प्रमुखता से किया जाएगा. देखें पीएम मोदी के 12 अहम फैसले- 1. जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना (2019) 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर दिया. इसे स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े संवैधानिक फैसलों में गिना जाता है. 2. राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करना सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और 2024 में प्राण प्रतिष्ठा आधुनिक भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक-धार्मिक घटनाओं में से एक मानी जाती है. 3. तीन तलाक कानून मुस्लिम महिलाओं को तत्काल तीन तलाक से संरक्षण देने के लिए कानून बनाया गया. सरकार ने इसे महिला अधिकारों की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया. 4. वस्तु एवं सेवा कर (GST) पूरे देश को “एक राष्ट्र, एक कर” व्यवस्था में लाने का प्रयास किया गया. इसे स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा कर सुधार माना जाता है. 5. नोटबंदी (2016) 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने का फैसला भारतीय आर्थिक इतिहास के सबसे चर्चित और विवादित निर्णयों में शामिल है. 6. नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लागू करना पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान में धार्मिक प्रताड़ना का शिकार होकर भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने के लिए सीएए कानून बनाकर लागू करना मानवीय दृष्टिकोण से एक ऐतिहासिक फैसला था. 7. नई शिक्षा नीति (NEP 2020) करीब 34 साल बाद शिक्षा नीति में व्यापक बदलाव किया गया. स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक नई संरचना लागू की गई. 8. कोविड-19 वैक्सीन अभियान भारत ने दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियानों में से एक चलाया और करोड़ों लोगों को वैक्सीन उपलब्ध कराई. 9. डिजिटल इंडिया और UPI क्रांति डिजिटल भुगतान व्यवस्था ने भारत को दुनिया की सबसे बड़ी रियल-टाइम पेमेंट अर्थव्यवस्थाओं में ला खड़ा किया. 10. नया संसद भवन और ‘कर्तव्य पथ’ का निर्माण गुलामी के प्रतीकों को पीछे छोड़ते हुए मोदी सरकार ने रिकॉर्ड समय में देश को नया, अत्याधुनिक ‘संसद भवन’ सौंपा. राजपथ का नाम बदलकर ‘कर्तव्य पथ’ करना और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति दिलाना इस कालखंड की बड़ी उपलब्धि रही. 11. ऑपरेशन सिंदूर और नई सुरक्षा नीति (2025) पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ भारत की नई सैन्य और कूटनीतिक नीति को सरकार ने निर्णायक कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया. 12. भारतीय न्याय संहिता (BNS): कानूनों का स्वदेशीकरण अंग्रेजों के जमाने के 150 साल से भी पुराने आईपीसी (IPC) और सीआरपीसी (CrPC) को बदलकर ‘भारतीय न्याय संहिता’ लागू करना, ताकि देश की न्याय व्यवस्था ‘दंड’ देने के बजाय ‘न्याय’ देने की अवधारणा पर काम कर सके. इसके अलावा भी कई फैसले लिए गए जैसे, सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक-आतंकवाद के खिलाफ भारत की आक्रामक रणनीति का प्रदर्शन माना गया. इससे राष्ट्रीय सुरक्षा की राजनीति में बड़ा बदलाव आया. पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना जिसने देश के 80 करोड़ से अधिक जरूरतमंदों को हर महीने मुफ्त राशन की गारंटी देना. साथ ही आयुष्मान भारत योजना, जिसके तहत 60 करोड़ से अधिक गरीबों को 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज देना, जिसने वैश्विक स्तर पर कल्याणकारी योजनाओं की परिभाषा बदल दी. Source link

ताज़ा खबर

PM Narendra Modi Legacy | Modi becomes longest serving elected PM |...

होमताजा खबरदेश PM मोदी 8 साल और रहेंगे देश के प्रधानमंत्री! यकीन नहीं, तो ये आंकड़ा देख लें Last Updated:June 10, 2026, 19:22 IST PM Narendra Modi Legacy: पीएम मोदी देश के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना लिया है. बुधवार को दिल्ली के भारत मंडपम में एनडीए नेताओं के जुटान हुआ. एक-एक कर एनडीए नेताओं ने पीएम मोदी के इस उपल्बधि पर सम्मानति किया. पीएम मोदी के ऐतिहासिक सम्मान के बीच देश की राजनीति में सबसे बड़ा उलटफेर भी हो गया है. बंगाल विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत और संसद में टीएमसी के 20 से ज्यादा सांसदों की बगावत के बाद बीजेपी केंद्र की सत्ता अगले 8 साल के लिए एक तरह से फिक्स कर ली है. जानिए 2029 के लोकसभा चुनाव में किंगमेकर कैसे बेअसर हो जाएंगे. पीएम मोदी और कितने साल तक देश के प्रधानमंत्री रह सकते हैं? PM Narendra Modi Legacy- देश की राजधानी में स्थित भारत मंडपम बुधवार को एक ऐतिहासिक पल का गवाह बन गया. दिल्ली में एनडीए के तमाम दिग्गज नेताओं का महाजुटान हुआ. इस भव्य समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने का पंडित जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ने पर विशेष रूप से सम्मानित किया गया. लेकिन इस जश्न और सम्मान के शोर के बीच, भारत मंडपम के गलियारों से देश की राजनीति को अगले 8 सालों के लिए पूरी तरह बदलने वाली एक इनसाइड स्टोरी भी निकल कर बाहर आई. बेशक, बीजेपी अपने साथी दलों का सम्मान करती है, लेकिन लोकसभा चुनाव 2029 की कहानी 2026 में ही साफ हो गई. जानिए बीजेपी ने कैसे पीएम मोदी को अगले आठ साल तक और प्रधानमंत्री रहने का रास्ता साफ कर दिया है. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत और उसके बाद संसद में हुए भारी उलटफेर ने केंद्र सरकार का पूरा समीकरण बदल दिया है. राजनीतिक विश्लेषकों का साफ मानना है कि बंगाल जीतकर भारतीय जनता पार्टी ने कम से कम अगले 8 साल के लिए केंद्र की सत्ता को पूरी तरह सुरक्षित और फिक्स कर लिया है. इस नए गणित का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला पहलू यह है कि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बैसाखी वाली सरकार चलाने के लिए न तो नीतीश कुमार की जरूरत बची है और न ही चंद्रबाबू नायडू की. टीएमसी के 20 सांसदों के आने से बदल गया लोकसभा का गेम संसद के भीतर इस वक्त सबसे बड़ा भूचाल आया हुआ है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की करारी हार के बाद, दिल्ली में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 से ज्यादा लोकसभा सांसदों ने डॉ. काकोली घोष दस्तिदार के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया है. बंगाल की जीत केवल एक राज्य की सत्ता का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह 2029 और उसके आगे के लोकसभा चुनावों का ब्लूप्रिंट है. नीतीश-नायडू का ‘किंगमेकर’ टैग खत्म टीएमसी के तकरीबन 20 बागी सांसदों ने टीएमसी से नाता तोड़कर संसद में एक अलग गुट बना लिया है और बिना शर्त नरेंद्र मोदी सरकार को अपना समर्थन घोषित कर दिया है. अब तक केंद्र की एनडीए सरकार नीतीश कुमार की जेडीयू की 12 सीटें और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी की 16 सीटें के समर्थन के भरोसे टिकी हुई थी, जिससे इन्हें ‘किंगमेकर’ कहा जा रहा था. लेकिन बंगाल से आए तकरीबन 20 सांसदों के समर्थन के बाद भाजपा का अपना संख्या बल और एनडीए का आंकड़ा बहुमत के जादुई आंकड़े से बहुत आगे निकल गया है. अब यदि नीतीश या नायडू कोई दबाव बनाने की कोशिश भी करते हैं, तो सरकार की स्थिरता पर कोई आंच नहीं आने वाली. अगले 8 साल के लिए सत्ता कैसे हो गई सुरक्षित? राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बंगाल की जीत केवल एक राज्य की सत्ता का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह 2029 और उसके आगे के लोकसभा चुनावों का ब्लूप्रिंट है. वर्तमान में बंगाल विधानसभा सीटों पर भाजपा के प्रचंड प्रदर्शन को अगर लोकसभा वार देखा जाए, तो आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा अकेले दम पर पश्चिम बंगाल की 42 सीटों में से कम से कम 35 सीटें जीतने की स्थिति में आ चुकी है. अब यूपी या अन्य हिंदी बेल्ट में कुछ सीटों के नुकसान की भरपाई भाजपा अकेले पश्चिम बंगाल से कर सकती है. बंगाल की यह बढ़त भाजपा को बैसाखियों से मुक्त कर अपने दम पर 300 से अधिक सीटों के आंकड़े की ओर ले जा रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आत्मविश्वास बंगाल जीत के बाद बढ़ गया. भारत मंडपम में बदला हुआ बॉडी लैंग्वेज यही कारण है कि बुधवार को भारत मंडपम में जब एनडीए के नेता जुटे, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आत्मविश्वास देखने लायक था. जहां पहले सहयोगियों को साधने की एक कूटनीतिक मजबूरी दिखती थी, वहीं अब बंगाल की जीत ने भाजपा को ड्राइविंग सीट पर ला दिया है. राजनीतिक जानकारों की मानें तो राजनीति में अंकगणित ही सब कुछ होता है. बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों और टीएमसी सांसदों के एनडीए खेमे में आने के बाद नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू की मोलभाव करने की शक्ति पूरी तरह समाप्त हो चुकी है. पीएम मोदी अब बिना किसी क्षेत्रीय दबाव के अपने बड़े और कड़े फैसले ले सकेंगे. यह जीत 2034 तक के सियासी परिदृश्य को तय कर चुकी है. जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड तोड़कर इतिहास रचने वाले पीएम मोदी अब एक ऐसी मजबूत पिच पर खेल रहे हैं, जहां विपक्ष तो बिखरा हुआ है ही, साथ ही गठबंधन के भीतर की शर्तें भी अब खुद प्रधानमंत्री तय करेंगे. बंगाल की एक जीत ने दिल्ली सल्तनत के समीकरणों को हमेशा के लिए बदल दिया है. About the Author रविशंकर सिंहChief Reporter I am an alumnus of Bharatiya Vidya Bhavan, Delhi with a career in journalism that spans across several prestigious newsrooms. Over the years, I have honed my craft at Sahara Samay, Tehelka, P7 and Live India, a…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Source link

ताज़ा खबर

यूसुफ पठान, शत्रुघ्न सिन्हा और… आ गई TMC के बागी सांसदों की...

अब तक कयास लगाए जा रहे थे क‍ि ममता का साथ क‍ितने सांसद छोड़ने वाले हैं. कोई 10 कह रहा था तो कोई 20… लेकिन अब 19 सांसदों की ल‍िस्‍ट सामने आ गई है. इसमें काकोली घोष दस्‍तीदार के साथ यूसुफ पठान, शत्रुघ्न सिन्हा समेत कई चौंकाने वाले नाम हैं. गौर करने वाली बात है क‍ि इसमें अभी भी सयानी घोष जैसे कई नाम नहीं हैं, ज‍िनकी अटकलें लगाई जा रही थीं. 1. यूसुफ पठान (बहरामपुर)क्रिकेटर से नेता बने यूसुफ पठान ने कांग्रेस के गढ़ बहरामपुर में अधीर रंजन चौधरी को हराकर बड़ा उलटफेर किया था. लेकिन राजनीति की पिच पर यूसुफ को दीदी के लोकल नेताओं से वैसी मदद नहीं मिल रही थी, जैसी उम्मीद थी. बहरामपुर के स्थानीय संगठन से उनकी दूरी अब खुलकर सामने आ रही है. 2. जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया (कूचबिहार)कूचबिहार की सीट हमेशा से उत्तर बंगाल की राजनीति का केंद्र रही है. जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया यहां टीएमसी के मजबूत राजबंशी चेहरा माने जाते हैं. लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और स्थानीय गुटबाजी के कारण उनके सुर बदले हुए नजर आ रहे हैं. क्षेत्र में अपनी पकड़ के बावजूद संगठन से अनबन की खबरें हैं. 3. खलीलुर रहमान (जंगीपुर)मुर्शिदाबाद जिले के जंगीपुर से आने वाले खलीलुर रहमान बीड़ी कारोबारी से राजनेता बने हैं. मुस्लिम बहुल इस इलाके में उनका अच्छा-खासा प्रभाव है. हालांकि, केंद्रीय एजेंसियों की जांच के दायरे में आने और स्थानीय लीडरशिप से तालमेल की कमी के चलते उनके टीएमसी से दूर जाने की चर्चाएं तेज हैं. 4. अबू ताहेर खान (मुर्शिदाबाद)मुर्शिदाबाद के कद्दावर नेता अबू ताहेर खान का इस लिस्ट में होना चौंकाता है. कांग्रेस से टीएमसी में आए अबू ताहेर का क्षेत्र में मजबूत जनाधार है. पिछले कुछ समय से जिला स्तर पर हो रही उपेक्षा और नए नेताओं को तरजीह दिए जाने से वह काफी नाराज बताए जा रहे हैं. 5. पार्थ भौमिक (बैरकपुर)बैरकपुर जैसी हाई-प्रोफाइल और हिंसा प्रभावित सीट से जीतने वाले पार्थ भौमिक ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाते थे. लेकिन अर्जुन सिंह के साथ चलने वाली अंदरूनी खींचतान और पार्टी के भीतर गुटीय समीकरणों के बदलने से पार्थ भौमिक का मोहभंग होता दिख रहा है, जिससे बगावती सुर उठे हैं. 6. काकोली घोष दस्तीदार (बारासात)डॉ. काकोली घोष दस्तीदार टीएमसी की बेहद सीनियर और तेजतर्रार नेता हैं. संसद में अपनी बात मजबूती से रखने वाली काकोली के बारे में कहा जा रहा है कि वह पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और युवा ब्रिगेड के फैसलों से असहज महसूस कर रही हैं, जिससे दूरियां बढ़ी हैं. 7. बापी हलदार (मथुरापुर)मथुरापुर (SC) सीट से चुनकर आए बापी हलदार जमीनी स्तर के नेता हैं. दक्षिण 24 परगना के सुंदरबन इलाके में उनकी मजबूत पकड़ है. स्थानीय पंचायत चुनावों और विकास कार्यों के फंड को लेकर जिला नेतृत्व के साथ उनकी अनबन अब बगावत के मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है. 8. सायोनी घोष (जादवपुर)टीएमसी की युवा विंग की अध्यक्ष रहीं सायोनी घोष हमेशा से ममता बनर्जी की फेवरेट रही हैं. जादवपुर जैसी प्रतिष्ठित सीट से जीतकर संसद पहुंचने वाली सायोनी की बगावत की खबरें हैरान करने वाली हैं. बताया जा रहा है कि संगठनात्मक फेरबदल और कुछ आंतरिक फैसलों से वह खुश नहीं हैं. 9. माला रॉय (कोलकाता दक्षिण)कोलकाता दक्षिण सीट खुद ममता बनर्जी का पुराना गढ़ रही है, जहां से माला रॉय सांसद हैं. माला रॉय का नाम इस लिस्ट में आना टीएमसी के लिए सबसे बड़ा झटका है. कोलकाता नगर निगम और सांसद फंड के इस्तेमाल को लेकर पार्टी आलाकमान से उनके मतभेद गहरे हो चुके हैं. 10. मिताली बाग (आरामबाग)आरामबाग की बेहद करीबी मुकाबले वाली सीट से जीत दर्ज करने वाली मिताली बाग एक साधारण पृष्ठभूमि से आती हैं. लेकिन सांसद बनने के बाद स्थानीय स्तर पर पार्टी के पुराने क्षत्रपों ने उन्हें काम नहीं करने दिया. इसी आंतरिक कलह और उपेक्षा के कारण मिताली ने अपने रास्ते अलग करने का मन बनाया है. 11. देव अधिकारी (घाटाल)बांग्ला सिनेमा के सुपरस्टार दीपक अधिकारी उर्फ देव के बागी तेवर नए नहीं हैं. वह पहले भी राजनीति छोड़ने की इच्छा जता चुके थे. ममता के मनाने पर वह माने तो थे, लेकिन घाटाल के स्थानीय टीएमसी नेताओं के भ्रष्टाचार और दखलअंदाजी से तंग आकर अब वह आर-पार के मूड में हैं. 12. कालीपद सोरेन (झाड़ग्राम)आदिवासी बहुल झाड़ग्राम सीट से सांसद कालीपद सोरेन संथाली साहित्यकार और प्रतिष्ठित चेहरा हैं. टीएमसी ने इन्हें आदिवासी कार्ड के तौर पर उतारा था. लेकिन क्षेत्र में आदिवासियों की बुनियादी समस्याओं पर पार्टी के ढुलमुल रवैए और वादों से मुकरने के कारण कालीपद सोरेन ने बगावती रुख अख्तियार कर लिया है. 13. जून मालिया (मेदिनीपुर)मेदिनीपुर से सांसद और मशहूर अभिनेत्री जून मालिया को टीएमसी का ग्लैमरस लेकिन गंभीर चेहरा माना जाता है. विधानसभा के बाद लोकसभा तक का सफर तय करने वाली जून मालिया के बारे में खबर है कि वह जिला टीएमसी कमेटी के लगातार बढ़ते हस्तक्षेप और दबाव से बेहद परेशान हैं. 14. अरूप चक्रवर्ती (बांकुड़ा)बांकुड़ा से सांसद अरूप चक्रवर्ती अपने बेबाक और कई बार विवादित बयानों के लिए जाने जाते हैं. बीजेपी के मजबूत गढ़ बांकुड़ा को भेदने वाले अरूप चक्रवर्ती इन दिनों पार्टी के बड़े नेताओं के रवैए से नाराज हैं. उनका मानना है कि जीतने के बाद भी उन्हें वह सम्मान नहीं मिला. 15. शर्मिला सरकार (बर्धमान पूर्व)पेशे से डॉक्टर शर्मिला सरकार को टीएमसी ने बर्धमान पूर्व की सुरक्षित सीट से मैदान में उतारा था. राजनीति में नई शर्मिला को उम्मीद थी कि उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने का मौका मिलेगा, लेकिन पार्टी के लोकल ‘सिंडिकेट’ और नेताओं के दबाव के कारण वह खुद को घुटा हुआ महसूस कर रही थीं. 16. शत्रुघ्न सिन्हा (आसनसोल)‘बिहारी बाबू’ शत्रुघ्न सिन्हा ने आसंसोल उपचुनाव और फिर आम चुनाव में टीएमसी को बड़ी जीत दिलाई. लेकिन हमेशा अपनी शर्तों पर राजनीति करने वाले शॉटगन को टीएमसी का कड़ा अनुशासन और केवल बंगाल केंद्रित राजनीति रास नहीं आ रही है. राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका न देखकर उनके तेवर तल्ख हैं. 17. असित कुमार माल (बोलपुर)बीरभूम जिले की बोलपुर सीट से सांसद असित कुमार माल अनुब्रत मंडल के दौर से ही पार्टी का वफादार चेहरा रहे हैं. लेकिन अनुब्रत मंडल के जेल जाने और आने के बाद बदले समीकरणों

ताज़ा खबर

हूबहू आवाज, वही अंदाज! पाली के विकल्प मेहता ने अक्षय कुमार की...

Last Updated:June 10, 2026, 17:16 IST Bollywood Mimicry Artist: राजस्थान के पाली जिले के रहने वाले विकल्प मेहता आज अपनी शानदार मिमिक्री कला के कारण देशभर में पहचाने जाते हैं. उनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार की आवाज, बोलने का अंदाज और एक्सप्रेशन को हूबहू पेश कर लेते हैं. शुरुआत में यह केवल एक शौक था, लेकिन सोशल मीडिया और स्टेज परफॉर्मेंस ने उनकी प्रतिभा को नई पहचान दिलाई. लोगों ने जब उनकी मिमिक्री सुनी, तो कई बार उन्हें असली अक्षय कुमार की आवाज समझ बैठे. धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई और उन्हें विभिन्न शो, इवेंट्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अवसर मिलने लगे. विकल्प मेहता की कहानी यह साबित करती है कि छोटे शहरों में छिपी प्रतिभा अगर सही मंच पा जाए तो वह राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकती है. ख़बरें फटाफट पाली. दोस्तों, क्या आपने कभी सोचा है कि अगर असली अक्षय कुमार के सामने उनका कोई हमशक्ल आ जाए तो क्या होगा? कुछ ऐसा ही कमाल कर दिखाया है पाली के विकल्प मेहता ने! विकल्प मेहता सिर्फ मिमिक्री नहीं करते, वो मंच पर आते ही ‘अक्षय कुमार’ बन जाते हैं. वही चाल-ढाल, वही आवाज और वही गजब की कॉमिक टाइमिंग! सोशल मीडिया पर इनके वीडियोज इस कदर वायरल हैं कि लोग इन्हें ‘अक्षय कुमार का दूसरा रूप’ कहने लगे हैं. कपिल शर्मा शो से लेकर बड़े-बड़े इंटरनेशनल शोज़ में पाली का नाम रोशन करने वाले विकल्प की कहानी बेहद दिलचस्प है. विकल्प मेहता आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. वे केवल अक्षय कुमार की मिमिक्री नहीं करते, बल्कि जब वे मंच पर आते हैं, तो साक्षात ‘खिलाड़ी कुमार’ का अक्स नजर आने लगता है. वही बेबाक हंसी, वही चलने का अंदाज, वही कड़क आवाज और वो बेजोड़ कॉमिक टाइमिंग, जिसे देख पूरी फिल्म इंडस्ट्री भी दांतों तले उंगली दबा लेती है. पाली में जन्म और शुरुआती सफरविकल्प मेहता का जन्म 30 मई 1989 को राजस्थान के पाली जिले में एक संभ्रांत जैन परिवार में हुआ. उनके पिता एक सरकारी कर्मचारी थे. पाली की गलियों में पले-बढ़े विकल्प का बचपन आम बच्चों की तरह ही बीता, लेकिन उनके भीतर एक अनोखा कलाकार छुपा हुआ था. वे बचपन से ही फिल्मी कलाकारों की आवाजें निकालकर अपने दोस्तों और परिवार को हंसाया करते थे. पाली से हरियाणा और फिर सपनों की नगरी मुंबईविकल्प मेहता की शुरुआती स्कूली पढ़ाई राजस्थान में ही हुई. इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए हरियाणा चले गए, जहां उन्होंने कॉमर्स में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की.ग्रेजुएशन के बाद, साल 2010 में उन्होंने अपने सपनों को पूरा करने के लिए मायानगरी मुंबई का रुख किया. मुंबई में उन्होंने ‘इवेंट मैनेजमेंट’ की पढ़ाई शुरू की, ताकि वे एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की बारीकियों को समझ सकें. हालांकि, उनका असली मकसद एक्टिंग और मिमिक्री की दुनिया में अपनी पहचान बनाना था. साल 2008 का वो मोड़ और अक्षय कुमार से पहली मुलाकातसाल 2008 के आसपास विकल्प को पहली बार अहसास हुआ कि उनका चेहरा, कद-काठी और आवाज बॉलीवुड सुपरस्टार अक्षय कुमार से काफी हद तक मेल खाती है. उन्होंने इसे सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं माना, बल्कि इस पर कड़ी मेहनत शुरू कर दी. उन्होंने अक्षय कुमार के हाव-भाव और उनके बोलने के तरीके को बारीकी से समझा. विकल्प मेहता को टीवी शो ‘कॉमेडी सर्कस’ में पहली बार बड़ा ब्रेक मिला. इस शो में खुद अक्षय कुमार बतौर गेस्ट आए हुए थे. जब विकल्प ने असली खिलाड़ी के सामने अपनी परफॉर्मेंस दी, तो अक्षय कुमार खुद हैरान रह गए. अक्षय कुमार ने मुस्कुराते हुए विकल्प से कहा था— “तुम ही असली अक्षय कुमार हो.” यह शब्द विकल्प के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बन गए. कपिल शर्मा शो से लेकर सलमान खान को चौंकाने तक का सफरबस फिर क्या था कि उसके बाद विकल्प मेहता ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. साल 2015 में उनकी एंट्री देश के सबसे बड़े कॉमेडी मंच ‘द कपिल शर्मा शो’ में हुई. इसके अलावा वे ‘इंडियाज गॉट टैलेंट’, ‘एंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करेगा’ और ‘कॉमेडी नाइट्स विद कपिल’ जैसे देश के सबसे बड़े शोज़ का हिस्सा बने. मंच पर जब वे ‘राउडी राठौर’ या ‘हेरा फेरी’ के राजू के अंदाज में डायलॉग बोलते हैं, तो दर्शकों को यकीन नहीं होता कि ये असली अक्षय नहीं हैं. एक बार जब वे शो के दौरान सुपरस्टार सलमान खान से मिले, तो सलमान ने भी उनकी तारीफ करते हुए कहा था— “ऐसा लगता है जैसे मैं अपने सामने असली अक्षय को खड़ा देख रहा हूं.” About the Author Jagriti Dubey Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Source link

ताज़ा खबर

भारतीय सेना में शामिल होंगी 300 नई K9 Vajra तोपें, कई गुना...

भारतीय सेना की तोपखाना (आर्टिलरी) क्षमता में बड़ा इजाफा होने की संभावना है. सरकार 300 से अधिक K9 Vajra-T स्वचालित ट्रैक्ड तोपों (Self-Propelled Tracked Artillery Guns) की खरीद के प्रस्ताव को आगे बढ़ा सकती है. इस सौदे की अनुमानित लागत करीब 23,000 करोड़ रुपये हो सकता है, जिससे यह हाल के वर्षों में सेना के लिए प्रस्तावित सबसे बड़े तोपखाना सौदों में से एक बन जाएगा. सूत्रों के अनुसार, इस प्रस्ताव को इसी सप्ताह मंजूरी के लिए रक्षा खरीद बोर्ड (Defence Procurement Board) के सामने रखा जा सकता है. K9 Vajra-T बढ़ाएगी मारक क्षमताK9 Vajra-T एक 155 मिमी/52 कैलिबर की स्वचालित ट्रैक्ड तोप है. इसे दक्षिण कोरिया की Hanwha Aerospace ने डिजाइन किया है और भारत में इसका निर्माण Larsen & Toubro (L&T) करती है. यह तोप 40 किलोमीटर से अधिक दूरी तक हमला कर सकती है और अपनी तेज फायरिंग क्षमता, सटीकता तथा विभिन्न प्रकार के इलाकों में काम करने की क्षमता के लिए जानी जाती है. सेना के अधिकारियों का कहना है कि शामिल किए जाने के बाद से इस प्रणाली का प्रदर्शन उत्साहजनक रहा है. पहली खेप में 100 तोपों का ऑर्डर 2017 में लगभग 4,500 करोड़ रुपये में दिया गया था. इनकी आपूर्ति 2021 में तय समय से पहले पूरी कर ली गई थी. दिसंबर 2024 में रक्षा मंत्रालय ने 100 अतिरिक्त K9 Vajra-T तोपों के लिए L&T के साथ 7,628.70 करोड़ रुपये का एक और अनुबंध किया था. इससे रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के भारत के प्रयासों को मजबूती मिलेगी. Hanwha Aerospace की K9 वज्र स्वचालित तोप पश्चिमी सीमा से लद्दाख तकK9 Vajra-T को शुरुआत में भारत-पाकिस्तान सीमा पर तैनात किया गया था. लेकिन मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन सैन्य टकराव के बाद इन्हें ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भेजा गया. इस प्लेटफॉर्म ने शून्य से नीचे के तापमान में भी प्रभावी ढंग से काम करने की क्षमता दिखाई है, जिससे यह कठिन पर्वतीय इलाकों के लिए उपयुक्त साबित हुई है. तेजी से चल रहा है तोपखाना आधुनिकीकरणयह खरीद भारतीय सेना के व्यापक आर्टिलरी आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा है. सेना की दीर्घकालिक “मीडियमाइजेशन” योजना के तहत 2042 तक 155 मिमी तोपों को मानक तोपखाना कैलिबर बनाने का लक्ष्य रखा गया है. सेना ने 2027, 2042 और 2047 को ध्यान में रखते हुए आने वाले दशकों के लिए आधुनिकीकरण की योजनाएं तैयार की हैं. युद्धक्षेत्र में अहम भूमिकारेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी, जिसकी स्थापना 28 सितंबर 1827 को हुई थी, भारतीय सेना की पैदल सेना (Infantry) के बाद दूसरी सबसे बड़ी शाखा मानी जाती है. वर्तमान में सेना के पास 105 मिमी, 122 मिमी और 155 मिमी की विभिन्न तोपें हैं. इनमें कई 105 मिमी इंडियन फील्ड गन और इंडियन लाइट गन आज भी सेवा में हैं, जिनका उपयोग 1970, 1980 के दशक से किया जा रहा है. आर्टिलरी शाखा में तोपें, रॉकेट, मिसाइलें और मानव रहित हवाई वाहन (UAVs) शामिल हैं. इसका मुख्य काम दुश्मन की स्थिति को नष्ट करना, उसकी फायरिंग को दबाना, महत्वपूर्ण लक्ष्यों पर हमला करना और सैन्य अभियानों के दौरान पैदल सेना तथा बख्तरबंद इकाइयों को सहायता देना है. कहा जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध में तोपखाने (आर्टिलरी) ने जीत में निर्णायक भूमिका निभाई थी, इसलिए इसे अक्सर “युद्ध का देवता” भी कहा जाता है. भारतीय सेना के लिए भी आर्टिलरी की अहमियत 1999 के कारगिल युद्ध (ऑपरेशन विजय) में साफ दिखाई दी थी. इस संघर्ष के दौरान भारतीय तोपखाने ने 2.5 लाख से अधिक गोले, बम और रॉकेट दागे थे. युद्ध के चरम पर प्रतिदिन लगभग 5,000 गोले दागे जा रहे थे, जिन्होंने दुश्मन की ऊंची पहाड़ियों पर बने मजबूत बंकरों और चौकियों को निशाना बनाया. ऑपरेशन विजय की सफलता में भारतीय आर्टिलरी, विशेषकर Bofors FH-77B तोपों की भूमिका को सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक माना जाता है. लंबी दूरी तक सटीक हमला करने की क्षमता, उच्च गतिशीलता और आधुनिक तकनीक के कारण K9 Vajra-T भारतीय सेना की परिचालन तैयारियों को मजबूत करने और हर प्रकार के भूभाग में गहरे तथा सटीक प्रहार करने की क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. Source link

ताज़ा खबर

क्या आपने चखी सब्जी से बनने वाली यह अनोखी मिठाई? स्वाद ऐसा...

Last Updated:June 10, 2026, 15:22 IST Rajasthan Sweet Dish: राजस्थान के करौली जिले की एक खास पारंपरिक मिठाई इन दिनों लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है. यह मिठाई एक विशेष सब्जी से तैयार की जाती है और इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह लगभग एक महीने तक खराब नहीं होती. स्वादिष्ट होने के साथ-साथ यह शरीर को ठंडक पहुंचाने का काम भी करती है, इसलिए गर्मी के मौसम में इसकी मांग बढ़ जाती है. इस मिठाई को तैयार करने में करौली के मुस्लिम कारीगरों की अहम भूमिका होती है, जो वर्षों से अपनी पारंपरिक कला और अनुभव के जरिए इसे विशेष स्वाद और गुणवत्ता प्रदान कर रहे हैं. स्थानीय स्तर पर यह मिठाई न केवल लोगों की पसंद बनी हुई है, बल्कि करौली की सांस्कृतिक और खाद्य विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है. ख़बरें फटाफट करौली. आगरा के मशहूर पेठे का नाम तो आपने सुना होगा, लेकिन करौली के बूरा-बताशा बाजार में तैयार होने वाला पेठा भी अपनी अलग पहचान रखता है. करीब 50 वर्षों से यहां पारंपरिक तरीके से पेठा बनाया जा रहा है. खास बात यह है कि यह मिठाई एक विशेष प्रकार के कद्दू (पेठा सब्जी) से तैयार की जाती है और लंबे समय तक खराब नहीं होती. स्थानीय लोगों के बीच इसकी काफी मांग रहती है. पेठा बनाने वाले अनुभवी कारीगर जब्बार भाई बताते हैं कि इस मिठाई की तासीर ठंडी होती है. गर्मियों के मौसम में इसका सेवन शरीर को ठंडक पहुंचाने का काम करता है. उनका कहना है कि यदि सुबह खाली पेट सीमित मात्रा में इसका सेवन किया जाए तो पेट संबंधी कई समस्याओं में राहत मिल सकती है. सामान्यतः यह मिठाई गर्मियों में 20 से 25 दिनों तक सुरक्षित रहती है, जबकि सर्दियों में एक महीने तक खराब नहीं होती. हालांकि बरसात के मौसम में नमी अधिक होने के कारण इसके जल्दी खराब होने की संभावना रहती है. गांवों में सबसे अधिक पसंदजब्बार भाई के अनुसार पेठे की सबसे अधिक मांग ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले ग्राहकों में देखने को मिलती है. करौली के बूरा-बताशा बाजार में रोजाना लगभग 40 से 50 किलो पेठे की बिक्री हो जाती है. स्वाद के साथ-साथ इसकी कीमत भी लोगों को आकर्षित करती है. वर्तमान में यह मिठाई 70 से 80 रुपये प्रति किलो के भाव से बिक रही है, जिससे यह आम लोगों की पहुंच में बनी हुई है. शुद्धता है इसकी सबसे बड़ी पहचानइस पारंपरिक मिठाई की एक और विशेषता इसकी शुद्धता है. इसे तैयार करने में केवल पेठा कद्दू और चीनी की चाशनी का उपयोग किया जाता है. इसमें किसी प्रकार के कृत्रिम रंग या अतिरिक्त सामग्री का प्रयोग नहीं किया जाता. हालांकि इसे बनाने की प्रक्रिया काफी मेहनत और समय मांगती है. ऐसे तैयार होता है पेठाजब्बार भाई बताते हैं कि सबसे पहले पेठा कद्दू का छिलका हटाकर उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है. इसके बाद इन टुकड़ों को चूने के पानी में धोकर तैयार किया जाता है, जिससे उनमें आवश्यक कठोरता आती है. फिर इन्हें अच्छी तरह गोदकर चीनी की चाशनी में उबाला जाता है. पर्याप्त समय तक पकाने के बाद इन्हें जमने के लिए रखा जाता है. इसके बाद स्वादिष्ट और पारंपरिक पेठा तैयार होकर बाजार में बिक्री के लिए पहुंच जाता है. About the Author Jagriti Dubey Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Karauli,Rajasthan Source link

ताज़ा खबर

राहुल गांधी संग अभिषेक बनर्जी की डेढ़ घंटे सीक्रेट मीटिंग, कुंद होगी...

होमताजा खबरदेश राहुल संग अभिषेक की डेढ़ घंटे सीक्रेट मीटिंग, कुंद होगी TMC में बगावत की धार! Last Updated:June 10, 2026, 14:23 IST कांग्रेस नेता राहुल गांधी और टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी की डेढ़ घंटे तक चली मुलाकात में इंडिया गठबंधन, बंगाल में कांग्रेस TMC तालमेल और TMC की अंदरूनी बगावत पर चर्चा होने की खबर है. इस बीच माना जा रहा है कि इस मीटिंग में टीएमसी के भीतर बगावत को थामने की रणनीति पर भी बातचीत हुई. टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने राुहल गांधी से मुलाकात की है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर मचे घमासान ने सियासी तापमान बढ़ा रखा है. इसी बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी और तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के बीच करीब डेढ़ घंटे तक चली मुलाकात ने नई अटकलों को जन्म दिया है. सूत्रों के मुताबिक दोनों नेताओं के बीच पश्चिम बंगाल की राजनीति, इंडिया गठबंधन की भविष्य की रणनीति और आगामी चुनावों में विपक्षी एकता को मजबूत करने पर विस्तार से चर्चा हुई. लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस मुलाकात को सिर्फ इंडिया ब्लॉक की बैठक तक सीमित नहीं देखा जा रहा. इसकी टाइमिंग भी काफी अहम मानी जा रही है, क्योंकि यह बैठक ऐसे समय हुई है जब तृणमूल कांग्रेस अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट में से एक का सामना कर रही है. डेढ़ घंटे तक क्या हुई चर्चा? सूत्रों के अनुसार राहुल गांधी और अभिषेक बनर्जी के बीच पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के संबंधों को लेकर गंभीर बातचीत हुई. दोनों नेताओं ने इस बात पर भी चर्चा की कि भविष्य में दोनों दल भाजपा के खिलाफ किस तरह की रणनीति अपना सकते हैं. बताया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में होने वाले संभावित उपचुनावों में तालमेल या सहयोग की संभावनाओं पर भी विचार-विमर्श हुआ. इंडिया गठबंधन को मजबूत करने और विपक्षी दलों के बीच बेहतर समन्वय बनाने का मुद्दा भी बातचीत के केंद्र में रहा. सूत्रों का दावा है कि पूरी बैठक सकारात्मक माहौल में हुई और दोनों नेताओं के बीच संवाद काफी बेहतर रहा. क्या TMC की अंदरूनी बगावत भी रही एजेंडे में? इस मुलाकात का सबसे दिलचस्प पहलू यही माना जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक अभिषेक बनर्जी ने राहुल गांधी को तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहे ताजा घटनाक्रम की भी जानकारी दी. पार्टी पिछले कुछ दिनों से लगातार झटके झेल रही है. राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय पार्टी छोड़ चुके हैं. इसके बाद सुष्मिता देव के इस्तीफे की खबरों ने भी राजनीतिक हलचल बढ़ा दी. वहीं पार्टी के भीतर असंतुष्ट नेताओं का एक समूह लगातार चर्चा में है. कुछ रिपोर्टों में जादवपुर सांसद सायोनी घोष के भी असंतुष्ट खेमे के संपर्क में होने की बात सामने आई है, हालांकि इन दावों पर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं है. ऐसे में माना जा रहा है कि अभिषेक ने राहुल गांधी के सामने पार्टी की मौजूदा चुनौतियों और राजनीतिक हालात का अपना पक्ष रखा. सोनिया गांधी से बढ़ा संवाद दिलचस्प बात यह है कि हाल के दिनों में कांग्रेस और तृणमूल नेतृत्व के बीच संवाद बढ़ता दिखाई दिया है. दिल्ली दौरे के दौरान अभिषेक बनर्जी की मुलाकात कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी हुई थी. इससे पहले तृणमूल प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी सोनिया गांधी से मुलाकात कर चुकी हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये मुलाकातें सिर्फ शिष्टाचार भेंट नहीं हैं. इन बैठकों को विपक्षी एकता के व्यापक प्रयासों और इंडिया गठबंधन के भीतर संबंधों को मजबूत करने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है. बंगाल की राजनीति में बदलते समीकरण पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के रिश्ते हमेशा उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं. राष्ट्रीय स्तर पर दोनों दल इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन राज्य की राजनीति में वे अक्सर एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते रहे हैं. ऐसे में राहुल गांधी और अभिषेक बनर्जी की लंबी बैठक को भविष्य के राजनीतिक समीकरणों के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है. विशेष रूप से तब जब भाजपा लगातार बंगाल में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है. ममता के लिए क्यों अहम है यह संवाद? तृणमूल कांग्रेस इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रही है. एक तरफ पार्टी के भीतर असंतोष और बगावत की खबरें हैं. दूसरी तरफ विपक्षी राजनीति में अपनी केंद्रीय भूमिका बनाए रखने की चुनौती भी है. ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व के साथ बेहतर संवाद ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी दोनों के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकता है. यह न सिर्फ इंडिया गठबंधन में उनकी भूमिका को मजबूत करेगा, बल्कि पार्टी के भीतर उठ रहे सवालों के बीच एक व्यापक राजनीतिक संदेश भी देगा. क्या बगावत की धार कुंद करने की कोशिश? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस मुलाकात का एक बड़ा संदेश पार्टी के अंदर भी गया है. जब शीर्ष विपक्षी नेता एक साथ दिखाई देते हैं और रणनीतिक स्तर पर संवाद बढ़ाते हैं, तो इससे कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच स्थिरता का संदेश जाता है. यही वजह है कि राहुल गांधी और अभिषेक बनर्जी की यह डेढ़ घंटे की मुलाकात केवल एक राजनीतिक बैठक नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के मौजूदा संकट के बीच शक्ति प्रदर्शन और भरोसा बहाली की कवायद के रूप में भी देखी जा रही है. आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि इस बातचीत का असर सिर्फ इंडिया गठबंधन तक सीमित रहता है या फिर बंगाल की राजनीति और तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही उठापटक पर भी दिखाई देता है. About the Author संतोष कुमार न्यूज18 हिंदी में बतौर एसोसिएट एडिटर कार्यरत. मीडिया में करीब दो दशक का अनुभव. दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आईएएनएस, बीबीसी, अमर उजाला, जी समूह सहित कई अन्य संस्थानों में कार्य करने का मौका मिला. माखनलाल यूनिवर्स…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Source link

ताज़ा खबर

तीसरी पास महिला किसान बनी मिसाल, 5 एकड़ में ऑर्गेनिक खेती से...

होमवीडियोकृषि तीसरी पास महिला किसान बनी मिसाल, 5 एकड़ में ऑर्गेनिक खेती से कमा रही लाखों X तीसरी पास महिला किसान बनी मिसाल, 5 एकड़ में ऑर्गेनिक खेती से कमा रही लाखों   बुरहानपुर जिले में किसान अक्सर नवाचार करते जाते हैं आज हम आपको मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के आलमगंज क्षेत्र में रहने वाली 60 वर्षीय महिला किसान की कहानी बता रहे हैं. 10 वर्षों से ऑर्गेनिक खेती कर लाखों रुपए की कमाई कर रही है. Source link

ताज़ा खबर

पंडित नेहरू से पीएम मोदी तक… रिकॉर्ड से आगे बड़ी कहानी, भारतीय...

यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर ऐसा क्या है जो उन्हें उनके पूर्ववर्तियों से अलग बनाता है. लेकिन इस सवाल का जवाब केवल चुनावी जीत, लोकप्रियता या संगठनात्मक ताकत में नहीं छिपा है. असल कहानी भारतीय राजनीति की शैली की तब्दीली में है, जिसने संसदीय लोकतंत्र के भीतर एक तरह “विशेष शैली” की राजनीति को जन्म दिया. दरअसल, जवाहर लाल नेहरू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच की दूरी सिर्फ कालखंडों की नहीं है, यह भारतीय राजनीति के दो अलग-अलग युगों के बीच की दूरी है. नेहरू के बाद इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह जैसे बड़े नेता आए, लेकिन कोई भी नेहरू और मोदी जैसी दीर्घकालिक राजनीतिक केंद्रीयता स्थापित नहीं कर सका. सवाल यह कि जवाहर लाल नेहरू के बाद पीएम मोदी ही क्यों ऐसा कर पाए? जब चुनाव सांसद नहीं, प्रधानमंत्री चुनने का माध्यम बन गए इस संदर्भ में एक दिलचस्प तथ्य सामने आता है. दरअसल, भारतीय संविधान ने देश को संसदीय लोकतंत्र दिया. सिद्धांत यह है कि जनता सांसद चुनती है और सांसद प्रधानमंत्री चुनते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल के दौरान पिछले एक दशक में चुनावी व्यवहार का एक नया पैटर्न सामने आया है. मतदाता कई बार स्थानीय उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दों और यहां तक कि राज्य सरकार के प्रदर्शन से ऊपर उठकर राष्ट्रीय नेतृत्व के आधार पर मतदान करता दिखाई देते हैं. इसकी शुरुआत तो वर्ष 2014 में ही हो चुकी थी जब संसदीय चुनाव का स्वरूप ही भाजपा बनाम कांग्रेस कम और मोदी बनाम व्यवस्था ज्यादा हो गया था. इसके बाद आया 2019 का चुनाव, जब उम्मीदवारों का नहीं, “मजबूत नेतृत्व” का चुनाव बन गया. वर्ष 2024 में भी भाजपा के चुनाव अभियान का सबसे बड़ा चेहरा पीएम मोदी ही रहे. यहीं से भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है. संसदीय ढांचे के भीतर चुनाव का चरित्र राष्ट्रपति प्रणाली जैसा होने लगा, जहां पूरा चुनाव एक व्यक्ति की स्वीकार्यता और नेतृत्व क्षमता पर केंद्रित हो जाता है. जवाहर लाल नेहरू का रिकॉर्ड और पीएम नरेंद्र मोदी का दौर. क्या बदल गई है भारत में चुनाव लड़ने और जीतने की पूरी शैली? हालांकि इसका अर्थ यह कतई नहीं कि स्थानीय उम्मीदवारों या क्षेत्रीय मुद्दों का महत्व समाप्त हो गया. कई राज्यों में विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों के नतीजों ने दिखाया कि स्थानीय समीकरण अब भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं. फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व-केंद्रित प्रचार की प्रवृत्ति पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट दिखाई देती है. रिकॉर्ड से बड़ी कहानी पीएम मोदी के लंबे कार्यकाल की कहानी केवल चुनावी जीतों की कहानी नहीं है. यह उस राजनीतिक परिवर्तन की कहानी भी है जिसमें प्रधानमंत्री का पद पहले की तुलना में कहीं अधिक केंद्रीय और प्रभावशाली दिखाई देता है. भारत में मतदाता सांसद चुनते हैं, सांसद प्रधानमंत्री चुनते हैं, लेकिन पिछले तीन लोकसभा चुनावों में चुनावी विमर्श का बड़ा हिस्सा सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व, नेतृत्व और फैसलों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा. स्पष्ट है कि यह स्थिति भारतीय संसदीय राजनीति के पारंपरिक ढांचे से कुछ अलग दिखाई देती है. यही कारण है कि दोनों नेताओं की तुलना केवल कार्यकाल की अवधि से नहीं की जा सकती. दोनों अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों में उभरे और अलग राजनीतिक वातावरण में काम किया. जनता पर ‘जादू’ करते हैं पीएम मोदी! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शैली की एक प्रमुख विशेषता जनता से सीधे संवाद पर जोर देना रही है. अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने पारंपरिक सरकारी संचार के साथ-साथ, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, वीडियो संदेश, वर्चुअल कार्यक्रमों और देशभर में नियमित जनसभाओं का व्यापक उपयोग किया. सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से प्रत्यक्ष संवाद और डिजिटल माध्यमों के जरिए लगातार संपर्क बनाए रखने की रणनीति ने उनकी सार्वजनिक पहुंच को और मजबूत किया. हालांकि भारत के पूर्व प्रधानमंत्रियों ने भी रेडियो, टेलीविजन और जनसभाओं के माध्यम से लोगों तक पहुंच बनाई थी, लेकिन डिजिटल तकनीक और सोशल मीडिया के इतने व्यापक और निरंतर इस्तेमाल के कारण पीएम मोदी का जनसंपर्क मॉडल अलग दिखाई देता है. सिर्फ 12 साल का कार्यकाल नहीं, पीएम नरेंद्र मोदी के लंबे कार्यकाल के पीछे छिपी भारतीय राजनीति की बड़ी कहानी संसदीय व्यवस्था, लेकिन केंद्रीकृत राजनीति राजनीति के जानकारों का मानना है कि मोदी ने चुनावी राजनीति को “केंद्रीकृत शैली” का स्वरूप दिया है. इसका अर्थ यह नहीं कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था बदल गई है, बल्कि यह कि चुनावों में मतदाता अक्सर स्थानीय उम्मीदवार की बजाय राष्ट्रीय नेतृत्व को ध्यान में रखकर मतदान करते दिखाई देते हैं.कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने स्थानीय नेतृत्व से अधिक पीएम मोदी के चेहरे को प्रमुखता दी. इससे प्रधानमंत्री का पद केवल सरकार के मुखिया का पद नहीं रहा, बल्कि चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया. नेहरू, इंदिरा और मोदी- तीन बड़े व्यक्तित्व हालांकि, भारतीय राजनीति में व्यक्तित्व आधारित राजनीति नई नहीं है. जवाहर लाल नेहरू के दौर में कांग्रेस और नेहरू लगभग एक-दूसरे के पर्याय बन गए थे. बाद में इंदिरा गांधी ने भी अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान को पार्टी से ऊपर स्थापित किया. “गरीबी हटाओ” अभियान से लेकर 1971 के चुनाव तक इसका प्रभाव स्पष्ट दिखा. लेकिन मोदी युग की विशेषता यह है कि यह दौर 24 घंटे चलने वाले मीडिया, सोशल मीडिया, डिजिटल संचार और प्रत्यक्ष जनसंपर्क के समय में विकसित हुआ. “मन की बात”, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, विशाल चुनावी रैलियां और लगातार जनसंवाद ने प्रधानमंत्री की छवि को पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक बनाया. पार्टी से सबसे बड़ा चेहरा मोदी युग की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक यह है कि भाजपा के चुनावी अभियान का केंद्र अक्सर संगठन नहीं, बल्कि नेतृत्व दिखाई देता है. भाजपा स्वयं एक मजबूत संगठन है, लेकिन चुनावी प्रचार में मोदी की लोकप्रियता उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी रही है. इसका असर विपक्षी राजनीति पर भी पड़ा. कई चुनावों में विपक्ष का अभियान भाजपा के खिलाफ कम और मोदी के खिलाफ ज्यादा दिखाई दिया. इससे चुनावी मुकाबला कई बार पार्टी बनाम पार्टी की बजाय नेता बनाम नेता का रूप लेने लगा. जवाहर लाल नेहरू से पीएम नरेंद्र मोदी तक… कैसे बदली भारतीय राजनीति और क्यों नेतृत्व बन गया चुनाव का सबसे बड़ा चेहरा क्या बदल गई है चुनाव की प्रकृति? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के

Scroll to Top