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राहुल गांधी संग अभिषेक बनर्जी की डेढ़ घंटे सीक्रेट मीटिंग, कुंद होगी...

होमताजा खबरदेश राहुल संग अभिषेक की डेढ़ घंटे सीक्रेट मीटिंग, कुंद होगी TMC में बगावत की धार! Last Updated:June 10, 2026, 14:23 IST कांग्रेस नेता राहुल गांधी और टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी की डेढ़ घंटे तक चली मुलाकात में इंडिया गठबंधन, बंगाल में कांग्रेस TMC तालमेल और TMC की अंदरूनी बगावत पर चर्चा होने की खबर है. इस बीच माना जा रहा है कि इस मीटिंग में टीएमसी के भीतर बगावत को थामने की रणनीति पर भी बातचीत हुई. टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने राुहल गांधी से मुलाकात की है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर मचे घमासान ने सियासी तापमान बढ़ा रखा है. इसी बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी और तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के बीच करीब डेढ़ घंटे तक चली मुलाकात ने नई अटकलों को जन्म दिया है. सूत्रों के मुताबिक दोनों नेताओं के बीच पश्चिम बंगाल की राजनीति, इंडिया गठबंधन की भविष्य की रणनीति और आगामी चुनावों में विपक्षी एकता को मजबूत करने पर विस्तार से चर्चा हुई. लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस मुलाकात को सिर्फ इंडिया ब्लॉक की बैठक तक सीमित नहीं देखा जा रहा. इसकी टाइमिंग भी काफी अहम मानी जा रही है, क्योंकि यह बैठक ऐसे समय हुई है जब तृणमूल कांग्रेस अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट में से एक का सामना कर रही है. डेढ़ घंटे तक क्या हुई चर्चा? सूत्रों के अनुसार राहुल गांधी और अभिषेक बनर्जी के बीच पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के संबंधों को लेकर गंभीर बातचीत हुई. दोनों नेताओं ने इस बात पर भी चर्चा की कि भविष्य में दोनों दल भाजपा के खिलाफ किस तरह की रणनीति अपना सकते हैं. बताया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में होने वाले संभावित उपचुनावों में तालमेल या सहयोग की संभावनाओं पर भी विचार-विमर्श हुआ. इंडिया गठबंधन को मजबूत करने और विपक्षी दलों के बीच बेहतर समन्वय बनाने का मुद्दा भी बातचीत के केंद्र में रहा. सूत्रों का दावा है कि पूरी बैठक सकारात्मक माहौल में हुई और दोनों नेताओं के बीच संवाद काफी बेहतर रहा. क्या TMC की अंदरूनी बगावत भी रही एजेंडे में? इस मुलाकात का सबसे दिलचस्प पहलू यही माना जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक अभिषेक बनर्जी ने राहुल गांधी को तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहे ताजा घटनाक्रम की भी जानकारी दी. पार्टी पिछले कुछ दिनों से लगातार झटके झेल रही है. राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय पार्टी छोड़ चुके हैं. इसके बाद सुष्मिता देव के इस्तीफे की खबरों ने भी राजनीतिक हलचल बढ़ा दी. वहीं पार्टी के भीतर असंतुष्ट नेताओं का एक समूह लगातार चर्चा में है. कुछ रिपोर्टों में जादवपुर सांसद सायोनी घोष के भी असंतुष्ट खेमे के संपर्क में होने की बात सामने आई है, हालांकि इन दावों पर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं है. ऐसे में माना जा रहा है कि अभिषेक ने राहुल गांधी के सामने पार्टी की मौजूदा चुनौतियों और राजनीतिक हालात का अपना पक्ष रखा. सोनिया गांधी से बढ़ा संवाद दिलचस्प बात यह है कि हाल के दिनों में कांग्रेस और तृणमूल नेतृत्व के बीच संवाद बढ़ता दिखाई दिया है. दिल्ली दौरे के दौरान अभिषेक बनर्जी की मुलाकात कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी हुई थी. इससे पहले तृणमूल प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी सोनिया गांधी से मुलाकात कर चुकी हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये मुलाकातें सिर्फ शिष्टाचार भेंट नहीं हैं. इन बैठकों को विपक्षी एकता के व्यापक प्रयासों और इंडिया गठबंधन के भीतर संबंधों को मजबूत करने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है. बंगाल की राजनीति में बदलते समीकरण पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के रिश्ते हमेशा उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं. राष्ट्रीय स्तर पर दोनों दल इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन राज्य की राजनीति में वे अक्सर एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते रहे हैं. ऐसे में राहुल गांधी और अभिषेक बनर्जी की लंबी बैठक को भविष्य के राजनीतिक समीकरणों के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है. विशेष रूप से तब जब भाजपा लगातार बंगाल में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है. ममता के लिए क्यों अहम है यह संवाद? तृणमूल कांग्रेस इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रही है. एक तरफ पार्टी के भीतर असंतोष और बगावत की खबरें हैं. दूसरी तरफ विपक्षी राजनीति में अपनी केंद्रीय भूमिका बनाए रखने की चुनौती भी है. ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व के साथ बेहतर संवाद ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी दोनों के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकता है. यह न सिर्फ इंडिया गठबंधन में उनकी भूमिका को मजबूत करेगा, बल्कि पार्टी के भीतर उठ रहे सवालों के बीच एक व्यापक राजनीतिक संदेश भी देगा. क्या बगावत की धार कुंद करने की कोशिश? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस मुलाकात का एक बड़ा संदेश पार्टी के अंदर भी गया है. जब शीर्ष विपक्षी नेता एक साथ दिखाई देते हैं और रणनीतिक स्तर पर संवाद बढ़ाते हैं, तो इससे कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच स्थिरता का संदेश जाता है. यही वजह है कि राहुल गांधी और अभिषेक बनर्जी की यह डेढ़ घंटे की मुलाकात केवल एक राजनीतिक बैठक नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के मौजूदा संकट के बीच शक्ति प्रदर्शन और भरोसा बहाली की कवायद के रूप में भी देखी जा रही है. आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि इस बातचीत का असर सिर्फ इंडिया गठबंधन तक सीमित रहता है या फिर बंगाल की राजनीति और तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही उठापटक पर भी दिखाई देता है. About the Author संतोष कुमार न्यूज18 हिंदी में बतौर एसोसिएट एडिटर कार्यरत. मीडिया में करीब दो दशक का अनुभव. दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आईएएनएस, बीबीसी, अमर उजाला, जी समूह सहित कई अन्य संस्थानों में कार्य करने का मौका मिला. माखनलाल यूनिवर्स…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Source link

झारखंड

परिमल नाथवानी की उम्मीदवारी को मिली हरी झंडी, मुकाबला हुआ दिलचस्प

Last Updated:June 10, 2026, 14:07 IST Jharkhand Rajya Sabha Chunav : झारखंड राज्यसभा चुनाव में भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को बड़ी राहत मिली है. उनके नामांकन पर कांग्रेस की ओर से उठाई गई आपत्तियों पर सुनवाई पूरी होने के बाद रिटर्निंग ऑफिसर ने उनकी उम्मीदवारी को मंजूरी दे दी है। सुनवाई के दौरान नाथवानी की ओर से सभी आपत्तियों का जवाब प्रस्तुत किया गया, जिससे निर्वाचन पदाधिकारी संतुष्ट नजर आए। इसके साथ ही उनका नामांकन वैध माना गया। झारखंड राज्यसभा चुनाव में भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को बड़ी राहत मिली है. रांची. झारखंड राज्यसभा चुनाव में भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को बड़ी राहत मिली है. उनके नामांकन पर कांग्रेस की ओर से दर्ज कराई गई आपत्तियों पर बुधवार को हुई सुनवाई पूरी हो गई. रिटर्निंग ऑफिसर (RO) ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद नाथवानी की ओर से दिए गए जवाब को संतोषजनक माना और उनकी उम्मीदवारी को हरी झंडी दे दी. दरअसल, नामांकन पत्रों की जांच के दौरान नाथवानी के दस्तावेजों में कुछ बिंदुओं को लेकर आपत्तियां उठाई गई थीं. कांग्रेस ने उनके नामांकन की वैधता पर सवाल खड़े किए थे, जिसके बाद रिटर्निंग ऑफिसर ने मामले को सुनवाई के लिए रखा था. सुनवाई के दौरान नाथवानी की ओर से सभी आपत्तियों का बिंदुवार जवाब प्रस्तुत किया गया. इसके बाद निर्वाचन पदाधिकारी उनके स्पष्टीकरण से संतुष्ट नजर आए. बता दें, इस आपत्ति के बाद परिमल नाथवानी का नामांकन पहले होल्ड पर रखा गया था और इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज था. माना जा रहा था कि नाम और दस्तावेजों में कथित विसंगतियों को लेकर उनकी उम्मीदवारी पर संकट आ सकता है, लेकिन अब स्थिति साफ हो गई है. झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए अब मुकाबला और रोचक हो गया है. चुनावी मैदान में एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी, इंडिया गठबंधन के 2 उम्मीदवारों और अन्य दावेदारों के बीच राजनीतिक गणित पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं. नाथवानी की एंट्री ने पहले ही चुनाव को दिलचस्प बना दिया था और अब उनका नामांकन वैध पाए जाने के बाद मुकाबला और भी रोमांचक हो गया है. About the Author Utkarsh KumarChief Sub Editor Utkarsh Kumar is currently working as a Chief Sub Editor with Network 18 Media & Investment Limited for the News18 Hindi website. (Bihar/Jharkhand). He is multimedia journalist with over 15 years of experience …और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Ranchi,Ranchi,Jharkhand Source link

झारखंड

स्वर्ण व्यवसायी विक्की सोनी हत्याकांड का खुलासा:हजारीबाग में मृतक के जीजा समेत...

हजारीबाग जिले के बरही थाना क्षेत्र में सोमवार की रात हुए स्वर्ण व्यवसायी विक्की सोनी हत्याकांड का पुलिस ने 24 घंटे के भीतर खुलासा कर दिया है। इस मामले में मृतक का अपना जीजा विक्रम कुमार मुख्य आरोपी निकला। पुलिस ने हत्या में शामिल दो आरोपियों विक्रम कुमार और दिलीप कुमार को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है। प्रारंभिक जांच में आपसी रंजिश और व्यक्तिगत विवाद को हत्या का कारण बताया गया है। पंचर हुई कार का टायर बदलते वक्त मारी थी गोली दरअसल, हजारीबाग रोड स्थित करसो पुल के पास सोमवार रात‎हजारीबाग के स्वर्ण व्यवसायी विक्की सोनी की गोली मारकर ‎‎हत्या कर दी गई थी। घटना उस समय हुई, जब‎‎ वह अपने मित्र अभिषेक कुमार के साथ‎‎ कोडरमा रेलवे स्टेशन जाने के क्रम में रास्ते‎‎ में पंचर हुई कार का टायर बदल रहे थे।‎ पुलिस पूछताछ में गिरफ्तार आरोपी विक्रम कुमार ने हत्या में अपनी संलिप्तता स्वीकार की है। विक्रम कुमार मृतक विक्की कुमार सोनी का जीजा है। दूसरे आरोपी दिलीप कुमार को भी गिरफ्तार किया गया है, जो मृतक का मित्र बताया जा रहा है। आरोपियों ने कई आपराधिक घटनाओं में भी संलिप्तता स्वीकार की पुलिस के अनुसार, दोनों आरोपियों ने पूछताछ में इस हत्या के साथ-साथ हजारीबाग और आसपास के जिलों में हुई कई लूट, चोरी तथा अन्य आपराधिक घटनाओं में भी अपनी संलिप्तता स्वीकार की है। आरोपियों के बयान के आधार पर पुलिस अन्य मामलों की भी जांच कर रही है। Source link

झारखंड

जमशेदपुर में अवैध संबंध के शक में युवक की हत्या:आरोपी पति गिरफ्तार,...

जमशेदपुर के परसुडीह थाना क्षेत्र स्थित करनडीह लाइन टोला में मंगलवार देर रात एक 35 वर्षीय युवक की हत्या कर दी गई। पुलिस ने अवैध संबंध के शक में हुई इस वारदात के आरोप में मृतक की पत्नी के पति को गिरफ्तार कर लिया है। मृतक की पहचान मोहन सोरेन के रूप में हुई है। पुलिस के अनुसार, मोहन सोरेन का आरोपी राजू मुर्मू के घर अक्सर आना-जाना था। मोहन, राजू की पत्नी सविता मुर्मू को अपनी ‘मुंह बोली मामी’ कहता था। हालांकि, राजू को मोहन और सविता के बीच अवैध संबंध होने का शक था, जिसके कारण उनके घर में अक्सर विवाद होता रहता था। मंगलवार देर रात मोहन, राजू के घर पहुंचा था। इसी दौरान अवैध संबंध के शक को लेकर राजू, उसकी पत्नी सविता और मोहन के बीच विवाद शुरू हो गया। आरोप है कि राजू ने पहले अपनी पत्नी सविता के साथ मारपीट की और उसे घर से भगा दिया। भयभीत सविता अपने दोनों बच्चों को लेकर वहां से चली गई और रात दूसरे के घर में बिताई। सविता के जाने के बाद घर में मौजूद मोहन और राजू के बीच विवाद और बढ़ गया। गुस्से में आकर राजू ने घर में रखी भारी स्टील की डेकची उठाकर मोहन पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया। सिर और शरीर के अन्य हिस्सों पर गंभीर चोटें लगने से मोहन ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया। बुधवार सुबह जब सविता वापस घर पहुंची तो उसे घटना की जानकारी मिली। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। परसुदीह थाना के एएसआई रितेश ने बताया कि पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी राजू मुर्मू को गिरफ्तार कर लिया है। मृतक मोहन सोरेन पेशे से कान्वाई चालक था और मूल रूप से ओडिशा का रहने वाला था। उसके भाई सुंदरनगर के नया बस्ती क्षेत्र में रहते हैं। पुलिस ने घटनास्थल से मृतक का मोबाइल फोन, खून से सनी स्टील की डेकची और अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्य बरामद किए हैं। परसुडीह थाना पुलिस आरोपी से पूछताछ कर रही है। Source link

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तीसरी पास महिला किसान बनी मिसाल, 5 एकड़ में ऑर्गेनिक खेती से...

होमवीडियोकृषि तीसरी पास महिला किसान बनी मिसाल, 5 एकड़ में ऑर्गेनिक खेती से कमा रही लाखों X तीसरी पास महिला किसान बनी मिसाल, 5 एकड़ में ऑर्गेनिक खेती से कमा रही लाखों   बुरहानपुर जिले में किसान अक्सर नवाचार करते जाते हैं आज हम आपको मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के आलमगंज क्षेत्र में रहने वाली 60 वर्षीय महिला किसान की कहानी बता रहे हैं. 10 वर्षों से ऑर्गेनिक खेती कर लाखों रुपए की कमाई कर रही है. Source link

झारखंड

Bhindi Farming: बोकारो के रंजन शर्मा ने की भिंडी की खेती, 17...

होमफोटोकृषि बोकारो के रंजन शर्मा ने की भिंडी की खेती,17 हजार लगाकर 45 दिन में कमाए 80 हजार Last Updated:June 10, 2026, 12:56 IST Bhindi Farming: झारखंड के बोकारो जिले के चंदनक्यारी प्रखंड स्थित भिस्की गांव के किसान रंजन शर्मा स्मार्ट खेती के जरिए अच्छी आमदनी कर रहे हैं. उन्होंने महज 50 डिसमिल जमीन पर भिंडी की खेती कर डेढ़ महीने में चार गुना से अधिक मुनाफा कमाया है. उनकी सफलता आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है. किसान रंजन शर्मा ने बताया कि वह पेशेवर किसान हैं और बचपन से ही अपने परिवार को खेती करते देख रहे हैं. परिवार की इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने आधुनिक तरीके से खेती शुरू की. रंजन शर्मा ने बताया कि मार्च महीने में भिंडी की बुवाई की गई थी. भिंडी की फसल किस्म के अनुसार 45 से 60 दिनों में तैयार हो जाती है, जिससे किसानों को कम समय में अच्छी कमाई का मौका मिलता है. रंजन शर्मा के अनुसार 50 डिसमिल जमीन में भिंडी की खेती करने में करीब 17 हजार रुपये की लागत आई. किसान करीब दो महीने तक भिंडी की तुड़ाई कर सकते हैं और पूरे सीजन में 40 से 50 क्विंटल तक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं. Add News18 as Preferred Source on Google उन्होंने बताया कि फिलहाल बाजार में भिंडी 20 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रही है. वह अपनी अधिकतर सब्जियां धनबाद के कोलियरी इलाकों और आसपास के बाजारों में बेचते हैं. 40 क्विंटल उत्पादन होने पर किसान लगभग 80 हजार रुपये तक की आमदनी कर सकते हैं. लागत निकालने के बाद करीब 63 हजार रुपये तक का शुद्ध मुनाफा हो सकता है. रंजन शर्मा ने बताया कि भिंडी की खेती में कीट लगने और फल टेढ़ा होने की समस्या अक्सर सामने आती है. इससे बचाव के लिए समय-समय पर दवा का छिड़काव जरूरी है. उनका कहना है कि सही देखभाल और आधुनिक तकनीक अपनाकर किसान बेहतर पैदावार के साथ अच्छी कमाई कर सकते हैं. Source link

झारखंड

गिरिडीह में डस्ट लदे हाइवा में भीषण आग:चलते हाइवा के टायर में...

गिरिडीह जिले के जमुआ थाना क्षेत्र अंतर्गत सियाटांड़ में मंगलवार देर रात एक बड़ा हादसा होते-होते टल गया, जब डस्ट लदा एक हाइवा अचानक आग की चपेट में आ गया। यह घटना भारत पेट्रोल पंप के समीप उस सड़क पर हुई, जो गिरिडीह-बेंगाबाद मेन रोड को जोड़ती है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हाइवा बेंगाबाद की ओर से डस्ट लोड कर आ रहा था, तभी अचानक उसके पिछले टायर में आग लग गई। चालक ने स्थिति को भांपते हुए तत्परता दिखाई और तुरंत वाहन से कूदकर अपनी जान बचा ली। कुछ ही पलों में आग ने विकराल रूप धारण कर लिया और पूरा वाहन आग की लपटों में घिर गया। मिनटों में फैल गई आग, बुझाना संभव नहीं हुआ स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि आग इतनी तेजी से फैली कि कुछ ही मिनटों में पूरा हाइवा धू-धूकर जलने लगा। घटनास्थल के पास एक तालाब भी मौजूद था, लेकिन आग की तीव्रता इतनी अधिक थी कि शुरुआती स्तर पर उसे नियंत्रित करना संभव नहीं हो पाया। लोगों ने दूर से ही लपटों को बढ़ते देखा और अफरा-तफरी का माहौल बन गया। धीरे-धीरे वाहन पूरी तरह जलकर राख में तब्दील हो गया। राहत की बात यह रही कि इस दौरान कोई अन्य व्यक्ति इसकी चपेट में नहीं आया। आसपास के इलाकों में भी आग नहीं फैली। ओवरलोडिंग और तेज रफ्तार पर उठे सवाल घटना के बाद स्थानीय ग्रामीणों ने क्षेत्र में चलने वाले हाइवा वाहनों पर सवाल खड़े किए हैं। उनका आरोप है कि अधिकतर हाइवा ओवरलोड होकर तेज रफ्तार में चलते हैं, जिससे इस तरह की घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है। ग्रामीणों का अनुमान है कि अत्यधिक दबाव और गति के कारण टायर गर्म होकर आग लगने की यह घटना हुई होगी। हालांकि, आग लगने के वास्तविक कारणों का अब तक स्पष्ट पता नहीं चल सका है। घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय लोग मौके पर पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया। पुलिस भी मामले की जानकारी जुटाने में लगी है। Source link

झारखंड

देवघर में स्कूलों को निशाना बना रहे चोर:छह महीने में 35-40 संस्थानों...

देवघर जिले में स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में चोरी की घटनाओं में लगातार इजाफा हो रहा है। पिछले एक महीने के भीतर ही दर्जनों विद्यालयों और प्रशिक्षण संस्थानों को चोरों ने निशाना बनाया है, जिससे शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन की चिंता बढ़ गई है। नवंबर 2025 से मई 2026 के बीच करीब 35 से 40 स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में चोरी की घटनाएं दर्ज की गई हैं। इन घटनाओं ने न केवल सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है, बल्कि शैक्षणिक माहौल को भी प्रभावित किया है। निगरानी के अभाव में आसान टारगेट बन रहे स्कूल जानकारी के अनुसार, शैक्षणिक संस्थानों में नियमित निगरानी की कमी और सीमित स्टाफ की उपस्थिति चोरों के लिए आसान अवसर साबित हो रही है। जसीडीह स्थित टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज भी हाल ही में चोरी का शिकार बना है। जिला शिक्षा अधीक्षक मधुकर कुमार ने बताया कि कई संस्थानों में सुरक्षा गार्ड या दरबान की व्यवस्था नहीं है। प्रशिक्षण या कक्षाओं के दौरान ही शिक्षकों और कर्मचारियों की आवाजाही होती है, जबकि अन्य समय परिसर लगभग खाली रहता है। यही वजह है कि चोर आसानी से स्कूल परिसरों में घुसकर वारदात को अंजाम दे रहे हैं। पहाड़पुर उत्क्रमित मध्य विद्यालय, अनची देवी विद्यालय और नवादा उत्क्रमित मध्य विद्यालय सहित कई संस्थान इस समस्या से प्रभावित हैं। मिड-डे मील से लेकर कंप्यूटर तक की चोरी चोरों ने मध्याह्न भोजन योजना का सामान, कंप्यूटर लैब के सीपीयू, एलईडी स्क्रीन, पुस्तकें और कॉपियां तक नहीं छोड़ी हैं। इन घटनाओं के कारण स्कूलों की शैक्षणिक गतिविधियां बाधित हो रही हैं और छात्रों की पढ़ाई पर असर पड़ रहा है। जिला शिक्षा अधीक्षक ने बताया कि इस गंभीर समस्या को देखते हुए पुलिस अधिकारियों से समन्वय कर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में पहल की जा रही है। जल्द ही स्कूलों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में होमगार्ड और सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की योजना है। Source link

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पंडित नेहरू से पीएम मोदी तक… रिकॉर्ड से आगे बड़ी कहानी, भारतीय...

यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर ऐसा क्या है जो उन्हें उनके पूर्ववर्तियों से अलग बनाता है. लेकिन इस सवाल का जवाब केवल चुनावी जीत, लोकप्रियता या संगठनात्मक ताकत में नहीं छिपा है. असल कहानी भारतीय राजनीति की शैली की तब्दीली में है, जिसने संसदीय लोकतंत्र के भीतर एक तरह “विशेष शैली” की राजनीति को जन्म दिया. दरअसल, जवाहर लाल नेहरू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच की दूरी सिर्फ कालखंडों की नहीं है, यह भारतीय राजनीति के दो अलग-अलग युगों के बीच की दूरी है. नेहरू के बाद इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह जैसे बड़े नेता आए, लेकिन कोई भी नेहरू और मोदी जैसी दीर्घकालिक राजनीतिक केंद्रीयता स्थापित नहीं कर सका. सवाल यह कि जवाहर लाल नेहरू के बाद पीएम मोदी ही क्यों ऐसा कर पाए? जब चुनाव सांसद नहीं, प्रधानमंत्री चुनने का माध्यम बन गए इस संदर्भ में एक दिलचस्प तथ्य सामने आता है. दरअसल, भारतीय संविधान ने देश को संसदीय लोकतंत्र दिया. सिद्धांत यह है कि जनता सांसद चुनती है और सांसद प्रधानमंत्री चुनते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल के दौरान पिछले एक दशक में चुनावी व्यवहार का एक नया पैटर्न सामने आया है. मतदाता कई बार स्थानीय उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दों और यहां तक कि राज्य सरकार के प्रदर्शन से ऊपर उठकर राष्ट्रीय नेतृत्व के आधार पर मतदान करता दिखाई देते हैं. इसकी शुरुआत तो वर्ष 2014 में ही हो चुकी थी जब संसदीय चुनाव का स्वरूप ही भाजपा बनाम कांग्रेस कम और मोदी बनाम व्यवस्था ज्यादा हो गया था. इसके बाद आया 2019 का चुनाव, जब उम्मीदवारों का नहीं, “मजबूत नेतृत्व” का चुनाव बन गया. वर्ष 2024 में भी भाजपा के चुनाव अभियान का सबसे बड़ा चेहरा पीएम मोदी ही रहे. यहीं से भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है. संसदीय ढांचे के भीतर चुनाव का चरित्र राष्ट्रपति प्रणाली जैसा होने लगा, जहां पूरा चुनाव एक व्यक्ति की स्वीकार्यता और नेतृत्व क्षमता पर केंद्रित हो जाता है. जवाहर लाल नेहरू का रिकॉर्ड और पीएम नरेंद्र मोदी का दौर. क्या बदल गई है भारत में चुनाव लड़ने और जीतने की पूरी शैली? हालांकि इसका अर्थ यह कतई नहीं कि स्थानीय उम्मीदवारों या क्षेत्रीय मुद्दों का महत्व समाप्त हो गया. कई राज्यों में विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों के नतीजों ने दिखाया कि स्थानीय समीकरण अब भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं. फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व-केंद्रित प्रचार की प्रवृत्ति पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट दिखाई देती है. रिकॉर्ड से बड़ी कहानी पीएम मोदी के लंबे कार्यकाल की कहानी केवल चुनावी जीतों की कहानी नहीं है. यह उस राजनीतिक परिवर्तन की कहानी भी है जिसमें प्रधानमंत्री का पद पहले की तुलना में कहीं अधिक केंद्रीय और प्रभावशाली दिखाई देता है. भारत में मतदाता सांसद चुनते हैं, सांसद प्रधानमंत्री चुनते हैं, लेकिन पिछले तीन लोकसभा चुनावों में चुनावी विमर्श का बड़ा हिस्सा सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व, नेतृत्व और फैसलों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा. स्पष्ट है कि यह स्थिति भारतीय संसदीय राजनीति के पारंपरिक ढांचे से कुछ अलग दिखाई देती है. यही कारण है कि दोनों नेताओं की तुलना केवल कार्यकाल की अवधि से नहीं की जा सकती. दोनों अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों में उभरे और अलग राजनीतिक वातावरण में काम किया. जनता पर ‘जादू’ करते हैं पीएम मोदी! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शैली की एक प्रमुख विशेषता जनता से सीधे संवाद पर जोर देना रही है. अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने पारंपरिक सरकारी संचार के साथ-साथ, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, वीडियो संदेश, वर्चुअल कार्यक्रमों और देशभर में नियमित जनसभाओं का व्यापक उपयोग किया. सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से प्रत्यक्ष संवाद और डिजिटल माध्यमों के जरिए लगातार संपर्क बनाए रखने की रणनीति ने उनकी सार्वजनिक पहुंच को और मजबूत किया. हालांकि भारत के पूर्व प्रधानमंत्रियों ने भी रेडियो, टेलीविजन और जनसभाओं के माध्यम से लोगों तक पहुंच बनाई थी, लेकिन डिजिटल तकनीक और सोशल मीडिया के इतने व्यापक और निरंतर इस्तेमाल के कारण पीएम मोदी का जनसंपर्क मॉडल अलग दिखाई देता है. सिर्फ 12 साल का कार्यकाल नहीं, पीएम नरेंद्र मोदी के लंबे कार्यकाल के पीछे छिपी भारतीय राजनीति की बड़ी कहानी संसदीय व्यवस्था, लेकिन केंद्रीकृत राजनीति राजनीति के जानकारों का मानना है कि मोदी ने चुनावी राजनीति को “केंद्रीकृत शैली” का स्वरूप दिया है. इसका अर्थ यह नहीं कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था बदल गई है, बल्कि यह कि चुनावों में मतदाता अक्सर स्थानीय उम्मीदवार की बजाय राष्ट्रीय नेतृत्व को ध्यान में रखकर मतदान करते दिखाई देते हैं.कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने स्थानीय नेतृत्व से अधिक पीएम मोदी के चेहरे को प्रमुखता दी. इससे प्रधानमंत्री का पद केवल सरकार के मुखिया का पद नहीं रहा, बल्कि चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया. नेहरू, इंदिरा और मोदी- तीन बड़े व्यक्तित्व हालांकि, भारतीय राजनीति में व्यक्तित्व आधारित राजनीति नई नहीं है. जवाहर लाल नेहरू के दौर में कांग्रेस और नेहरू लगभग एक-दूसरे के पर्याय बन गए थे. बाद में इंदिरा गांधी ने भी अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान को पार्टी से ऊपर स्थापित किया. “गरीबी हटाओ” अभियान से लेकर 1971 के चुनाव तक इसका प्रभाव स्पष्ट दिखा. लेकिन मोदी युग की विशेषता यह है कि यह दौर 24 घंटे चलने वाले मीडिया, सोशल मीडिया, डिजिटल संचार और प्रत्यक्ष जनसंपर्क के समय में विकसित हुआ. “मन की बात”, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, विशाल चुनावी रैलियां और लगातार जनसंवाद ने प्रधानमंत्री की छवि को पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक बनाया. पार्टी से सबसे बड़ा चेहरा मोदी युग की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक यह है कि भाजपा के चुनावी अभियान का केंद्र अक्सर संगठन नहीं, बल्कि नेतृत्व दिखाई देता है. भाजपा स्वयं एक मजबूत संगठन है, लेकिन चुनावी प्रचार में मोदी की लोकप्रियता उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी रही है. इसका असर विपक्षी राजनीति पर भी पड़ा. कई चुनावों में विपक्ष का अभियान भाजपा के खिलाफ कम और मोदी के खिलाफ ज्यादा दिखाई दिया. इससे चुनावी मुकाबला कई बार पार्टी बनाम पार्टी की बजाय नेता बनाम नेता का रूप लेने लगा. जवाहर लाल नेहरू से पीएम नरेंद्र मोदी तक… कैसे बदली भारतीय राजनीति और क्यों नेतृत्व बन गया चुनाव का सबसे बड़ा चेहरा क्या बदल गई है चुनाव की प्रकृति? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के

झारखंड

इतना कसैला कि जीभ पर रखते ही लगे करंट, इतना गुणकारी कि...

Last Updated:June 10, 2026, 11:24 IST Amla Extract: पलामू के शिव कुमार पांडे ने आंवला से एक बहुत ही कसैला सत्व बनाया है पर उनका दावा है कि ये शरीर के लिए काफी फायदेमंद है. उन्होंने चरक संहिता से प्रेरित होकर इसे तैयार किया है. इसे बनने में 6 महीने का समय लगता है और 50 ग्राम की डिब्बी की कीमत 500 रुपये है. ख़बरें फटाफट पलामू. दुनिया में जहां लोग स्वादिष्ट और मीठे खाद्य पदार्थों की तलाश करते हैं, वहीं झारखंड के पलामू जिले के रहने वाले शिव कुमार पांडे ने एक ऐसा खाद्य पदार्थ तैयार किया है, जिसे दुनिया का सबसे कसैला खाद्य पदार्थ बताया जा रहा है. खास बात यह है कि यह अनोखा उत्पाद आंवला से तैयार किया गया है और इसके निर्माण की प्रेरणा उन्हें प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथ चरक संहिता से मिली है. अपने अनोखे स्वाद और औषधीय गुणों के कारण यह सत्व लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है. चरक संहिता से मिली प्रेरणाशिव कुमार पांडे ने बताया कि उन्होंने आयुर्वेद के प्राचीन ज्ञान को आधुनिक समय में लोगों तक पहुंचाने के उद्देश्य से इस खास सत्व को तैयार किया है. इसके लिए उन्होंने चरक संहिता में बताई गई प्रक्रियाओं का अध्ययन किया और लंबे प्रयोग के बाद इसे विकसित किया. उनका मानना है कि प्रकृति में मौजूद औषधीय गुणों को सही तरीके से सुरक्षित कर लोगों तक पहुंचाना जरूरी है. छह महीने की जटिल प्रक्रिया से होता है तैयारइस सत्व को तैयार करना बेहद कठिन और समय लेने वाला काम है. शिव कुमार पांडे के अनुसार, सबसे पहले आंवला को लगभग तीन महीने तक प्राकृतिक तरीके से एक खास प्रक्रिया में रखा जाता है. इसके बाद अगले तीन महीनों तक इसे परिपक्व और तैयार किया जाता है. कुल मिलाकर करीब छह महीने की लंबी प्रक्रिया के बाद यह सत्व तैयार होता है. यही कारण है कि इसका उत्पादन सीमित मात्रा में ही हो पाता है. कई स्वास्थ्य समस्याओं में लाभकारी होने का दावाशिव कुमार पांडे का दावा है कि आंवला से तैयार यह सत्व पेट दर्द, कब्ज, एसिडिटी और मधुमेह जैसी समस्याओं में लाभदायक हो सकता है. इसके अलावा यह आंखों के स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी माना जाता है. उन्होंने बताया कि इसके लिए वर्ल्ड रिकॉर्ड में आवेदन करने की तैयारी चल रही है. उनका कहना है कि इसकी प्रकृति पूरी तरह शीतल होती है, इसलिए भीषण गर्मी के मौसम में भी यह शरीर को ठंडक पहुंचाने में सहायक होता है. वे यह भी दावा करते हैं कि इसके नियमित सेवन से पथरी की समस्या में लाभ मिल सकता है. हालांकि किसी भी बीमारी के इलाज के लिए डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है. कीमत और सेवन की विधिशिव कुमार पांडे के अनुसार, इस आंवला सत्व का सेवन सुबह नाश्ते के बाद लगभग एक ग्राम मात्रा में किया जा सकता है. इसकी 50 ग्राम की पैकिंग की कीमत 500 रुपये रखी गई है. इच्छुक लोग शिव कुमार पांडे से संपर्क कर इसे प्राप्त कर सकते हैं. आयुर्वेदिक परंपरा और स्थानीय नवाचार का यह अनोखा मेल आज पलामू को एक नई पहचान दिलाने का काम कर रहा है. About the Author Raina Shukla बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन एंड जर्नलिज़्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट. पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और ABP न्यूज़ से होते हुए News18 Hindi तक पहुंचा. करियर और देश की …और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Palamu,Jharkhand Source link

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