गिरिडीह जिले में स्थित तीर्थराज श्री सम्मेद शिखर जैन धर्म का सर्वोच्च सिद्धक्षेत्र माना जाता है। जहां 24 में से 20 तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया है। इसी पावन भूमि पर अब ‘गुणायतन’ नामक भव्य परिसर साकार हो रहा है।
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यह जैन दर्शन, अध्यात्म और आधुनिक तकनीक का अद्वितीय संगम बनने की दिशा में अग्रसर है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य भगवान महावीर के अहिंसा, अनेकांत और आत्मकल्याण के संदेश को डिजिटल माध्यमों के जरिए नई पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना है।

इस विशाल आध्यात्मिक परियोजना ‘गुणायतन’ का निर्माण वर्ष 2014 में शुरू हुआ था। इसे 2027 के अंत तक पूर्ण करने का लक्ष्य रखा गया है।
आधुनिक तकनीक से जीवंत होगा जैन दर्शन
गुणायतन परिसर में जैन दर्शन में वर्णित आत्मा की शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति की यात्रा को बताया जाएगा। इसे चतुर्दश गुणस्थान कहा जाता है। इसे अत्याधुनिक तकनीकों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाएगा। डिजिटल प्रोजेक्शन, प्रकाश-ध्वनि प्रभाव, रोबोटिक तकनीक और थ्री-डी व फोर-डी अनुभवों के जरिए श्रद्धालु इसे जीवंत रूप में महसूस कर सकेंगे।
यहां आने वाले श्रद्धालु और शोधार्थी कर्म सिद्धांत, छह द्रव्य, नौ तत्व, समवसरण और सिद्धशिला जैसे गूढ़ विषयों को करीब से समझ और अनुभव कर पाएंगे। साथ ही, यहां विश्व की सबसे लंबी आध्यात्मिक स्लो राइड का निर्माण भी किया जा रहा है, जो मनोरंजन के बजाय ज्ञान और आत्मबोध का माध्यम बनेगी।
साल 2014 में हुआ शुरू, 2027 तक होगा पूरा
इस विशाल आध्यात्मिक परियोजना का निर्माण वर्ष 2014 में शुरू हुआ था। इसे 2027 के अंत तक पूर्ण करने का लक्ष्य रखा गया है। परिसर में भव्य जिनालय, ध्यान केंद्र और आधुनिक ज्ञान केंद्र का निर्माण भी तेजी से जारी है।
इस परियोजना को राष्ट्रसंत मुनि प्रमाण सागर जी महाराज के मार्गदर्शन में आकार दिया जा रहा है। वर्तमान में मुनि श्री अपने संघ सहित गुणायतन परिसर में विराजमान हैं। जिससे इस स्थान की आध्यात्मिक गरिमा और भी बढ़ गई है।

इस पुण्य क्षेत्र में जैन धर्म के 24 में से 20 तीर्थंकरों ने मोक्ष की प्राप्ति की। यहां पर 23वें तीर्थकर भगवान पार्श्वनाथ ने भी निर्वाण प्राप्त किया था।
अष्टान्हिका महापर्व पर होगी विशेष आराधना
चातुर्मास 2026 के प्रारंभ से पूर्व अष्टान्हिका महापर्व के अवसर पर 21 जुलाई से 29 जुलाई तक गुणायतन परिसर में विशेष आराधना का आयोजन किया जाएगा। मुनि श्री के सान्निध्य में होने वाले इस आयोजन में संस्कृत भाषा के बीजाक्षरों के उच्चारण के साथ सिद्धों की आराधना संपन्न होगी। देश-विदेश से हजारों श्रद्धालुओं के इसमें शामिल होने की संभावना है।
29 जुलाई को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर चातुर्मास कलश स्थापना की जाएगी, साथ ही मुनि संधान सागर महाराज का 12वां दीक्षा दिवस भी श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा। वर्तमान में मुनि प्रमाण सागर जी के साथ मुनि संधान सागर, मुनि सार सागर, मुनि समादर सागर और मुनि रूप सागर महाराज ससंघ यहां विराजमान हैं।

सम्मेद शिखरजी में है क्या?
झारखंड की राजधानी रांची से 165KM दूर गिरिडीह जिले के मधुबन में यह पारसनाथ पहाड़ पर स्थित है। यह झारखंड का सबसे ऊंचा पहाड़ है। इसकी ऊंचाई 9.6 किलोमीटर है। पवित्र पर्वत के शिखर तक श्रद्धालु पैदल या डोली से जाते हैं। सम्मेद शिखरजी की यात्रा की शुरुआत पहाड़ की तलहटी में स्थित शिखर जी पॉइंट से होती है।
लगभग डेढ़ किमी की चढ़ाई के बाद सबसे पहले कली कुंड मंदिर आता है। यह श्वेतांबर समाज का मंदिर है। यहां 23 भगवानों के अलग-अलग मंदिर बनाए गए हैं। इसमें से 20 तीर्थंकरों के वे मंदिर भी हैं, जो पहाड़ के शिखर पर स्थित हैं। ऐसी मान्यता है कि बुजुर्ग या बीमार, जो सम्मेद शिखरजी की यात्रा पूरी करने में असमर्थ होते हैं वे यहां अपनी वंदना करते हैं।

कली कुंड के बाद सीधी चढ़ाई शुरू होती है। तलहटी से लगभग 8 किलोमीटर की चढ़ाई के बाद चोपड़ा कुंड मंदिर आता है। यह दिगंबर समाज के लिए पहला पड़ाव है। यहां से 1 KM की चढ़ाई के बाद तीर्थंकरों के टोंक यानी उनके मंदिर आने लगते हैं। पहाड़ी पर लगभग नौ किलोमीटर क्षेत्र में 20 तीर्थंकरों के टोंक हैं। इस यात्रा को वंदना पथ कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि जहां-जहां ये टोंक हैं, वहां तीर्थंकरों ने निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया।
इन टोंक की वंदना के लिए श्रद्धालु आते हैं। टोंकों तक जाने के लिए पथरीले और उतार-चढ़ाव वाले रास्ते हैं। हर टोंक अलग-अलग दूरी पर स्थित हैं। सबसे दूर और शिखर पर स्थित है पार्श्व नाथ टोंक। यहां दर्शन के बाद यात्री सीधे नीचे उतर जाते हैं। यह सीधा नौ किलोमीटर का ढलान है। इस तरह कुल 27 किलोमीटर की यह यात्रा 8 से 10 घंटे में पूरी होती है।

क्यों सम्मेद शिखरजी जैन समाज का सर्वोच्च तीर्थ स्थल है
1. जैन समाज के 24 में से 20 तीर्थंकरों ने यहां से निर्वाण की प्राप्ति की है
सम्मेद शिखरजी पर जैन धर्म के 24 में से 20 तीर्थंकरों ने निर्वाण (मोक्ष) की प्राप्ति की है। सबसे पहले दूसरे तीर्थंकर अजीत नाथ ने यहां निर्वाण की प्राप्ति की। इसके बाद चौथे तीर्थंकर अभिनंदन जी से लेकर 21वें तीर्थंकर नमीनाथ जी ने निर्वाण प्राप्त किया। फिर 23वें तीर्थंकर पारस नाथ यहां से मोक्ष प्राप्त किए हैं। इन 20 तीर्थंकर के अलावा भी जैन समाज के कई महान आत्माओं ने यहां से मोक्ष की प्राप्ति की है। इसलिए पारस नाथ को शिरोमणि तीर्थस्थल भी कहा जाता है।
2. हर जैन अपने जीवन में एक बार यहां आकर वंदना करना चाहता है
सम्मेद शिखर के पार्श्वनाथ टोंक में पूजा कराने वाले अशोक कुमार जैन ने बताया कि ऐसी मान्यता है कि एक बार जो सम्मेद शिखरजी जी की वंदना कर लेता है, उसे नर्क और पशु गति की प्राप्ति नहीं होती है। इसलिए हर जैन अपने जीवन में एक बार इसकी वंदना करने का भाव अवश्य रखता है। इसके लिए 27 किमी की वंदना करते हैं। 9 किमी की चढ़ाई चढ़ते हैं। 9 किमी वंदना पथ पर चलते हैं और 9 किमी नीचे उतरते हैं।

3. यहां सहस्त्र सिद्धि की प्राप्ति होती है, कण-कण पूजनीय
23वें तीर्थंकर भगवान पारसनाथ की निर्वाण स्थली होने के कारण इस पर्वत को पारसनाथ हिल के नाम से भी जाना जाता है। सम्मेद शिखरजी में सहज सिद्धि की प्राप्ति भी होती है। इसलिए 20 तीर्थंकर यहीं से आकर मोक्ष की प्राप्ति किए। सम्मेद शिखरजी को सहस्त्र सिद्धि स्थल इसलिए भी कहा जाता है, क्योंकि अन्य स्थानों में जाकर ध्यान लगाना पड़ता है। यहां मुनि स्वयं ध्यान मग्न हो जाते हैं। यहां आकर तीर्थंकरों को मुक्ति मिलती है। इसलिए इसके कण-कण को पूज्य मानते हैं।

