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60% यानी 4500 मरीज गंभीर स्थिति में रेफर होकर आए थे झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स में निजी अस्पतालों की कार्यशैली और सरकारी सुस्ती मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। इस साल जनवरी से सितंबर तक के नौ महीनों में रिम्स में कुल 7486 मरीजों की मौत हो गई है। भास्कर की पड़ताल में खुलासा हुआ कि इनमें से करीब 60% यानी 4500 मरीज गंभीर स्थिति में रेफर होकर आए थे। इनमें से 50% मरीजों ने रिम्स पहुंचने के महज 8 से 24 घंटे के भीतर दम तोड़ दिया। इससे साफ है कि निजी अस्पताल मरीजों की जेब खाली होने और स्थिति हाथ से निकलने के बाद अंतिम सांसों के वक्त रिम्स में डंप कर रहे हैं। ऐसे मरीजों को बचाने के लिए समय पर रेफरल और बेहतर इलाज की जरूरत होती है, लेकिन अस्पतालों के बीच समन्वय की कमी भी उनकी मुश्किलें बढ़ा रही है। इस स्थिति के लिए रिम्स और स्वास्थ्य विभाग भी कम जिम्मेदार नहीं है। निजी अस्पतालों की मनमानी पर नकेल कसने के लिए रिम्स और स्वास्थ्य विभाग को एक रेफरल स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) लागू करनी थी। गवर्निंग बॉडी में इस पर मुहर लगने के एक साल बाद भी यह गाइडलाइन तैयार नहीं हो पाई। जानिए…इसलिए रेफरल मरीजों की मौतें ज्यादा पहले अंधाधुंध एंटीबायोटिक्स की खुराक देना शुरू करते हैं, फिर बिना ट्रीटमेंट हिस्ट्री रेफर रिम्स के डॉक्टरों के अनुसार कई निजी अस्पताल मरीज के भर्ती होते ही बिना कल्चर टेस्ट कराए सीधे थर्ड और फोर्थ लाइन की हायर एंटीबायोटिक्स की भारी खुराक शुरू कर देते हैं। जब मरीज मल्टी-ऑर्गन फेलियर की कगार पर पहुंच जाता है, तब उसे रिम्स भेज दिया जाता है। रिम्स पहुंचने पर सबसे बड़ा संकट यह खड़ा होता है कि मरीज के शरीर में पहले ही एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस विकसित हो चुका होता है, जिससे रिम्स का क्लिनिकल प्रोटोकॉल बेअसर हो जाता है। निजी अस्पताल मरीज की केस समरी या ट्रीटमेंट हिस्ट्री तक नहीं भेजते। इससे डॉक्टर को पुरानी बीमारियों और दी गई दवाओं का पता लगाने में कई घंटे लग जाते हैं, जिससे ‘गोल्डन ऑवर’ बर्बाद हो जाता है। गंभीर मरीजों ने रिम्स पहुंचने पर कितनी देर में दम तोड़ा… रिम्स रिकॉर्ड के अनुसार, मौतों का आंकड़ा गंभीर मरीजों की जान बचाने के लिए समय बेहतर इलाज की जरूरत होती है पर अस्पतालों के बीच समन्वय की कमी मुश्किलें बढ़ा रही है। एसओपी लागू होने पर ये लाभ होते…
जल्दी ही एसओपी लागू होगी…
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