आंखों में नहीं, इरादों में है रोशनी! नेत्रहीन सुदामा और रामाशीष भाई...
Last Updated:April 30, 2026, 21:15 IST किसी ने बिल्कुल सही कहा है, मंजिल उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, क्योंकि पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है. जब इंसान के इरादे मजबूत हों और दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा, तब कोई कमी, कोई परेशानी और कोई मजबूरी उसे आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती. ऐसे ही हौसले और संघर्ष की मिसाल हैं वे लोग, जिन्होंने हालात से लड़कर अपनी मेहनत से सफलता की नई कहानी लिख दी. दरअसल, लातेहार जिले के सदर प्रखंड स्थित सीसी गांव के दो भाई सुदामा महतो और रामाशीष मेहता उन लोगों के लिए प्रेरणा बन गए हैं, जो छोटी-छोटी मुश्किलों में हार मान लेते हैं. जन्म से नेत्रहीन होने के बावजूद दोनों भाइयों ने अपनी जिंदगी को बोझ नहीं बनने दिया, बल्कि खेती को सहारा बनाकर पूरे परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा रखी है. दोनों भाइयों ने ये साबित कर रहे हैं कि इंसान की असली ताकत उसकी आंखों में नहीं, बल्कि उसके इरादों में होती है. आंखों में भले अंधेरा हो, लेकिन मेहनत और आत्मविश्वास से उन्होंने अपने जीवन को रोशन कर दिया है. आंखों से देखने में असमर्थ ये दोनों भाई आज भी खेतों में कुदाल चलाते हैं, बुवाई करते हैं, फसल काटते हैं और मौसम के अनुसार खेती कर परिवार का पालन-पोषण करते हैं. गांव के लोग जब उन्हें खेतों में काम करते देखते हैं तो हैरान रह जाते हैं. बिना आंखों की रोशनी के सिर्फ अनुभव और अंदाज के सहारे खेती करना किसी मिसाल से कम नहीं है. सुदामा महतो ने लोकल18 को बताया कि बचपन में गांव में पढ़ाई की सुविधा नहीं थी और नेत्रहीन होने के कारण शिक्षा हासिल करना मुश्किल था. ऐसे में उन्होंने पिता के साथ खेतों में काम करना शुरू किया. धीरे-धीरे खेती ही उनका जीवन बन गई. आज करीब छह एकड़ जमीन पर वे खेती करते हैं. वर्तमान समय में मक्का, पेक्ची, गेहूं और गन्ना जैसी फसलें लगी हैं. गेहूं की कटाई के बाद अब झींगी, करैला, भिंडी और मूंग की बुवाई की तैयारी है. Add News18 as Preferred Source on Google सुदामा महतो के दो बेटे हैं, जबकि रामाशीष मेहता के तीन बेटे हैं. दोनों भाई कहते हैं कि साल भर खेती ही परिवार का सहारा है. इसी कमाई से बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और जीवन की जरूरतें पूरी होती हैं. एक सीजन की अच्छी फसल से खाने-पीने से लेकर बच्चों की पढ़ाई तक का खर्च निकल जाता है. रामाशीष मेहता ने कहा कि उनकी जमीन लगभग 6 एकड़ से भी अधिक है. जिसमें कुछ जमीन कुछ लोगों द्वारा हड़पा जा रहा है. वहीं सरकारी योजना का भी लाभ नहीं मिल रहा है. जिसमें सबसे जरूरी सिंचाई है. वहीं खेत में काम करने के लिए बोरी बिछाकर खुद से काम करते है. खुद मक्का और गेहूं हाथों से काटते है. संघर्ष केवल दिव्यांगता तक सीमित नहीं है. दोनों भाइयों का आरोप है कि गांव के कुछ लोगों ने उनकी जमीन के हिस्से पर कब्जा कर लिया है, जिससे खेती का क्षेत्र कम हो गया है. जोत-कोड़ और संसाधनों की भी भारी समस्या है. इसके बावजूद दोनों भाई हार मानने को तैयार नहीं हैं. सबसे दुखद बात यह है कि इतने संघर्ष के बावजूद उन्हें सरकार की किसी योजना का लाभ नहीं मिल सका है. यदि प्रशासन इन मेहनतकश भाइयों की मदद करे तो इनका जीवन और बेहतर हो सकता है. First Published : April 30, 2026, 21:15 IST Source link








